नीरस और अर्थहीन फ़िल्मों का हफ़्ता

  • 22 अक्तूबर 2010
जॉन अब्राहम
Image caption 'झूठा ही सही' में कलाकार जॉन अब्राहम और पाखी फोन फ्रेंड्स हैं

मैं दिल पर हाथ रखकर कहती हूं कि मैं जो भी कहूंगी सच कहूंगी और सच के सिवाय कुछ नहीं कहूंगी.

सच नंबर एकः 'झूठा ही सही' एक बैलगाड़ी की रफ़्तार पर चलती हुई बेहद बोरिंग फ़िल्म है. विश्वास नहीं होता कि ये फ़िल्म उसी डायरेक्टर ने बनाई है जिन्होंने इमरान खान को लेकर हमें 'जाने तू या जाने ना' दी थी.

ना ही इसमें जाने तू....की शरारत है ना ही स्क्रीनप्ले का जादू. कुछ हल्के फुल्के दृश्यों को छोड़कर फ़िल्म बहुत ही ठंडी लगती है.

कहने को तो ये एक प्रेम कहानी लगती है, मगर प्यार और दोस्ती से ज़्यादा मुझे पड़ोसियों की कहानी लगती है.

जॉन अब्राहम एक बुक स्टोर चलाते हैं और नई हीरोइन पाखी एक वीडियो स्टोर. दोनों की मुलाकातें फोन पर होती हैं और उसके बाद दोनों फोन फ्रेंड्स बन जाते हैं.

जॉन उससे झूठ पर झूठ बोलता है और पाखी सिर्फ़ सच बोलती है. एक दिन जॉन का एक भांडा फूट जाता है और फ़िल्म खत्म हो जाती है.

जॉन अब्राहम चश्मे लगाकर एक नए किरदार को ईमानदारी से निभाते हैं लेकिन अफसोस बात नहीं बनती. पाखी पहली फ़िल्म के लिए बहुत ही जागरूक हैं, उनका डांस भी अच्छा है लेकिन वो दिल को नहीं भातीं.

फ़ोन रोमांस पर बहुत साल पहले मृणाल सेन ने डिंपल कपाड़िया और इरफ़ान ख़ान को लेकर एक काफ़ी अच्छी बंगाली फ़िल्म बनाई थी-अंतरीन. झूठा ही सही में ऐसा कुछ भी नहीं होता. पाखी और जॉन के बीच ना कोई केमिस्ट्री है और न ही जज़्बात.

झूठा ही सही को मैं दो स्टार दूंगी.

सच नंबर दो

Image caption रक्त चरित्र में शत्रुघ्न सिन्हा बिना मूंछों के दिखते हैं

सिनर्जी प्रोडक्शंस निर्मित और राम गोपाल वर्मा निर्देशित 'रक्त चरित्र' फ़िल्म नहीं बल्कि सज़ा का ऐलान है.

फ़िल्म में पहले फ्रेम से लेकर आख़िरी फ्रेम तक सिर्फ़ मारधाड़, गालीगलौज और ख़ून ख़राबा है. ऐसा लगता है जैसे ऐक्शन डायरेक्टर भयानक से भयानक बलात्कार और औरतों पर होते अत्याचार को दर्शाने में गर्व महसूस करते हैं.

जब तक फ़िल्म के हर किरदार को किसी न किसी हथियार से काट-कूटकर फेंक नहीं दिया जाता, तब तक रक्त की होली चलती रहती है.

फ़िल्म की शुरुआत में लिखा है-ये सत्य घटना पर आधारित है. मैं डायरेक्टर से पूछना चाहूंगी-कब, क्यों और कहां हुई थी ऐसी वारदात?

ऐसा नहीं है कि हमने इसके पहले हिंसक फ़िल्में नहीं देखीं बल्कि रामगोपाल वर्मा ने खुद बहुत सारी फ़िल्में बनाईं हैं, इनमें 'सत्या' और 'सरकार' जैसी अच्छी फ़िल्में भी शामिल हैं.

हिंसा की हद

लेकिन रक्त चरित्र हिंसा और अत्याचार की सभी हदें पार कर जाता है.

दुख की बात है कि जिस डायरेक्टर ने बहुत साल पहले विवेक ओबेरॉय को 'कंपनी' में लांच किया था और जिसके लिए ये फ़िल्म कमबैक हो सकती थी, रक्त चरित्र उनके करियर को और भी पीछे ले जाएगी.

दुख की बात ये भी है कि 70 के दशक के दो होनहार कलाकार ज़रीना वहाब और शत्रुघ्न सिन्हा जो बहुत साल के बाद पर्दे पर नज़र आए और जिनके लिए ये एक नई शुरुआत हो सकती थी, नहीं होगी.

मैं रामगोपाल वर्मा की शुभचिंतक होते हुए उनको एक लंबी छुट्टी पर जाने की सलाह दूंगी. उनके प्रोड्यूसर्स को भी मैं कुछ कहना चाहूंगी. भगवान के लिए ऐसी वाहियात फ़िल्मों पर पैसे लगाकर उनको प्रोत्साहन न दें.

सच तो ये है कि कोई भी सामान्य इंसान अपने होशोहवास में रक्त चरित्र नहीं देखेगा.

मैं रक्त चरित्र को डेढ़ स्टार दूंगी.

सच नंबर तीन

Image caption फ़िल्म हिस्स में मल्लिका शेरावत ने लीड भूमिका निभाई है

मैं आपको 'हिस्स' देखने की सलाह बिल्कुल ही नहीं दूंगी. कौन हैं ये लोग जो कहानी को बगैर जाने और परखे प्रोजेक्ट पर इतना पैसा लगा देते हैं?

और कौन हैं ये फ़िल्म निर्माता जिनको ना सिनेमा की जानकारी है, ना ही कहानी की समझ और अपने आपको रचनात्मक फ़िल्म निर्माता कहते हैं.

प्रोड्यूसर गोविंद मेनन वो आदमी हैं जिन्होंने मल्लिका शेरावत को अपनी पहली फ़िल्म 'ख्वाहिश' में ब्रेक दिया था, हालांकि मल्लिका इसके पहले वाशु भगनानी की 'जीना सिर्फ़ तेरे लिए' कर चुकी थीं.

ख्वाहिश से मल्लिका को एक नई पहचान मिलीं और वो विवादों की शहज़ादी बन गईं.

अब इतने सालों के बाद गोविंद मेनन मल्लिका को ब्रिटिश डायरेक्टर जेनिफर लिंच की फ़िल्म हिस्स में लाए हैं.

पिछले कई दिनों से मल्लिका टीवी और रेडियो पर अपनी फ़िल्म के प्रचार में व्यस्त रहीं. उन्होंने कहा था कि अगर 'मर्डर' में सबकी नींद चुराई थी तो हिस्स में वो सबके होश उड़ा देंगी.

इतना पैसा, इतने कलाकार, इतनी सहूलियतें और मौक़े के बाद कोई इतनी बुरी फ़िल्म कैसे बना सकता है.

अगर दुनिया में सबसे खराब फ़िल्म देखने का अवार्ड होता तो वो हिस्स देखने वाले को मिलता. अब समझ में आया कि प्रोड्यूसर ने फ़िल्म का प्रेस शो क्यों नहीं रखा.

मैं हिस्स को देती हूं आधा स्टार और वो भी मल्लिका के मैन्यूपलेटिव प्रमोशन के लिए जिसके वजह से कुछ मासूम लोग थिएटर में फंसने वाले हैं.

आख़िर में सच नंबर चार

फ़िल्म 'दस तोला' साधारण लोगों की मासूम कहानी है. दस तोला में न तो कोई बड़े कलाकार हैं, न कोई खास संगीत, कम से कम ये हमसे कोई झूठे वादे करती है.

इसके बावजूद इसमें झूठा ही सही की बोरियत नहीं है, ना ही रक्त चरित्र का मानसिक और शारीरिक अत्याचार, ना ही हिस्स की बेईमानी और पागलपन.

और इस सादगी और सच्चाई के लिए दस तोला को मेरी ओर से ढाई स्टार.

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