'ब्रेक के बाद' में दम है

शरमन जोशी
Image caption फ़िल्म 'अल्लाह के बंद' में शरमन जोशी

सिनेमाघरों में फ़िल्मों की बारिश हो रही है और इस हफ़्ते एक बार फिर तीन फ़िल्में रिलीज़ हुई हैं.

सनी देओल और तब्बू की पुरानी फ़िल्म 'खुदा कसम' दस साल से भी ज़्यादा समय तक बक्से में बंद रही और अब बॉक्स ऑफिस इस फ़िल्म से कोई खास उम्मीद नहीं रखती.

फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक केसी बोकाड़िया भी ये बात मानते हैं और शायद इसलिए फ़िल्म को बिना किसी प्रचार के छोटे सिनेमाघरों में रिलीज़ किया जा रहा है.

तो संक्षेप में हम खुदा कसम को खुदा हाफिज़ कहते हैं.

अल्लाह के बंदे

Image caption 'अल्लाह के बंदे' के लेखक, निर्देशक और अभिनेता फ़ारुक़ कबीर

अगली फ़िल्म ‘अल्लाह के बंदे’ बहुत समय से सेंसर के चक्कर में रही और आख़िर में बहुत सारे फेरबदल के बाद रिलीज़ हो रही है.

इसमें कोई शक नहीं कि फ़िल्म की कहानी उम्दा है और इसके लेखक फ़ारुक़ कबीर की नियत बिलकुल नेक है. शायद यही वजह है कि वो नसीरुद्दीन शाह और शरमन जोशी जैसे काबिल कलाकारों को अपनी फ़िल्म में काम करने के लिए प्रोत्साहित कर पाए.

मगर अफ़सोस इस बात का है कि फ़िल्म का उम्दा ख़्याल और जज़्बात फ़ारुक़ कबीर पर्दे पर नहीं उतार पाए हैं. इसकी वजह है कहानी में कसावट की कमी और पटकथा के टूटते तार.

किरदारों में सही तारतम्य न होने से रही-सही कमी भी पूरी हो जाती है. फ़िल्म के कुछ पल यादगार ज़रूर हैं मगर ये पल इतने कम हैं कि बात नहीं बनती.

फ़िल्म के निर्देशक से हमारी गुज़ारिश है कि अगली बार फ़िल्म बनाएं तो लेखन, निर्देशन और अभिनय सभी चीज़ों को अपनी ज़िम्मेदारी न मानें, बेहतर फ़िल्म बना पाएंगे.

ब्रेक के बाद

Image caption फ़िल्म ब्रेक के बाद के एक दृश्य में इमरान ख़ान और दीपिका पादुकोण

बड़े शायरों ने कहा है कि प्यार में कुछ नया नहीं और हम सब ये जानते हैं.

मगर हिंदी सिनेमा में उभरते निर्देशकों को हर हफ़्ते प्यार के कुछ नए मायने तलाशने पड़ते हैं, क्योंकि हमारी जनता सिर्फ़ प्रेम कहानियां देखना पसंद करती है.

निर्देशक इम्तियाज़ अली ने हाल ही में अपनी फ़िल्म ‘लव आजकल’ के ज़रिए सैफ़ अली खान और दीपिका पादुकोण के टूटते रिश्ते का जश्न मनाया. मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा में ये ऐसी कहानी का पहला कदम था. इसी विषय को एक अलग नज़रिए के साथ पेश कर रहे हैं नए निर्देशक दानिश असलम.

दीपिका अपने सपने साकार करने के लिए आज़ादी चाहती हैं लेकिन इमरान का मानना है कि प्यार में दूरियां नहीं होतीं.

रेणुका कुंज़रू का बेहतरीन लेखन इस फ़िल्म की ख़ासियस है. असल ज़िदगी के क़रीब लगने वाले किरदारों और सहज संवादों ने इस फ़िल्म को एक अलग किस्म की ख़ूबसूरती दी है.

दीपिका और इमरान

Image caption ब्रेक के बाद की वेशभूषा, कला और साज-सज्जा बढ़िया है.

सभी किरदार आजकल के ख़्यालों को जीते हैं और वैसे ही संवाद बोलते हैं. यूं कहें कि फ़िल्म का सारा माहौल इतना सामयिक है कि कुछ खलता नहीं.

मैं फ़िल्म की वेशभूषा, कला और साज-सज्जा को पूरे नंबर देती हूं. दीपिका के घर का कमरा किसी भी आम युवा के घर जैसा ही लगता है.

फ़िल्म का दूसरा भाग थोड़ा धीमा और दोहराव लिए हुए है मगर विशाल- शेखर का संगीत, शहाना गोस्वामी और उनके बाक़ी दोस्तों का बेहतरीन अभिनय फ़िल्म की कहानी की कमियों को भुला देते हैं.

'ब्रेक के बाद' देखनी चाहिए दीपिका और इमरान के बेहतरीन अभिनय के लिए और उनकी कैमिस्ट्री के लिए.

अगर आप प्यार के रिश्ते में हैं और ये रिश्ता तोड़ने के बारे में सोच रहे हैं तो रुकिए और यह फ़िल्म देखिए. हो सकता है आपको अपनी उलझन का कोई जवाब मिल जाए.

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