'अवार्ड से ज़िम्मेदारी बढ़ गई है'

सुभाष साहू
Image caption सुभाष साहू को दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है.

मुंबई फ़िल्मोद्योग में छोटे शहरों के लोग अब धीरे धीरे अपना मुकाम बना रहे हैं. इस शृंखला में आपको मिलवाएंगे ऐसे ही कुछ लोगों से जो संघर्ष की सीढ़ी चढ़ कर फ़िल्मोद्योग में सफल हुए हैं. दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले ऑडियो एडीटर सुभाष साहू की कहानी उन्हीं की ज़ुबानी.

मैं उड़ीसा के पटामुंडई ब्लॉक का रहने वाला हूं. ये जगह राजधानी भुवनेश्वर से भी बहुत दूर है. शहर भी नहीं है. मेरे बचपन में वहां कुछेक दुकानें हुआ करती थी. गाड़ी नहीं जाती थी. देहात या छोटा कस्बा कहिए. बस से उतर कर नदी पार के मेरे घर जाना पड़ता था. अब भी बहुत कुछ नहीं बदला होगा वहां.

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उड़ीसा के गांवों में क्या होता है कि साल में उत्सव होता है तो हम लोग उसमें थिएटर करते थे.मेरे घर के कई और लोग उसमें शामिल होते थे. वहां एक्टिंग करने के बाद मैं एकटर बनना चाहता था लेकिन बाद में पढ़ाई कर के मोदी जेरॉक्स में नौकरी करने लगा.

नौकरी करने के दौरान एक उड़िया अख़बार में एफटीआईआई पुणे का विज्ञापन देखा. उसमें साउंड इंजीनियरिंग वाले कोर्स में साइंस बैकग्राउंड ( इलेक्ट्रानिकस और फीज़िक्स) मांगा था तो मैंने सोचा अप्लाई कर देते हैं बाद में एक्टिंग वहीं सीख भी लेंगे.

मैं आज जो भी हूं वो एफटीआईआई की वजह से हूं. मैंने जो सीखा वहीं सीखा. कोर्स मेरा ऑडियो का था लेकिन एक्टिंग भी करता था. वहां पैसे नहीं होते थे. हम लोग नौ भाई बहन हैं तो मैंने अपनी बहनों से आग्रह किया था कि वो मुझे महीने में दो दो सौ रुपए भेजें.

इसके अलावा तीन साल के कोर्स में गर्मी की छुट्टियों में काम करता था. उसी से खर्चा चलता था. एक्टिंग में बहुत संघर्ष है यही सोच कर मैंने साउंड इंजीनियरिंग अच्छे से सीखा. हां जलवा फ़िल्म और दूरदर्शन के एक सीरियल में छोटे मोटे रोल भी किए.

मैं 185 रुपए लेकर मुंबई आया था पुणे से. ग़रीबी ऐसी थी कि उस ट्रेन में चढ़े जिसमें सबसे कम किराया था. ऑटो वाले ने ठग भी लिया था.

पूना फ़िल्म इंस्टीट्यूट के सीनियरों के साथ रहता था. खाने पीने का टेंशन खत्म तो काम खोजा. 1942 ए लव स्टोरी में साउंड का काम देख रही नमिता नायक के साथ काम मिला.

1996 में पहली उड़िया फ़िल्म मिली. ऑडियो इंजीनियर कहिए या साउंड इंजीनियर कहिए या साउंडवाला कहिए.. यही काम था मेरा. पहली फ़िल्म के लिए राज्य का अवार्ड मिला.

Image caption सुभाष उड़ीसा के अत्यंत पिछड़े इलाक़े के रहने वाले हैं.

रेसूल पोकुट्टी मेरे सीनियर हैं और दोस्त भी. लोग इंडस्ट्री में रेसूल या मुझे सिंक साउंड टेक्नीक के चलते जानते हैं. सिंक साउंड यानी जो शूटिंग चल रही है वही साउंड फ़िल्म में जाए. ये हॉलीवुड में बहुत इस्तेमाल होती है. हम भी इसी टेक्नीक को फॉलो करते हैं. इससे रीडबिंग का खर्चा बचता है और फ़िल्म में एक रियलिटी का सेंस आता है.

आमिर खान की लगान में साउंड का काम नकुल कामटे का था. मैंने और रेसूल ने भी उसमें इनपुट दिया था साउंड में और वो लोगों को बहुत पसंद आई.

हालांकि मेरा काम नोटिस हुआ परफेक्ट हसबैंड नाम की फ़िल्म के बाद. ये इंटरनेशनल प्रोजेक्ट था हालांकि फ़िल्म रीलिज़ नहीं हुई लेकिन लोगों को मेरे काम का पता चला. विशाल भारद्वाज ने ओंकारा का काम दिया तो 2008 में उसके लिए नेशनल अवार्ड भी मिला. फिर कमीने की तो उसके लिए इस साल यानी 2010 में राष्ट्रीय पुरस्कार मिला.

बहुत अच्छा लगता है जब लोग काम पसंद करते हैं. नेशनल अवार्ड से बड़ा क्या सम्मान होगा. एक सपना होता है सभी का. अवार्ड मिलने का.. सपना टूट जाता है. मेरा सपना सच हुआ रिएलिटी में बहुत अच्छा लगता निश्चित रुप से.

'वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई' और 'अतिथि तुम कब जाओगे' में मैंने साउंड दिया है दोनों हिट हुई हैं. एक और फ़िल्म आने वाली है 'स्पिरिट'. हॉरर फ़िल्म है. गाना नहीं है म्यूज़िक नहीं है लेकिन आप देखेंगे साउंड किसी फ़िल्म को क्या से क्या बना सकता है.

अब गांव गांव नहीं रहे. छोटे छोटे शहरों के लोग आ रहे हैं इंडस्ट्री में. मेहनत करने वाला सफल हो रहा है इसमें कोई शक नहीं. आप टीवी पर देखिए. उड़ीसा के प्रिंस ग्रुप को देखिए. मैं तो यही कहूंगा कि आप अपना कर्म ईमानदारी से कीजिए....जो अपना कर्म मेहनत से करता है तो ऊपरवाला उसका ख्याल रखता ही है.

बीबीसी संवाददाता सुशील झा से बातचीत पर आधारित