हिंदी फ़िल्म जगत के लिए कैसा रहा साल 2010

  • 31 दिसंबर 2010

2010 की हिट फ़िल्में

दबंग
Image caption दबंग रही साल 2010 की सबसे बड़ी हिट फ़िल्म.

इस साल कई फ़िल्में दर्शकों की कसौटी पर खरी उतरीं. लेकिन वो कौन सी फ़िल्में थीं जो लोगों को सबसे ज़्यादा पसंद आईं. वो कौन सी फ़िल्में थीं जिन्होंने बॉक्स ऑफ़िस पर धूम मचा दी. फ़िल्म व्यापार विशेषज्ञ कोमल नाहटा के मुताबिक़ ये फ़िल्में रहीं 2010 की सबसे बड़ी हिट फ़िल्में.

1. दबंग- साल की सबसे बड़ी हिट रही सलमान ख़ान अभिनीत दबंग. इसका शुद्ध मुनाफ़ा रहा क़रीब 110 करोड़ रुपए.

मल्टीप्लेक्सेस हों या सिंगल स्क्रीन थिएटर, ये फ़िल्म हर जगह चली. सलमान का स्टारडम, फ़िल्म का संगीत ख़ासतौर पर ‘मुन्नी बदनाम हुई’ ज़बरदस्त हिट रहा.

फ़िल्म के निर्माता, सलमान ख़ान के भाई अरबाज़ ख़ान कहते हैं, “दबंग ने साबित कर दिया कि फ़िल्म अच्छी हो तो ग्रामीण और शहरी, हर तरह के दर्शकों को पसंद आती है. हमारी फ़िल्म समाज के हर वर्ग को पसंद आई.”

Image caption गोलमाल 3 ने भी कामयाबी के झंडे गाड़े.

2. गोलमाल 3- इस साल दीवाली पर दो बड़ी फ़िल्में रिलीज़ हुईं. अक्षय कुमार-ऐश्वर्या अभिनीत विपुल शाह की ऐक्शन रीप्ले और अजय देवगन, करीना कपूर सहित कई सितारों से सजी रोहित शेट्टी की गोलमाल 3.

इनमें बाज़ी मारी गोलमाल 3 ने. फ़िल्म की कहानी में कुछ नया नहीं था लेकिन लोगों को इसका प्रस्तुतिकरण ख़ासा पसंद आया. फ़िल्म ने कुल मिलाकर बॉक्स ऑफ़िस पर क़रीब 35 करोड़ का मुनाफ़ा कमाया.

3. राजनीति- रणबीर कपूर, कटरीना कैफ़, अजय देवगन और मनोज वाजपेई की मुख्य भूमिका वाली राजनीति भी पूरे भारत में पसंद की गई और हर जगह चली.

हालांकि फ़िल्म की लागत बहुत ज़्यादा थी इसलिए प्रतिशत के हिसाब से इसका मुनाफ़ा उतना ज़्यादा नहीं रहा. फ़िल्म के निर्माता ने इसमें क़रीब 70-71 करोड़ रुपए लगाए और राजनीति ने क़रीब 85-86 करोड़ रुपए की कमाई की. यानी कुल मिलाकर 14-15 करोड़ रुपए का फ़ायदा.

4. पीपली लाइव- आमिर ख़ान प्रोडक्शंस की ये कम बजट की फ़िल्म लोगों को ख़ूब पसंद आई.

रघुवीर यादव को छोड़कर फ़िल्म में एक भी नामी गिरामी कलाकार नहीं था, लेकिन अपने स्वस्थ हास्य और सरल कहानी की वजह से इसे दर्शकों की ख़ासी वाहवाही मिली.

10 करोड़ के सीमित बज़ट में बनी इस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफ़िस पर क़रीब 22 करोड़ रुपए कमाए.

इसके अलावा ‘इश्किया’, ‘तेरे बिन लादेन’, 'फ़ंस गए रे ओबामा' भी हिट साबित हुईं.

2010 की फ़्लॉप फ़िल्में

Image caption फ़िल्म व्यापार विशेषज्ञ कोमला नाहटा के मुताबिक़ काइट्स रही साल की सबसे बड़ी फ़्लॉप.

इस साल कई बड़े सितारों की फ़िल्में बॉक्स ऑफ़िस पर औंधे मुँह गिर गईं.

साल के आख़िर में रिलीज़ हुई फ़राह ख़ान की अक्षय कुमार-कटरीना कैफ़ अभिनीत तीसमार ख़ां लोगों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पा रही है. हालांकि इतनी जल्दी इसे फ्लॉप कह देना ठीक नहीं होगा, लेकिन अक्षय-फ़राह की जोड़ी से लोगों को जो आशाएं थीं उस पर तीसमार ख़ां पूरी नहीं उतर पा रही है.

कोमल नाहटा के मुताबिक़ साल की सबसे बड़ी फ्ल़ॉप फ़िल्में हैं.

1. काइट्स- राकेश रोशन ने अपने बेटे ऋतिक रोशन को लेकर ये बेहद महत्तवाकांक्षी फ़िल्म बनाई. इसमें उन्होंने मैक्सिन अभिनेत्री बारबरा मोरी को लिया. निर्देशन की ज़िम्मेदारी अनुराग बसु ने निभाई, लेकिन ये फ़िल्म लोगों ने बुरी तरह से नकार दी.

फ़िल्म ने राकेश रोशन को बड़ा घाटा पहुंचाया. इसके सैटेलाइट अधिकार फ़िल्म के रिलीज़ होने से पहले ही बिक गए थे, लेकिन फ़िल्म के बुरे हश्र के बाद इसकी क़ीमत दोबारा तय की गई, जो पहले से काफ़ी कम आँकी गई.

2. खेलें हम जी-जान से- आशुतोष गोवरीकर के निर्देशन में बनी ये फ़िल्म 1930 में हुए चटगांव विद्रोह पर आधारित थी.

Image caption अभिषेक-ऐश्वर्या की 'रावण' भी बुरी तरह से पिटी.

अभिषेक बच्चन और दीपिका पादुकोण की मुख्य भूमिका वाली इस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफ़िस पर पानी भी नहीं मांगा.

लोग इस कहानी से अपने आपको बिलकुल भी नहीं जोड़ पाए. फ़िल्म के निर्माता का पूरा निवेश बर्बाद हो गया और ये फ़िल्म बड़ा घाटा साबित हुई.

3. रावण- अभिषेक बच्चन के लिए वाकई ये साल बड़ा बुरा साबित हुआ. खेलें हम जी जान से के अलावा उनकी अति महत्वाकांक्षी फ़िल्म रावण भी बुरी तरह से पिट गई.

ना तो अभिषेक-ऐश्वर्या की जोड़ी का जादू चला और ना ही मणिरत्नम का निर्देशन ही कुछ जादू चला पाया.

फ़िल्म की कहानी लोगों के गले नहीं उतरी और ये फ़िल्म बन गई साल की सबसे बड़ी फ्लॉप फ़िल्मों में से एक.

इन फ़िल्मों के अलावा एक और फ़िल्म थी जिसने रिलीज़ से पहले लोगों के मन में बहुत उम्मीदें जगाईं, लेकिन रिलीज़ होते ही वो ठंडी पड़ गई. ये थी संजय लीला भंसाली की ‘गुज़ारिश’.

ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या राय की ख़ूबूसरत जोड़ी भी फ़िल्म को डूबने से नहीं बचा पाई. ये दर्शकों के किसी भी वर्ग को लुभा नहीं पाई.

फ़िल्म समीक्षक अर्णब बनर्जी के मुताबिक़ गुज़ारिश में ऋतिक और ऐश्वर्या की जुगलबंदी लोगों को काफ़ी हद तक बनावटी लगी और दिलों को छू नहीं पाई, जिस वजह से ये फ़िल्म फ्लॉप साबित हुई.

2010 के विवाद

Image caption शाहरुख़ ख़ान की फ़िल्म माइ नेम इज़ ख़ान का शिवसेना ने विरोध किया था.

हर साल की तरह इस साल भी फ़िल्म इंडस्ट्री विवादों से अछूती नहीं रही.

साल की शुरुआत में ही करण जौहर निर्देशित और शाहरुख़-काजोल अभिनीत फ़िल्म 'माइ नेम इज़ ख़ान' को लेकर ख़ासा हंगामा हुआ. ये हंगामा फ़िल्म की विषय-वस्तु को लेकर नहीं बल्कि शाहरुख़ द्वारा दिए एक कथित विवादास्पद बयान पर पनपा.

दरअसल शाहरुख़ ने इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल के तीसरे संस्करण में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को शामिल किए जाने की हिमायत की थी और कहा था कि उनका ना खेलना दुर्भाग्यपूर्ण है.

Image caption शाहरुख़ के ढाका में हुए एक शो के बाद उन पर अश्लीलता फ़ैलाने के आरोप लगाए गए.

इस पर शिवसेना ने शाहरुख़ के बयान को भारत विरोधी करार देते हुए मुंबई समेत पूरे महाराष्ट्र में माइ नेम इज़ ख़ान के बहिष्कार का एलान कर दिया था. शिवसेना के कार्यकर्ताओं ने कई सिनेमाघरों में तोड़फ़ोड़ भी की.

शाहरुख ने इस पर सफ़ाई देते हुए कहा, "हमारा संविधान सबको बोलने की आज़ादी देता है. मैंने भी सिर्फ़ अपनी राय रखी. किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का मेरा कोई इरादा नहीं था. मैंने किसी समुदाय के ख़िलाफ़ तो कुछ कहा नहीं."

आख़िरकार शिवसेना ने फ़िल्म को लेकर अपना विरोध वापस ले लिया.

साल की शुरुआत शाहरुख़ ख़ान से जुड़े विवाद से हई तो साल के ख़त्म होते-होते उनके साथ एक विवाद और जुड़ गया.

10 दिसंबर को बांग्लादेश की राजधानी ढाका में शाहरुख़ ख़ान के शो पर कुछ लोगों ने उंगलियां उठाईं. दरअसल शो के दौरान शाहरुख़ ख़ान ने जो पोशाक पहनी उसे भद्दी कहा गया और उन पर लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाया गया.

Image caption आमिर के 'पीपली लाइव' की निर्देशक अनुषा रिज़वी के साथ विवाद की ख़बरें सामने आईं.

ढाका के एक स्थानीय अख़बार ने तो उन्हें 'अश्लीलता का बादशाह' कह दिया.

इसके बाद शाहरुख़ ख़ान ने कहा, "अलग-अलग जगहों पर लोगों को अलग-अलग बातों पर आपत्ति होती है. अगर किसी को जाने-अनजाने तक़लीफ़ पहुंची हो तो मैं माफ़ी मांग लेता हूं. मैं बेहद पारिवारिक आदमी हूं और मुझे नहीं लगता कि मैंने कुछ ग़लत किया."

फ़िल्म इंडस्ट्री के एक और कद्दावर ख़ान, आमिर ख़ान भी विवाद से बच नहीं पाए. बतौर निर्माता उनकी फ़िल्म 'पीपली लाइव' ने फ़िल्म समीक्षकों के साथ-साथ लोगों की भी ख़ूब वाहवाही पाई और हिट साबित हुई.

फ़िल्म को ऑस्कर के लिए भारत की तरफ़ से भेजे जाने का ऐलान भी कर दिया गया. लेकिन अचानक ऐसी ख़बरें आने लगीं कि पीपली लाइव की निर्देशक अनुषा रिज़वी निर्माता आमिर ख़ान के हस्तक्षेप से ख़ुश नहीं है और उन्होंने ऑस्कर में फ़िल्म का प्रचार ना करने का फ़ैसला कर लिया.

Image caption दीपिका की रणबीर पर की गई टिप्पणी से रणबीर के पिता ऋषि कपूर नाराज़ हुए.

अनुषा ने आमिर के बारे में तो कुछ नहीं कहा लेकिन ऑस्कर के बारे में कहा कि, "मैंने भारतीय लोगों के लिए पीपली लाइव बनाई. ऑस्कर अमेरिका के राष्ट्रीय पुरस्कारों से ज़्यादा कुछ नहीं है. ये फ़िल्म मैंने ऑस्कर के लिए नहीं बनाई."

आमिर ख़ान ने इस बारे में कहा, "मैं अनुषा की टिप्पणी पर कुछ नहीं कह सकता, लेकिन एक निर्माता के तौर पर मेरी जो ज़िम्मेदारी है वो मैंने पूरी तरह से निभाई है और आगे भी निभाता रहूंगा. अनुषा ने इतनी अच्छी फ़िल्म बनाई है और मेरी ये कोशिश है कि पीपली लाइव ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचे."

मशहूर निर्माता निर्देशक करण जौहर अपने मशहूर टीवी शो कॉफी विद करण के तीसरे संस्करण के साथ आए और इस शो ने शुरु होते ही कई विवादों को जन्म दे दिया.

Image caption सोनम कपूर ने भी रणबीर कपूर पर कथित विवादास्पद टिप्पणी की.

इसके एक एपिसोड में दीपिका पादुकोण और सोनम कपूर एक साथ आईं और उन्होंने अभिनेता रणबीर कपूर के बारे में कई ऐसी बातें कहीं जो मीडिया की सुर्खियां बनीं.

दीपिका पादुकोण ने तो यहां तक कहा कि रणबीर को कंडोम का विज्ञापन करना चाहिए क्योंकि वो इसका इस्तेमाल बहुत ज़्यादा करते हैं.

सोनम कपूर ने कहा, "रणबीर एक दोस्त के तौर पर तो बहुत अच्छे हैं, लेकिन एक ब्वॉयफ़्रेंड के तौर पर नहीं."

बाद में रणबीर के पिता अभिनेता ऋषि कपूर ने दोनों अभिनेत्रियों की इन टिप्पणियों पर सख़्त एतराज़ जताया था.

2010 के नए चेहरे

Image caption सोनाक्षी सिन्हा ने अपनी पहली ही फ़िल्म से लोगों के दिलों में जगह बनाई.

इस साल हिंदी फ़िल्म जगत में कई नए चेहरे आए जिन्होंने आते ही अपनी छाप छोड़ी. इसमें सबसे प्रमुख हैं मशहूर अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा की बेटी सोनाक्षी सिन्हा.

सलमान ख़ान के साथ उन्होंने 'दबंग' से अपने करियर की शुरुआत की. इतने बड़े सितारे के फ़िल्म में होने के बावजूद सोनाक्षी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में पूरी तरह से कामयाब साबित हुईं.

पहली ही फ़िल्म में उनका अभिनय आत्मविश्वास से भरा रहा और लोगों को उनमें परंपरागत भारतीय नारी का सौंदर्य नज़र आया.

Image caption बतौर निर्देशक अभिनव कश्यप की पहली ही फ़िल्म 'दबंग' सुपरहिट साबित हुई.

फ़िल्मों में अपने करियर की शुरुआत के बारे में सोनाक्षी बताती हैं, “मैंने फ़ैशन डिज़ाइनिंग का कोर्स किया था. एक दिन एक पार्टी में सलमान और अरबाज़ ने मुझे परंपरागत भारतीय पोशाक में देखा, तो उन्हें लगा कि ‘दबंग’ की रज्जो के लिए मैं बिलकुल फ़िट हूं. तब अरबाज़ और अभिनव मेरे घर आए. उन्होंने पिताजी, मां और मुझे स्क्रिप्ट सुनाई जो हम सबको बेहद पसंद आई. उसके बाद तो ना कहने का सवाल ही नहीं था.”

‘दबंग’ से ही अपने निर्देशन के करियर की शुरुआत की अभिनव कश्यप की. वो ‘ब्लैक फ़्राइडे’, ‘देव डी’ और ‘गुलाल’ जैसी फ़िल्में बना चुके अनुराग कश्यप के छोटे भाई हैं. लेकिन ‘दबंग’ से अभिनव ने अपनी एक अलग पहचान बनाई.

इस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफ़िस पर ज़बरदस्त कमाई की और अभिनव ने अपनी इस पहली ही फ़िल्म से अपना लोहा मनवा दिया.

‘दबंग’ की कामयाबी पर वो कहते हैं, “मैंने अपनी समझ के हिसाब से जो अच्छा लगा वो किया. लेकिन मैंने ये नहीं सोचा था कि मेरा काम लोगों को इतना ज़्यादा पसंद आएगा.“

लेकिन अगर इस साल किसी फ़िल्मकार का नाम अपनी पहली ही फ़िल्म से सबसे ज़्यादा चर्चा में आया तो वो नाम है अनुषा रिज़वी का.

अनुषा ने आमिर ख़ान प्रोडक्शंस की फ़िल्म ‘पीपली लाइव’ का निर्देशन किया और समीक्षकों के साथ-साथ दर्शकों की भी ख़ूब वाहवाही पाई.

ग्रामीण परिवेश पर बनी ये फ़िल्म भारतीय मीडिया पर कटाक्ष करती है. इसने कई अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में भी प्रशंसा पाई.

अनुषा कहती हैं, “मुझे लगा कि आम लोगों की ज़िंदगी पर एक ऐसी फ़िल्म बनानी चाहिए जो वास्तविकता के बेहद क़रीब हो. मेरे ख़्याल से बैंडिट क़्वीन के बाद ये पीपली लाइव ही ऐसी फ़िल्म है जो देहाती इलाकों में बसे लोगों की सच्चाई दिखाती है.”

विशाल भारद्वाज की ‘इश्क़िया’ ने भी लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा. अभिषेक चौबे ने इसके साथ निर्देशन के मैदान में क़दम रखा.

नसीरुद्दीन शाह, अरशद वारसी और विद्या बालन के अभिनय से सजी ये फ़िल्म अपनी अलग कथावस्तु की वजह से ख़ूब चर्चा में रही और दर्शकों की कसौटी पर खरी भी उतरी.

अभिषेक कहते हैं, “एक फ़िल्म मेकर के तौर पर मैं अपने आपको उस जगह तक पहुंचाना चाहता हूं, जहां से मैं अपनी मर्ज़ी के हिसाब से काम कर सकूं. मुझे उम्मीद है कि इश्किया के बाद शायद लोग अलग तरह की फ़िल्में बनाने की हिम्मत कर सकें.”

Image caption पाकिस्तानी गायक अली ज़फ़र ने बतौर कलाकार 'तेरे बिन लादेन' से हिंदी फ़िल्मों में कदम रखा.

एक और चेहरे ने अपनी तरफ़ लोगों का ध्यान खींचा और वो हैं पाकिस्तानी गायक और कलाकार अली ज़फ़र.

फ़िल्म ‘तेरे बिन लादेन’ से उन्होंने हिंदी फ़िल्मों में बतौर कलाकार अपने करियर की शुरुआत की. फ़िल्म के साथ-साथ अली का काम भी लोगों को काफ़ी पसंद आया.

वो कहते हैं, “इस फ़िल्म से पहले भी मेरे पास कई ऑफ़र आए थे. लेकिन जब ये स्क्रिप्ट मेरे पास आई तो मुझे ये आइडिया बहुत फ़्रेश लगा. तो मैंने ठान लिया कि ‘तेरे बिन लादेन’ से ही अपना करियर शुरु करूंगा.”

इसी तरह से अनुराग कश्यप की फ़िल्म ‘उड़ान’ भी इस साल आकर्षण का केंद्र रही. इसका निर्देशन किया विक्रमादित्य मोटवानी ने.

विक्रामादित्य मानते हैं कि एक फॉर्मूला फ़िल्म बनाना तो बहुत आसान है. लीक से हटकर काम करना मुश्किल होता है. उनके मुताबिक़ उड़ान को लंबे समय तक याद रखा जाएगा.

हीरो नंबर वन

Image caption विशेषज्ञों के मुताबिक़ सलमान ख़ान रहे साल के सबसे कामयाब अभिनेता.

साल के हीरो नंबर वन निश्चित तौर पर सलमान ख़ान रहे. उनकी ‘दबंग’ ने बॉक्स ऑफ़िस पर इतिहास रचा और साल की सबसे बड़ी हिट साबित हुई.

काफ़ी लंबे समय के बाद सलमान ने पर्दे पर वो सब किया, जिसके लिए वो अपने प्रशंसकों के बीच मशहूर हैं. उन्होंने कॉमेडी की, ठुमके लगाए और साथ में ज़बरदस्त ऐक्शन सीन किए.

Image caption टीवी पर भी सलमान का जादू ख़ूब चला.

फ़िल्म व्यापार विशेषज्ञ कोमल नाहटा के मुताबिक़ सलमान की स्टारडम के जादू ने ही दबंग को ज़बरदस्त क़ामयाबी दिलाई. सलमान अपने किरदार में पूरी तरह से समा गए और जैसे ही वो पर्दे पर आते पूरा सिनेमाहॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता.

फ़िल्म समीक्षक अर्णब बनर्जी के मुताबिक़ दबंग उत्तर भारत के साथ-साथ दक्षिण भारत में भी ख़ासी चली. सलमान ख़ान की लोकप्रियता बैंगलूरु, चेन्नई और पूरे केरल में छाई रही और लोगों ने उनके अभिनय का पूरा लुत्फ़ उठाया.

साथ ही टेलीविज़न शो 'बिग बॉस' में भी सलमान ख़ान का जादू ख़ासा चला.

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