फ़िल्मी पुरस्कार या टीआरपी तमाशा

गीता का ज्ञान है कि कर्म किए जा,फल की इच्छा मत कर ऐ इंसान...लेकिन इंसानी फ़ितरत है कि वो मेहनत करता है तो मेहनत का फल पाने की हसरत रहती ही है.इसीलिए शायद पुरस्कार दिए जाते हैं. फ़िल्मी दुनिया भी इनदिनों पुरस्कार समारोहों से गुलज़ार है, कुछ लोगों की तो शिकायत है कि कुछ ज़्यादा ही गुलज़ार है.

फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड, बिग एंटरटेनमेंट अवॉर्ड, स्टार स्क्रीन अवॉर्ड, ज़ी सिने अवॉर्ड, आईफ़ा, अप्सरा अवॉर्ड इत्यादि-इत्यादि... समारोहों की लंबी चौड़ी फ़ेहरिस्त में अगर आप खोया-खोया सा महसूस कर रहे हों तो आप अकेले नहीं है.

लोग सवाल उठा रहे हैं कि हुनर और सिनेमा में उत्कृष्टता को सलाम करने के लिए बना पुरस्कारों का मंच अब महज़ टीआरपी अर्जित करने वाला एक टीवी तमाशा बनकर रह गया है?

नसीरुद्दीन शाह, अजय देवगन, मधुर भंडारकर, करीना कपूर जैसे सितारों ने तो इन समारोहों की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए हैं.

कभी हमारे आपके ज़हन पर चंद फ़िल्मी समारोहों का कब्ज़ा था, ये जानने की उत्सुकता रहती थी कि आपके पसंदीदा कलाकार को पुरस्कार मिला या नहीं. समारोह की रात ये पुरस्कार लाइव आते तो देर रात जगकर इन्हें लाइव देखने का कौतूहल भी था. लेकिन अब ऐसा लगता है मानो सम्मान समारोह के दायरे से निकलकर ये पुरस्कार बाज़ार में उतर आए हैं..

टीआरपी का खेल

वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार भावना सोमाया पत्रिका स्क्रीन की संपादक रही हैं. वे कहती हैं," फ़िल्म पुरस्कार प्रसारित करने के लिए चैनलों और प्रायोजकों के साथ बिज़नस डील होती है, ये एक बाज़ार की तरह बन गया है. यहाँ दर्शक की कौन सोच रहा है? मैंने इस तरह के अवॉर्ड किए हैं, मैं जानती हूँ कि कई तरफ़ से दवाब होता है. हर टीवी चैनल को लगता है कि इतना बड़ा शो करना है तो बड़े सितारों का आना ज़रूरी है, उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करनी है तो उन्हें अवॉर्ड देना पड़ेगा. वरना टीवी शो फ़्लॉप होता है, टीआरपी नहीं मिलती."

स्टार और फ़िल्मफ़ेयर से हमने प्रतिक्रिया के लिए फ़ोन किया और मेल डाला लेकिन जवाब का अब तक इंतज़ार है.

फ़िल्म आलोचक अनुपमा चोपड़ा तंज कसते हुई कहती हैं कि इन दर्जन भर फ़िल्मी समारोहों में हर साल नई और 'सृजनात्मक' श्रेणियाँ जोड़ दी जाती हैं- बेस्ट जोड़ी, पावर अवॉर्ड, सर्वश्रेष्ठ दृश्य, ज्यूरी अवॉर्ड, पॉपुलर अवॉर्ड वगैरह-वगैरह ताकि सबको ख़ुश किया जा सके.

कई कलाकारों की शिकायत है कि कई बार अच्छी प्रतिभाओं को नामांकन तक नहीं मिलता.

अभिनेता अजय देवगन ने ख़ुले आम कहा है, "अगर आप इन समारोहों में आने का निमंत्रण स्वीकार करते हैं तो आपकी झोली में अवॉर्ड डाल दिया जाता है. आप खाली हाथ न जाएँ इसके लिए अलग श्रेणी भी बना दी जाती है. आप नहीं आ सकते तो अवॉर्ड नहीं मिलेगा."

'हौसला अफ़ज़ाई होती है'

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हालांकि ऐसा नहीं है कि हर कोई पुरस्कारों से नाराज़ है. कम बजट और बड़े सितारों की चकाचौंध के बगैर बनी फ़िल्म उड़ान को इस बार स्टार स्क्रीन समारोह में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और निर्देशक का अवॉर्ड मिला.

फ़िल्म के निर्देशक विक्रमादित्य मोटवाने कहते हैं,"कलाकारों के लिए पुरस्कार मायने रखते हैं.अवॉर्ड मिलता है तो वो पुरस्कार हमेशा के लिए आपका हो जाता है, कोई छीन नहीं सकता. इन पुरस्कारों के ज़रिए फ़िल्म उद्योग ने हमें एक पहचान दी है, बहुत से लोगों का हौसला बढ़ता है."

विक्रमादित्य मोटवाने उत्साहित ज़रूर हैं लेकिन इस कड़वी सच्चाई को वे भी मानते हैं कि बाज़ार सर्वोपरी है और बड़े सितारों को ख़ुश करना पड़ता है. उनका मानना है कि अगर चीज़ों को सामान्य करना है तो पुरस्कार समारोहों की संख्या कम करनी होगी.

ऐसे समारोहों से जुड़ी रही भावना सोमाया बताती हैं कि पर्दे के पीछे भी अलग-अलग खींचतान होती है. वे बताती हैं,"समारोह करवाना भी टेढ़ी खीर है,जिसे निमंत्रण न मिले वो कहते हैं हमें कार्ड दो, जिसे कार्ड मिल जाए वो कहते हैं हमें अच्छी सीट दो, अच्छी सीट मिल जाए तो उन्हें होस्ट बनना रहता है, फिर किसी को लगता है कि उसे नामांकन क्यों नहीं मिला, नामांकन मिलने वाले को लगता है कि उसे जीतना चाहिए..आख़िर कब तक, कहाँ तक और किन-किन को आप ख़ुश कर सकते हैं."

निकलेगी गुब्बारे की हवा?

फ़िल्म समीक्षक अनुपमा चोपड़ा भी मानती हैं कि इन समारोहों में पारदर्शिता नहीं है. वे कहती हैं,"हमें तो ये तक नहीं पता कि इन समारोहों में वोटिंग कैसे होती है. एक ही समारोह में सलमान खान को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता चुना गया तो शाहरुख़ खान को बेस्ट एक्टर पॉपुलर च्वाइस का तमगा दिया जाता है. एक समारोह में दो सर्वश्रेष्ठ एक्टर कैसे हो सकते हैं."

ट्विटर जैसे माध्यमों ने ऐसे लोगों को अलग रास्ता दिखाया है. फ़िल्म प्रेमियों, ब्लॉगरों, फ़िल्म आलोचकों ने तमाम फ़िल्म समारोहों को नकारते हुए अब ट्विटर फ़िल्म अवॉर्ड शुरु किए हैं जहाँ टि्वटर पर जाकर आप वोट डाल सकते हैं.

ये क़दम क्या रंग लाएगा कहना मुश्किल है. लेकिन अभी तो हुनर को सम्मानित करने की सरल और मासूस सी प्रक्रिया एक भूलभुलैया और बाज़ार के हेर-फेर में फँसी दिखती है..जहाँ टीवी चैनलों के प्रोमो चीख-चीख कर दर्जन भर पुरस्कार समारोहों की पैरवी करते हैं कि आप उनका ही कार्यक्रम देखें.

पर जैसा कि भावना सोमाया कहती हैं कि हर ऐसे गुब्बारे का हवा कभी न कभी निकल ही जाती है जो ज़रूरत से ज़्यादा फूल गया हो.... अनुपमा चोपड़ा जैसे लोग मानते हैं कि कभी न कभी फ़िल्म उद्योग को ख़ुद आत्ममंथन करना होगा कि आख़िर वे एक टीवी तमाशा चाहते हैं या सच में अच्छे सिनेमा को सम्मान देना चाहते हैं. वहीं मधुर भंडारकर अपने अंदाज़ में कहते हैं कि क्यों न फ़िल्मी अवॉर्ड पर एक फ़िल्म ही बनाई जाए.

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