क्या झूमने पर मजबूर करेगा 'झूम'

अली ज़फ़र
Image caption अली ज़फ़र के एलबम 'झूम' को सामान्य करार देते हैं पवन झा.

मशहूर पाकिस्तानी पॉप स्टार अली ज़फ़र एक अंतराल के बाद अपने नए एलबम के साथ हाज़िर हैं, जिसका नाम है 'झूम'.

भारत में अली ज़फ़र पिछले साल आई फ़िल्म तेरे बिन लादेन में मुख्य भूमिका से पहचान बनाने में कामयाब रहे थे और यशराज की आने वाली फ़िल्म मेरे ब्रदर की दुल्हन में भी अहम भूमिका में दिखाई देंगे.

'झूम' से पहले अली ज़फ़र के दो एलबम ‘हुक्का पानी’ और ‘मस्ती’ आ चुके हैं.

‘झूम’ में कुल 12 ट्रैक्स हैं और अली ज़फ़र ने अपने हल्के फ़ुल्के मस्ती भरे गीतों से हट कर थोड़ा गंभीर सूफ़ियाना किस्म का संगीत देने की कोशिश की है.

‘दिल झूम झूम’ एलबम का पहला ट्रैक है. गीत धीमी ताल का है और वाद्य संयोजन प्रभावी है खासकर तबले का प्रयोग. लेकिन अली ज़फ़र की गायकी कमज़ोर है और गीत के असर को कम करती है.

इस एलबम के कई गीत अली ज़फ़र टेलीविज़न श्रंखला 'कोक स्टुडियो' में पहले प्रस्तुत कर चुके हैं जिसमें दास्ताने इश्क़ काफ़ी लोकप्रिय हुआ है.

धुन अच्छी है और पंजाबी फ़ोक में अली ज़फ़र के स्वर जमते हैं. गीत एलबम में आफ़ताब के स्वरों में ढोल संस्करण में भी है मगर मुख्य संस्करण जितना प्रभावी नहीं है.

‘नहीं रे नहीं’ अली ज़फ़र की अगली प्रस्तुति है. बोल दार्शनिक किस्म के हैं मगर धुन और गायकी गीत को अपेक्षित स्तर पर ले जाने में नाकाम रही है.

एलबम की एक और प्रस्तुति है ‘अल्ला हू’. इसकी खास बात है गीत के स्वर, जो सूफ़ियाना वातावरण गढ़ने में सबसे ज्यादा योगदान देते हैं. खासकर अली ज़फ़र के साथ तुफ़ैल अहमद के स्वर. एलबम की सबसे प्रभावी प्रस्तुति कहा जा सकता है ये गीत.

एलबम को गंभीर संगीत का जामा पहनाने के लिये अली ज़फ़र ने कुछ क्लासिक रचनाओं के साथ भी प्रयोग किये हैं जिनमें मिर्ज़ा ग़ालिब की ‘जी ढूंढता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन’ और ‘कोई उम्मीद भर नज़र नहीं आती’ और गुलाम फ़रीद की 'यार दड्ढी इश्क़' शामिल हैं.

मगर अली ज़फ़र के ये प्रयोग उनकी परिपक्वता में कमी को दर्शाते ज्यादा हैं और क्लासिक रचनाओं के आधार के बावजूद दिल को छू नहीं पाते.

एलबम में कुछ हल्के फुल्के रोमांटिक गीत भी शामिल हैं. 'जब से देखा है तुझको' बॉलीवुड का प्रभाव लिए एक रोमांटिक गीत है जिसकी धुन और अली ज़फ़र की गायकी दोनो कुछ साल पहले आई फ़िल्म सलाम-ए-इश्क़ में अदनान सामी के लोकप्रिय गीत ‘दिल क्या करे’ की याद दिलाते हैं.

‘तू जाने ना’ भी इसी किस्म का हल्का फुल्का रोमांटिक गीत है.

कुल मिलाकर अली ज़फ़र ना तो झूम से धूम मचाने में कामयाब हुए हैं ना ही सूफ़ी संगीत का माहौल बना पाये हैं.

खासकर उनकी गायकी में गहराई की कमी है, रियाज़ की कमी है और शायद वे गायकॊ की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो प्रैक्टिस के बजाय सीधे परफ़ारमेंस में यक़ीन रखती है.

रेटिंग के लिहाज़ से पाँच में से दो से ज्यादा नहीं बनते हैं मगर अल्ला-हू और कुछ प्रयोगों के लिये मैं ढाई नंबर देता हूं.

संबंधित समाचार