रंगमंच से सिनेमा, सिनेमा से रंगमंच

  • 18 मार्च 2011
ललित मोहन जोशी और शशि कपूर इमेज कॉपीरइट BBC World Service

मुंबई के पृथ्वी थिएटर में 2010 के अंत में चल रहे एक नाट्य महोत्सव के दौरान व्हील चेयर में बैठी एक शख़्सियत के सामने मैं आदर भाव से झुकता हूँ. 'शशि कपूर साहेब आप कैसे हैं?' कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे शशि कपूर एक कमज़ोर मुस्कुराहट के साथ मेरा स्वागत करते हैं.

भारतीय सिनेमा की इस हस्ती के साथ बीबीसी बुश हाउस लन्दन में हुई कई मुलाक़ातें और उनकी कई यादगार फ़िल्में याद आने लगती हैं. ख़ासतौर से 1970 के दशक की दीवार फ़िल्म का एक अविस्मर्णीय प्रसंग आँखों के सामने घूम जाता है. एक ईमानदार पुलिस अफ़सर रवि (शशि कपूर) की क़ानून से भटके अपने बड़े भाई विजय (अमिताभ बच्चन) के बीच तकरार हो रही है.

विजय- 'मैं जो कहना चाहता हूँ उसके पहले ये पूछ लूं कि इस वक़्त मुझे सुनने वाला कौन है एक भाई या एक पुलिस अफ़सर?' रवि- जब तक एक भाई बोल रहा है एक भाई सुन रहा है, जब एक मुजरिम बोलेगा एक पुलिस अफ़सर सुनेगा.

इस प्रसंग के चरमोत्कर्ष में शशि कपूर का संवाद 'मेरे पास माँ है' आज हिंदी सिनेमा की अटूट स्मृति का हिस्सा बन चुका है.

किरदार

Image caption शशि कपूर की शुरूआत थिएटर से हुई जिससे वह अभी तक जुड़े हैं

भूमिका चाहे श्याम बेनेगल की जूनून (1978) में प्यार की आग में झुलसते जावेद ख़ान की हो, आधुनिक महाभारत के पारिवारिक प्रतिशोध के चक्रव्यूह में क़ैद कर्ण की (कलयुग, 1981) या फिर खोजी पत्रकारिता के दौरान राजनीतिक हिंसा के भंवर में फंसे पत्रकार विकास पांडे की (न्यू डेल्ही टाइम्स, 1985), शशि कपूर द्वारा निभाए गए सभी किरदारों की सहजता और सादगी की भीतरी तहों में अभिनय और कला की गहराइयाँ आती हैं. भारतीय रंगमंच और सिनेमा के प्रतिष्ठित कलाकार, स्वर्गीय पृथ्वीराज कपूर के सबसे छोटे पुत्र, शशि कपूर की इस सादगी को मैंने सबसे पहले 1990 के दशक में बीबीसी हिंदी सेवा के लिए की गई एक अन्तरंग भेंट वार्ता के दौरान महसूस किया था जब उन्होंने अपने संघर्ष की कहानी बयान की थी.

उन्होंने कहा था, “हमने थोड़ा बहुत जो भी सीखा थिएटर के ज़रिए मुश्किल रास्तों से गुज़र कर. पापाजी के साथ बचपन से एक आम रंगकर्मी की तरह कोई भी काम करना होता था और फ़िल्मों में राज साहेब से सीखा. बहुत प्यार करते थे पर कोई रियायत नहीं होती थी. कड़ाई से काम लेते थे.'' शशि कपूर का जन्म 18 मार्च 1938 को कलकत्ता में हुआ. उनके बचपन का नाम बलबीर राज था. एक बाल कलाकार के रूप में उन्होंने राजकपूर की आग (1948) और आवारा (1951) में राज कपूर के बचपन की भूमिकाएं अदा की.

शेक्सपियराना

किशोर शशि कपूर की प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा रंगमंच से हुई. सीखने के लिए एक ओर पृथ्वी थिएटर था और दूसरी ओर शहर-शहर घूमता जिओफ़्री केंडल का थियेटर ‘शेक्सपियराना’. यहीं शशिकपूर की मुलाक़ात अपनी भावी पत्नी जेनिफ़र केंडल से हुई और दोनों ने पूरी प्रतिबद्धता के साथ अपने को रंगमंच को समर्पित करने की ठानी. दोनों ने मिलकर शेक्सपियराना थिएटर की मशहूर प्रस्तुतियां औथेलो, हेमलेट आदि नाटकों में काम किया. वर्ष 1960 तक आते आते संघर्ष का दौर आया. आर्थिक कारणों से पृथ्वी थिएटर के दरवाज़े बंद हो गए और शेक्सपियराना भी घाटे में चलने लगा. अपने परिवार के भरण पोषण के लिए शशि कपूर ने हिंदी फ़िल्मों के दरवाज़े खटखटाए.

शुरूआत अच्छी नहीं रही. पहली तीन फ़िल्में कृष्ण चोपड़ा की 'चार दिवारी' (1961), यश चोपड़ा की 'धर्म पुत्र' (1961) और बिमल रॉय की 'प्रेम पत्र' (1962) बॉक्स ऑफ़िस पर पूरी तरह विफल रहीं.

नायक के रूप में शशि कपूर को पहली बॉक्स ऑफ़िस सफलता, सूरज प्रकाश की 'जब जब फूल खिले' (1965) से हासिल हुई. इसके बाद यश चोपड़ा की 'वक़्त' (1965) , प्रकाश मेहरा की 'हसीना मान जाएगी' (1968) जैसी फ़िल्मों ने उन्हें फ़िल्मी सितारों की कोटि में ला खड़ा किया.

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Image caption वालमिकी की रामायण के लिए सईद जाफ़री और शशि कपूर

पर 1970 के दशक में उन्होंने अपने आप को एक संवेदनशील अभिनेता के रूप में स्थापित किया. 'दीवार' के अतिरिक्त यश चोपड़ा की 'कभी कभी' (1976) में उन्होंने एक समझदार और उदार प्रेमी की भूमिका अदा की. साथ ही साथ उन्होंने कला फ़िल्मों से भी अपने आप को जोड़ा.

अंतरराष्ट्रीय

शशि कपूर भारतीय सिनेमा के पहले अभिनेता हैं जिनके अभिनय कैरिएर को सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय ख्याति हासिल हुई. शशि कपूर के अंतरराष्ट्रीय अभिनय कैरिएर की शुरुआत तब हुई जब इस्माइल मर्चेंट और मर्चेंट एवरी, रूथ प्रवर झाबवाला के उपन्यास 'द हाउसहोल्डर' पर एक फ़िल्म बनाने के सिलसिले में उनसे मिले.

शशि कपूर और लीला नायडू की जोड़ी को लेकर बनी 'द हाउसहोल्डर' ने उनके लिए एक अंतरराष्ट्रीय पुल का काम किया. इसके बाद आई शेक्सपियर वाला (1965), 'हीट एंड डस्ट' (1982) और 'सिद्धार्थ' (1972) जैसी फ़िल्मों ने शशि कपूर की प्रतिभा को नई ऊँचाइयाँ दीं.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंतिम महत्वपूर्ण फ़िल्म जिसमें उन्होंने अभिनय किया जमील देहलवी की 'जिन्ना' (1998) है जिसमें उन्होंने सूत्रधार की भूमिका निभाई है.

सन 1980 में शशि कपूर की एक और उपलब्द्धि अपनी निजी फ़िल्म कंपनी 'फ़िल्म वालाज़' की स्थापना थी जिसने '36 चौरंगी लेन' (1981), 'जूनून' (1978), 'कलयुग' (1981) और 'उत्सव' (1982) जैसी फ़िल्मों का निर्माण कर नई धारा के सिनेमा को बढ़ावा दिया.

इस बीच पृथ्वी थिएटर का एक और महोत्सव समाप्त हो गया है. शशि कपूर ने 1978 में इसकी पुनः शुरुआत की थी.

आज उनकी बेटी संजना कपूर इसे चलाती हैं पर मुझे लगता है कि उन्हें आज कुछ कर गुज़रने की जो इच्छा शक्ति और ऊर्जा हासिल होती है वह व्हीलचेयर पर बैठी उसी हस्ती की मुस्कराहट से जिसका नाम है शशि कपूर.

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