‘कोई भी रोल बख़ूबी निभाने की क्षमता है’

अभिनेता अनुपम खेर
Image caption अनुपम खेर मानते हैं कि उनमें कोई भी रोल बख़ूबी निभाने की क्षमता है और इसका श्रेय वो ऐक्टिंग ट्रेनिंग को देते हैं.

जाने-माने अभिनेता अनुपम खेर मानते हैं कि उनमें कोई भी रोल बख़ूबी निभाने की क्षमता है और इसका श्रेय वो ऐक्टिंग ट्रेनिंग को देते हैं.

फ़िल्म ‘सारांश’ से फ़िल्मों में कदम रखने वाले अनुपम खेर ने ख़ुद को कभी किसी सीमा में नहीं बांदा. उन्होंने अपने लंबे करियर में सभी तरह के रोल किए हैं. इस बारे में अनुपम कहते हैं, “इसमें ऐक्टिंग में ट्रेनिंग काफ़ी काम आती है. मैंने ऐक्टिंग में चंडीगढ़ से एक साल का डिप्लोमा किया और फिर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, एनएसडी, से तीन साल का कोर्स किया. इससे मुझे इस बात का एहसास तो हो ही गया कि मैं कोई भी रोल बख़ूबी निभाने की क्षमता रखता हूं.”

ये बात उन्होंने हाल ही में बीबीसी के साथ एक ख़ास बातचीत में कही.

सात मार्च, 1955 को जन्मे अनुपम खेर ने अपनी पहली फ़िल्म में एक बुज़ुर्ग का रोल निभाया था. वो कहते हैं, “अपनी पहली फ़िल्म ‘सारांश’ में मैं 27 साल का था जब मैंने 65 साल के बुज़ुर्ग की भूमिका निभाई थी. ये इस बात का प्रमाण है कि मुझे अपना काम आता है. उसके बाद ‘कर्मा’, ‘सौदागर’, ‘राम लखन’, ‘दिल है कि मानता नहीं’, ‘दिल’ और ऐसी ही बहुत अलग-अलग तरह की फ़िल्में मैंने कीं. एक ऐक्टर का काम होता है कि वो हर किस्म के रोल आसानी से कर सके.”

अनुपम ख़ुद को ख़ुशकिस्मत मानते हैं कि उन्हें अलग-अलग किस्म के रोल करने का मौका मिला और उनमें तारीफ़ भी मिली. उनकी फ़ेहरिस्त में ऐसी कई फ़िल्में हैं जिन पर उन्हें गर्व महसूस हो.

लेकिन वो ये भी कहते हैं कि कोई भी ऐक्टर अपने हर रोल से संतुष्ट हो, ये मुमकिन नहीं है क्योंकि ज़िंदगी बढ़ने के साथ नज़रिया भी बदलता है और तब अपने पुराने रोल को देखकर लगता है कि इसमें मैं यह अलग कर सकता था.

फ़िल्मों के अलावा अनुपम खेर थियेटर और टेलिविज़न से भी जुड़े हैं और उनका अपना ऐक्टिंग स्कूल भी है. वो तीनों ही माध्यमों को पसंद करते हैं लेकिन मानते हैं कि थियेटर में ऐक्टर को उसकी औकात पता चलती है.

अनुपम कहते हैं, “अच्छा ऐक्टर तीनों ही माध्यम में अच्छा काम करता है. इतना ज़रूर है कि नाटक क्योंकि ‘लाइव’ होता है और ‘रीटेक’ की गुंजाइश नहीं होती, इसलिए हर शाम थियेटर में परफ़ोर्मेंस फ़र्क हो सकती है. स्टेज पर आपको अपनी अभिनय क्षमता का भी एहसास होता रहता है क्योंकि एक बार आप स्टेज पर आ गए फिर बस आप और आपके दर्शक....थियेटर में ऐक्टर को उसकी औकात पता चलती है.”

ये पूछे जाने पर कि क्या हिंदी फ़िल्में हिंदी थियेटर पर हावी हो गई हैं, अनुपम का जवाब था, “ये तो उसी तरह है कि मुन्नी बदनाम हुई या शीला की जवानी बहुत हद तक शास्त्रीय संगीत पर हावी हो चुका है. हम उस दौर से गुज़र रहे हैं जहां ‘इन्सटेंट’ चीज़ें अच्छी लगती हैं लेकिन उनकी ‘शेल्फ़लाइफ़’ भी उतनी ही होती है. कल जब कोई दूसरा गाना आ जाएगा तो वो मशहूर हो जाएगा. फ़िल्मों से थियेटर की परंपरा पर फ़र्क तो पड़ा है लेकिन वो पूरी तरह से मिट जाए ऐसा नहीं होगा.”

अनुपम खेर ने 2002 में एक फ़िल्म, ‘ओम जय जगदीश’ का निर्देशन भी किया था. लेकिन उसके बाद किसी और फ़िल्म का निर्देशन नहीं करने के बारे में उनका कहना था, “निर्देशन एक फ़ुलटाइम जॉब है. इसमें कम-से-कम एक साल तो लग ही जाता है. मेरे पास हमेशा ऐसे प्रोजेक्ट रहे हैं जिसकी वजह से मैं (निर्देशन) एक साल नहीं दे सका. दूसरी बात मैं अपनी लिखी कहानी पर फ़िल्म बनाना चाहता हूं जिसमें अभी वक्त है.”

अनुपम खेर सेंसर बोर्ड के चीफ़ भी रह चुके हैं. पिछले दिनों प्रकाश झा ने कहा था कि सेंसर बकवास चीज़ है और लोगों को सही-ग़लत का ख़ुद फ़ैसला करने देना चाहिए.

लेकिन अनुपम खेर मानते हैं कि भारत में सेंसर बोर्ड की अब भी ज़रूरत है. वो कहते हैं, “ये बात बड़े-बड़े शहरों में रहने वाले ‘सूडो-इंटलैक्च्यूल्ज़’ के लिए कहना आसान है. बड़े शहरों में रहने वालों के लिए सेल्फ़-सेंसरशिप आसान है लेकिन हिंदुस्तान की सत्तर प्रतिशत आबादी गांव और छोटे शहरों में रहती है. वहां पर सोच इतनी बड़ी नहीं होती. इसलिए मुझे लगता है कि सेंसरशिप होना ज़रूरी है. हां, सेंसरशिप के हमारे नियम बहुत पुराने हैं जिन पर फिर से विचार करना ज़रूरी है.”

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