बड़े सवाल उठाती एक लघु फ़िल्म

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एक बच्चे का मासूम सवाल है कि शहीद किसे कहते हैं और शहीद होने पर क्या मिलता है?

उसके स्कूल के मास्टर जी उसे एक सीधा सा जवाब देते हैं कि जो भी देश के लिए जान देता है वह शहीद होता है.

इस बच्चे के पिता पुलिस के सिपाही थे. वे नक्सलियों के साथ हुई मुठभेड़ में मारे गए.

उसने सुना कि उसके पिता शहीद हो गए. उसने यह भी सुना कि अधिकारी उसके पिता को सम्मान दिलवाने का आश्वासन दे रहे हैं. लेकिन उसने देखा कि सम्मान मिलना तो दूर सरकार की ओर से मुआवज़ा पाने के लिए उसकी माँ से कहा जा रहा है कि वह सिपाही की विधवा होने का सबूत ले आए.

इस बीच वह टेलीविज़न पर देख रहा है कि मुंबई में हुए चरमपंथी हमलों में मारे गए सुरक्षा बलों के जवानों को जगह-जगह श्रद्धांजलि दी जा रही है.

उनकी तस्वीरें चौराहों पर रखकर मोमबत्तियाँ जलाई जा रही हैं. उनके परिजनों का सम्मान किया जा रहा है. नेता फोटो खिंचवा रहे हैं.

लेकिन वह पाता है कि उनके स्कूल पहुँचा एक छुटभैया नेता भी उसके साथ फोटो खिंचवाने से इनकार कर देता है.

आख़िर में हारकर वह अपने कुछ दोस्तों के साथ अपने पिता की तस्वीर पर मोमबत्ती लगाकर अपने पिता को श्रद्धांजलि देता है.

इस शहीद के लिए जनता नहीं आती, मीडिया नहीं आता और ख़बरें नहीं प्रकाशित होतीं.

दो शहीद-दो पैमाने

देश की रक्षा के लिए जाने देने वाले दो लोगों के लिए राजनीतिक समाज और नागरिक समाज की ओर के इसी अलग-अलग पैमानों पर सवाल उठाती है लघु फ़िल्म 'मोमबत्ती'.

युवा फ़िल्मकार पुनीत प्रकाश ने इस फ़िल्म की कहानी लिखी और वे इसके निर्माता निर्देशक भी हैं.

बीबीसी से हुई बातचीत में उन्होंने बताया कि मुंबई हमलों के कुछ ही दिन बाद अख़बार पढ़ते हुए उन्हें दो ख़बरें पढ़ने को मिलीं, पहली ख़बर मुंबई के हमलों में मारे गए सुरक्षाकर्मियों को दी जा रही श्रद्धांजलि पर थी और ज़ाहिर तौर पर पहले पन्ने पर तस्वीरों के साथ प्रकाशित हुई थी, इसी अख़बार के तीसरे-चौथे पन्ने पर एक छोटी ख़बर थी कि नक्सलियों से हुई मुठभेड़ में दो सिपाहियों की मौत हो गई.

वे बताते हैं, "इन दोनों ख़बरों ने मेरे मन में ये सवाल उठाया कि जो सिपाही नक्सलियों के साथ लड़ते हुए मारे गए वो भी तो शहीद की परिभाषा में फिट बैठते हैं लेकिन क्या कभी उनको वैसा ही सम्मान मिलेगा जो मुंबई में मारे गए सिपाहियों को मिला? और तभी लगा कि इस पर फ़िल्म बननी चाहिए."

वे कहते हैं कि वे मुंबई में मारे गए सुरक्षाकर्मियों की मौत पर दुखी होते हैं और उनकी कोशिश इन दोनों मौतों की तुलना करना नहीं है लेकिन वे समाज के रवैये पर सवाल उठाना चाहते हैं.

सवाल

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Image caption पुनीत ने कई फ़िल्मों में निर्माण सहायक की भूमिका निभाने के अलावा विज्ञापन फ़िल्में भी बनाई हैं

आधे घंटे से भी कम समय की ये फ़िल्म एक साथ कई सवाल उठाती है. समाज के रवैये पर, राजनीति पर, भ्रष्टाचार पर और शहीद होने की परिभाषा पर भी.

इस विषय को एक लघु फ़िल्म इतनी दमदारी के साथ उठाती है जितनी अक्सर मुख्य धारा की फ़िल्में नहीं उठा पातीं.

मारे गए सिपाही के बेटे पिंटू की भूमिका निभाने वाले अविनाश नायर के अलावा इस फ़िल्म में 'पीपली लाइव' में नत्था की पत्नी की भूमिका निभा चुकी शालिनी वत्स और 'राजनीति', 'अपहरण', 'ए वेडनेस डे' और 'गंगाजल' जैसी फ़िल्मों में अहम भूमिका निभा चुके चेतन पंडित हैं.

कलाकारों के अभिनय से लेकर सिनेमेटोग्राफ़ी तक सब कुछ सुगठित है और बच्चे के मासूम सवालों के साथ दर्शक को बार-बार झकझोरता है.

युवा फ़िल्मकार पुनीत प्रकाश इसे अंतरराष्ट्रीय लघु फ़िल्म समारोहों में भेजने के अलावा इसे राजनीतिज्ञों और आम लोगों को भी दिखाना चाहते हैं.

हालांकि लघु फ़िल्मों की भारत में जो स्थिति है, उसमें पुनीत का ये सवाल आम लोगों तक कैसे पहुँचेगा यह उनके लिए फ़िल्म बनाने से शायद बड़ी चुनौती साबित होगा.

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