सरहदें- एक अच्छी कोशिश

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Image caption एलबम रिलीज़ करतीं रेखा. साथ में लता मंगेशकर, ऊषा मंगेशकर और हरिहरन

आज़ादी के बाद से भारत और पाकिस्तान के राजनीतिक रिश्तों ने कितने ही उतार चढ़ाव देखे हों लेकिन दोनों मुल्कों में संगीत ने रिश्तों में हमेशा एक अपनापन ढूंढने की कोशिश की है.

दोनों मुल्कों के कलाकार, राजनेताओं और नौकरशाहों से बेहतर राजदूत साबित हुए हैं.

भारत में अगर मेहदी हसन, ग़ुलाम अली, नुसरत फ़तेह अली खान और आबिदा परवीन बेहद लोकप्रिय रहे हैं तो पाकिस्तान में भी लता मंगेशकर, किशोर कुमार और जगजीत सिंह के चाहने वाले कम नहीं हैं.

शायद यही देखते हुए ये कॉन्सेप्ट एलबम रिलीज़ किया है जिसका नाम है 'सरहदें - म्यूजिक बियॉंन्ड बॉर्डर्स', जिसमें भारत और पाकिस्तान के कलाकारों के संगम को एक ग़ैर फ़िल्मी संगीत एलबम की शक्ल दी गई है.

एलबम में उदासी और उम्मीद के अलग अलग रंग लिये नौ ट्रैक्स हैं. संगीत मयूरेश पई का है और गीतों को बोल दिए हैं जावेद अख्तर साहब ने.

एलबम के गीतों में अगर मुल्कों के रिश्तों पर सरहदों की खरोंच नज़र आती है तो संगीत का मरहम भी नज़र आता है.

पहला ट्रैक "गीत कब सरहदें मानते हैं" एलबम का थीम गीत है. संगीत की दुनिया सरहदों और मुल्कों से परे है, इस धारणा के इर्द-गिर्द बुना गया गीत है.

लता मंगेशकर, ऊषा मंगेशकर, सुरेश वाडेकर, हरिहरन, सोनू निगम और रेखा भारद्वाज के स्वरों में ये गीत एक 'एंथम' की तरह प्रस्तुत किया गया है मगर बहुत असरदार नहीं बन पड़ा है.

कॉन्सेप्ट एलबम के थीम गीत के रूप मे भी एक कमी इस बात की नज़र आती है कि सरहद के उस पार के कलाकारों को गीत में शामिल नहीं किया गया है.

अगर गीत को दोनों मुल्कों के कलाकारों के साथ रिकार्ड किया जाता तो शायद ज़्यादा महत्व का गीत साबित हो सकता था.

जावेद अख्तर के बोल शुरुआत में कमज़ोर हैं मगर अंतिम अंतरे में असरदार बन पड़े हैं. कुल मिलाकर ये गीत एक 'एंथम' की ऊंचाई तक पहुंचने में नाकाम रहा है और एक साधारण सी रचना बन कर रह गया है.

एलबम की सबसे ख़ास रचना है मेहदी हसन और लता मंगेशकर की गाई ग़ज़ल "तेरा मिलना बहुत अच्छा लगे है". फ़रहत शहज़ाद की ये ग़ज़ल पहले से ग़ुलाम अली की आवाज़ में लोकप्रिय है मगर यहां लता जी और मेहदी हसन साहब की एक साथ मौजूदगी इसे नया आयाम देती है.

ग़ज़ल को दोनों कलाकारों ने अलग अलग रिकार्ड किया है और मिक्सिंग से एक ग़ज़ल की शक्ल दी गई है.

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Image caption पवन झा के मुताबिक़ लता मंगेशकर की आवाज़ में अब उम्र का असर नज़र आता है.

लता जी और मेहदी हसन को एक साथ सुनना एक सुखद अनुभव है लेकिन सुन कर खुशी से ज्यादा अफ़सोस इस बात का होता है कि ऐसा प्रयास पिछले 30-35 सालों के दौरान पहले क्यों नहीं हुआ, जब ये दोनों महान कलाकार अपनी गायकी के शिखर पर थे.

हालांकि मिक्सिंग में इस बात की भी कामयाब कोशिश की गई है कि आवाज़ पर उम्र का असर बहुत नज़र ना आए. फ़रहत शहज़ाद की ग़ज़ल ख़ूबसूरत है ख़ासकर इसका रदीफ़ "लगे है" के प्रयोग से.

एलबम का अगला ट्रैक "खुला है दर" ऊषा मंगेशकर की प्रस्तुति है जो एक ख़ूबसूरत ग़ज़ल बन पड़ी है.

ऊषा जी की आवाज़ उनके गाए हिंदी फ़िल्मी गीतों के मुकाबले काफ़ी परिपक्व नज़र आती है और उनकी गायकी में लता मंगेशकर की मिठास और आशा भोसले की अदायगी का अच्छा मेल नज़र आया है. ये ग़ज़ल एलबम की सबसे बेहतरीन रचनाओं में से एक है.

"सूखी टहनी, तन्हा चिड़िया, फ़ीका चाँद" जावेद अख्तर की एक अच्छी ग़ज़ल है जो उनकी ऑडियो बुक 'तरकश' में भी शामिल थी. ये यहां ग़ुलाम अली की आवाज़ में है.

उदासी के रंग में डूबी ग़ज़ल को ग़ुलाम अली के स्वर असर देते हैं मगर धुन और संयोजन साधारण सा है और ये प्रस्तुति, बहुत दिनों तक याद रहने वाली ग़ज़ल नहीं बन पाई है.

एलबम में एक और प्रस्तुति है "है वक़्त एक ऐसा". रेखा भारद्वाज के स्वर में जावेद अख्तर के बोल ख़ूबसूरती से उभर के आए हैं. मयूरेश ने अरेबियन संगीत के प्रयोग से एक वातावरण देने की अच्छी कोशिश की है.

रेखा की गायकी से ग़ज़ल में सूफ़ियाना रंग भी नज़र आते हैं. एलबम में एक प्रभावी प्रस्तुति है "है वक़्त एक ऐसा".

लता जी की आवाज़ मे एक ग़ज़ल और है "ग़म की रुत लेकर आई". उनकी आवाज़ में उम्र का असर अब साफ़ नज़र आता है हालांकि मधुरता अब भी कायम है.

जावेद साहब के बोल इस ग़ज़ल में भी बेहतरीन हैं. इसके अतिरिक्त एलबम में हरिहरन का गाया "ज़रा देख तो लो", सुरेश वाडकर के स्वर में "आपके हुस्न का लफ़्ज़ों" और सोनू निगम की आवाज़ में "सारी हैरत है मेरी" जो अपनी जगह ठीक ठाक सी रचनाएं हैं मगर उनमें असाधारण सा कुछ भी नहीं.

कुल मिला कर कॉन्सेप्ट के स्तर पर 'सरहदें - म्युजिक बियॉन्ड बॉर्डर्स'एक अच्छी कोशिश है, लेकिन पाकिस्तान के कुछ और कलाकारों की प्रस्तुति अगर इसमें शामिल होती तो शायद एलबम और अहम साबित होता.

मेहदी हसन और लता जी को एक साथ सुनने के अलावा जावेद अख्तर की बेहतरीन ग़ज़लें एलबम की हाईलाइट हैं मगर थीम गीत बोलों के स्तर पर कमज़ोर है.

मयूरेश पई की धुनें और संयोजन बहुत असाधारण नहीं है मगर कुछ गीत अच्छे बन पड़े हैं. उम्मीद है कि आने वाले दिनों में ऐसे कुछ और कॉन्सेप्ट एलबम सुनने को मिलेंगे.

रेटिंग : नंबरों के लिहाज़ से 3/5 (पाँच में से तीन)

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