‘मैं रामू जी नहीं बनना चाहता’- अनुराग कश्यप

फ़िल्ममेकर अनुराग कश्यप

रामगोपाल वर्मा की फ़िल्म ‘सत्या’ से बतौर लेखक अनुराग कश्यप ने हिंदी फ़िल्मों का अपना सफ़र शुरु किया था. वो ये भी मानते हैं कि लंबे समय तक रामगोपाल वर्मा उनके हीरो रहे. लेकिन अनुराग कहते हैं कि वो ‘रामूजी’ नहीं बनना चाहते.

ये बात अनुराग कश्यप ने ख़ासकर रामगोपाल वर्मा के बतौर निर्माता अपने निर्देशकों के काम में दखलअंदाज़ी करने के रवैये की तरफ़ इशारा करते हुई कही.

बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में ‘आमिर’ और ‘उड़ान’ फ़िल्मों को प्रोड्यूस कर चुके अनुराग कश्यप ने कहा, “जब मैं किसी फ़िल्म को प्रोड्यूस करता हूं तो मैं उसमें बिलकुल दखलअंदाज़ी नहीं करता, जब तक कि निर्देशक मुझसे कोई सुझाव न मांगे. जब मैं फ़िल्म बनाता हूं मैं भी नहीं चाहता कि कोई मुझे बताए कि मैं कैसी फ़िल्म बनाऊं, तो फिर मैं क्यों ख़ुद ऐसा प्रोड्यूसर बनूं.”

अनुराग ने आगे कहा, “रामूजी (रामगोपाल वर्मा) ऐसे निर्माता हैं जो बहुत दखलअंदाज़ी करते थे और उसका अंजाम भी सबने देखा है. और मैं रामूजी नहीं बनना चाहता. इसलिए मैं अपने निर्देशक से दूर रहता हूं. मेरी सारी जांच-पड़ताल फ़िल्म शुरु होने से पहले ही हो जाती है.”

लेकिन अनुराग मानते हैं कि रामगोपाल वर्मा सबसे लंबे समय तक उनके हीरो रहे हैं और उन्होंने रामगोपाल वर्मा से ही सबकुछ सीखा है. वो कहते हैं, “बॉलीवुड में मुझे जल्दी ब्रेक मिलने लगे थे क्योंकि मैं लिखता था और लोगों को मेरा लेखन पसंद आ रहा था. लेकिन मैंने बहुत सारी बड़ी फ़िल्में छोड़कर रामगोपाल वर्मा की फ़िल्म ‘सत्या’ लिखने का फ़ैसला किया. हालांकि इसमें टेलिविज़न सीरियल से भी कम पैसे थे और सबने कहा कि मैं बहुत बड़ी ग़ल्ती कर रहा हूं. लेकिन इस फ़िल्म को लिखने का दो साल का अनुभव किसी फ़िल्म स्कूल से कम नहीं था और इससे मेरा निश्चय और भी दृढ़ हो गया कि अब तो यही करूंगा.”

ब्लैक फ़्राईडे, देव डी, गुलाल और नो स्मोकिंग जैसी फ़िल्मों के निर्देशक और आमिर और उड़ान के निर्माता, अनुराग कश्यप अपने ‘अलग’ तरह के सिनेमा के लिए पहचाने जाते हैं. वो कहते हैं कि इस तरह का, लीग से हटकर सिनेमा बनाने का उन्होंने शुरु से ही फ़ैसला कर लिया था.

अनुराग का कहना है, “फ़िल्ममेकर बनने का मेरा सफ़र बहुत लंबा रहा. मैंने अपने सफ़र में बहुत कुछ सीखा है जिसका फ़ायदा भी मुझे हुआ है. लोग मुझे बोलते थे कि तुम पागल हो, ऐसी फ़िल्में बनाते हो जो चलती नहीं हैं. आज जब किसी और फ़िल्ममेकर को ऐसा कहा जाता है तो मैं उसे अपने पास बुला लेता हूं कि मैं तुम्हारी फ़िल्म प्रोड्यूस करूंगा. राजकुमार गुप्ता, बिजॉय नाम्बियार, विक्रमादित्य मोटवानी, ये उस तरह के ‘फ़र्स्ट टाइम डायरेक्टर’ नहीं हैं जो किसी की सुनेंगे या चमचागिरी करते हैं. इनकी अपनी एक शैली है. ये मुझसे भी कहते हैं दूर रहो, मुझे फ़िल्म बनाने दो. इनमें मुझे अपनी झलक दिखती है, मुझसे भी ज़्यादा मज़बूत इरादों के हैं और इसलिए मैं उनकी फ़िल्म प्रोड्यूस कर रहा हूं. ये मेरे संघर्ष का ही नतीजा है जिस वजह से मैं आज ये कर पा रहा हूं और इसमें मुझे बहुत मज़ा आ रहा हूं.”

उतनी अच्छी नहीं लगी दबंग

जहां अनुराग कश्यप अब तक तथाकथित मसाला फ़िल्मों से दूर रहे हैं, वहीं उनके भाई अभिनव कश्यप की पहली ही फ़िल्म ‘दबंग’ पूरी तरह व्यवसायिक फ़िल्म थी.

इस बारे में अनुराग का कहना है, “अभिनव बहुत अलग सोचता है, चाहता है कि सब उसकी फ़िल्म देखकर ख़ुश हो. जिस तरह से उसने अपनी पहली फ़िल्म बनाई, अच्छा लगा. मुझे ‘दंबग’ अच्छी लगी लेकिन उतनी अच्छी नहीं. मैं उसके तरह की फ़िल्म नहीं बना सकता. हां, वो चाहे तो मेरी तरह की फ़िल्म बना सकता है लेकिन वो चाहता नहीं है.”

मनमोहन देसाई की फ़िल्म अमर अक़बर एंथनी के प्रशंसक अनुराग ये भी मानते हैं कि एक अच्छी मसाला फ़िल्म बनाना बहुत मुश्किल काम है और जो एक अच्छी मसाला फ़िल्म बना पाए, वो एक महान फ़िल्ममेकर होता है. लेकिन अब लोग मसाला फ़िल्म के नाम पर ‘सबस्टैंडर्ड’ फ़िल्में बनती हैं.

व्यक्तिगत ज़िंदगी की बात करें तो अनुराग कश्यप कहते हैं कि जल्द ही वो अपनी मंगेतर कल्कि कोचलिन से शादी करने वाले हैं. लेकिन ये सिर्फ़ परिवारजनों तक ही सीमित रहेगी.

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