चलो दिल्ली-संगीत का सफ़र ज़्यादा मज़ेदार नहीं

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’चलो दिल्ली’ छोटे बजट की ‘रोड जॉनर’ की कॉमेडी फ़िल्म है. फ़िल्म में संगीतकारों और गीतकारों की पूरी फ़ौज़ है. इनमें संगीतकार गौरव दासगुप्ता, सचिन गुप्ता, रोहित कुलकर्णी, रोशन बालू और आनंद राज आनंद और गीतकार मंथन, शब्बीर अहमद, कृशिका लुल्ला, निशा मैस्करैनेस और आनंद राज आनंद प्रमुख नाम हैं.

कथानक के आधार पर फ़िल्म में संगीत की बहुत संभावनाएं मौजूद हैं लेकिन हाल के सालों में इस जॉनर की फ़िल्मों में कोई यादगार संगीत नहीं रहा है और ’चलो दिल्ली’ के संगीत से भी बहुत अपेक्षाएं नहीं है.

’चलो दिल्ली’ के साउंडट्रैक में छह मुख्य ट्रैक्स के साथ कुल आठ ट्रैक्स हैं.

एलबम की शुरुआत होती है शीर्षक गीत ’चलो दिल्ली’ से जिसे मंथन ने लिखा है और इसका संगीत गौरव दासगुप्ता ने दिया है. गीत में दिल्ली को एक रूपक की तरह इस्तेमाल में लिया है. मंथन के बोल जिनमें पंजाबी शब्दों का बोलबाला है, सफ़र को मज़ेदार बनाने में सफल नहीं हुए हैं. राजा हसन की गायकी गीत का एक अच्छा पहलू है और अपनी अलग आवाज़ से वो गीत में कुछ जान डालने में कामयाब रहे हैं. पिछले कुछ समय में दिल्ली को केंद्रित कर कई गाने बनाए गए हैं. ’चलो दिल्ली’ का ये गीत शायद उनकी सबसे कमज़ोर कड़ी है.

"लैला मैं लैला" एलबम का अगला ट्रैक है, और पुरानी कढ़ी में फिर से उबाल देकर नये तड़के लगा कर परोसने की जो परंपरा फ़िल्म संगीत में चल पड़ी है, ये उसी का एक और नमूना है. ज़ीनत अमान की फ़िल्म क़ुरबानी के मूल गीत ’लैला मैं लैला" का हुक लेकर नए गीत के रूप मे प्रस्तुत करने की गौरव दासगुप्ता की कोशिश है मगर ना मूल गीत जैसी मस्ती है और ना ही मादकता. जून बैनर्जी की गायकी ठीक ठाक है, मगर कंचन जैसी बात नहीं और नया गीत असर छोड़ने में नाकाम रहा है. एलबम में गीत एक क्लब, रोशन बालू, द्वारा बनाए गए रीमिक्स के रूप में भी मौजूद है मगर कुछ खास ‘वैल्यू-ऐडीशन’ नहीं प्रदान करता.

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Image caption लारा दत्ता और उनके पति महेश भूपति ने 'चलो दिल्ली' प्रोड्यूस की है.

’हाई फ़ाइव’ एलबम में अगली प्रस्तुति है नीरज श्रीधर की आवाज़ में जो अपनी गायकी से इसे एलबम के बाकी गीतों से बेहतर रंग देने में कामयाब हुए हैं. गीत में शब्बीर अहमद और कृशिका लुल्ला के बोल भी मज़ेदार बनाने में सहयोग देते हैं. संगीतकार सचिन गुप्ता ने फ़िल्म के शीर्षक गीत ’चलो दिल्ली’ के हुक का मुख्य गीत के मुकाबले यहाँ बेहतर ढंग से उपयोग किया है.

’मटरगश्तियां’ आनंद राज आनंद की संगीत रचना है जिसे सुखविंदर सिंह ने स्वर दिया है. उम्मीद एक मस्ती भरे गीत की बनती है मगर ये एक साधारण से गीत के रूप में सामने आता है. आनंद राज आनंद ने बोल भी लिखे हैं जो कुछ भी प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहे हैं.

एलबम में एक अंग्रेज़ी गीत भी शामिल है. रोहित कुलकर्णी के संगीत में बना ’मोमेन्ट्स इन लाइफ़’ नतालिय-डि-लुसियो ने गाया है लेकिन उनका उच्चारण कहीं- कहीं पर गीत का मज़ा कम करता है.

’कौन सी बड़ी बात’ फ़िल्म में मुख्य अभिनेता का तकिया कलाम है और उसी को आधार लेकर एक गीत गढ़ा है संगीतकार रोहित कुलकर्णी ने. इसे कमल हीर ने गाया है. फ़िल्म में विनय पाठक अपने अभिनय के दम पर शायद गीत की प्रस्तुति को बेहतर बना सकें मगर एलबम में बहुत प्रभावी नहीं है बस एक कामचलाऊ सी रचना है.

कुल मिला कर ’चलो दिल्ली’ के संगीत से तो सफ़र के ज्यादा मज़ेदार होने की गुंजाइश नहीं लगती है. लैला मैं लैला कुछ हद तक प्रचार में योगदान दे सकता है मगर संगीत रचना के तौर पर उसके रंग फीके से हैं. एलबम के तौर पर तो गीतकारों और संगीतकारों की भीड़ के बावजूद निराश ही करता है ’चलो दिल्ली’ का संगीत.

नंबरों के लिहाज़ से ’चलो दिल्ली’ के संगीत को 2/5 (पाँच मे से दो)

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