स्टैनली का डब्बा - शरारतों और संवेदनाओं के रंग

  • 4 मई 2011
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Image caption 'स्टैनली का डब्बा' में हितेश सोनी का संगीत है.

गर्मियों की छुट्टियां सर पर हैं और मासूम शरारतों के इस मौसम की रौनक बढ़ाने के लिये निर्माता-निर्देशक अमोल गुप्ते बच्चों की एक मासूम सी फ़िल्म ले कर हाज़िर हैं 'स्टैनली का डब्बा'.

अमोल गुप्ते का नाम 'तारे ज़मीं पर' के जनक के रूप में जाना जाता है मगर उससे जुड़े क्रेडिट के विवादों की वजह से 'स्टैनली का डब्बा' एक छोटी फ़िल्म होने के बावजूद फ़िल्म उद्योग के लिये एक महत्वपूर्ण फ़िल्म बन गई है.

फ़िल्म में संगीत दिया है हितेश सोनी ने जो इससे पहले कई फ़िल्मों में पार्श्व संगीत दे चुके हैं और खासकर विशाल भारद्वाज के सहायक के रूप मे जाने जाते हैं.

'तारे ज़मीं पर' पिछले दशक की सबसे लोकप्रिय फ़िल्मों में से रही है और उसका संगीत लोगों के दिलों को छूने में बहुत सफल रहा था इसलिये 'स्टैनली का डब्बा' के संगीत से अपेक्षाएं बढ़ गई हैं.

एलबम में बाल सुलभ शरारतों और संवेदनाओं के रंग उकेरते पाँच मुख्य गीतों के साथ कुल सात ट्रैक्स हैं जिनके बोल अमोल गुप्ते के हैं और एक लोरी गीत की संगीत रचना का श्रेय भी अमोल गुप्ते को दिया गया है.

'लाइफ़ बहुत सिम्पल है' एलबम का पहला गीत है शान की आवाज़ में.

शान की आवाज़ का एक महत्वपूर्ण पहलू उसकी मासूमियत है जो इस तरह के गीतों मे उभर के सामने आती है.

हितेश सोनी ने सरल सी मगर बच्चों की दुनिया की चंचलता लिये हुए संगीत रचना गढ़ी है जिसकी धुन में बहाव है और संयोजन भी प्रभावी है. अमोल गुप्ते ने आसान शब्दों में आजकल के बच्चों की दुनिया के रंगों को उकेरा है. 'लाइफ़ बहुत..' एलबम को एक खुशनुमा शुरुआत देता है.

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Image caption फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक अमोल गुप्ते ने फ़िल्म के गीत भी लिखे हैं.

'डब्बा' सुखविंदर सिंह के स्वरों में एलबम की अगली पेशकश है. ये फ़िल्म का थीम गीत है और अमोल गुप्ते के मज़ेदार बोलों में लंच बॉक्सेस की दुनिया से ज़िंदगी के स्वाद गीत में उतारे हैं.

हितेश की धुन पर विशाल भारद्वाज का प्रभाव नज़र आता है. गीत में बच्चों की चहचहाहट को कोरस में हितेश ने बेहतरीन ढंग से काम में लिया है और कोरस निस्संदेह रूप से गीत का असर बढ़ाने में कामयाब रहा है.

एलबम की एक और अच्छी प्रस्तुति है शंकर महादेवन का गाया 'देखो इक नन्ही सी जान' गीत में वाद्य संयोजन बेहतरीन है और खासकर अजिंक्य अय्यर के गिटार का प्रभावी उपयोग किया है.

हितेश सोनी आने वाले दिनों के लिये उम्मीद जगाते हैं. शंकर का गायन इस गीत का मुख्य आकर्षण है.

'तेरे अंदर भी कहीं...कोई स्टैनली' एलबम में अलग रंग की रचना है. विशाल डडलानी अपनी गायकी से गीत को एक मूड प्रदान करते हैं.

गीत आदित्य चक्रवर्ती के बाल स्वर में एक और छोटे से संस्करण में है. दोनो संस्करण अच्छे बन पड़े हैं. गीत के बोल, फ़िल्म में किसी महत्वपूर्ण मोड़ पर प्रस्तुत होने की संभावनाएं दर्शाते हैं.

'झूला झूल' एलबम में एक लोरी गीत है जिसे हंसिका अय्यर ने स्वर दिये हैं. संगीत अमोल गुप्ते का है और बांसुरी और गिटार का प्रयोग गीत को लोरी का महौल प्रदान करते हैं.

एलबम मे एक और ट्रैक है 'थर्स्टी थीम'.. गम्भीर महौल से शुरु होकर उत्साह के रंग रचती है. देखना ये है कि फ़िल्म में ये थीम कितने असरकारी रूप से प्रस्तुत होती है.

कुल मिलाकर 'स्टैनली का डब्बा' का संगीत एक अच्छी, ईमानदार कोशिश है जो फ़िल्म के कथानक से गहरा जुड़ाव रखता है और फ़िल्म में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

हितेश सोनी से आने वाले दिनों में अच्छे संगीत की उम्मीद की जा सकती है.

अमोल गुप्ते के बोल 'तारे ज़मीं पर' के प्रसून जोशी जितने प्रभावी नहीं हैं मगर फ़िल्म के कथानक और निर्देशक के नज़रिये को अच्छी तरह से प्रस्तुत करते हैं.

फ़िल्म का संगीत लोकप्रियता में शायद 'तारे जमीं पर' की ऊंचाई ना छू सके, मगर फ़िल्म के मुताबिक है और इस बात की भी संभावनाएं जगाता है कि आने वाले दिनों में दर्शकों को एक अच्छी फ़िल्म देखने को मिलेगी.

नंबरों के लिहाज़ से 3/5 (पाँच मे से तीन)

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