गानों के बोल: रचनात्मक या अश्लील

  • 20 मई 2011
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मुन्नी की बदनामी हो या शीला की जवानी इन गानों के बोलों ने ख़ूब चर्चा बटोरी. कई लोगों ने तो ये भी आरोप लगाया कि शीला और मुन्नी नाम की महिलाओं को ख़ासी परेशानी झेलनी पड़ी और ये माँग भी होने लगी कि गानों में शालीनता का ध्यान रखा जाए.

लेकिन पिछले कुछ दिनों में आए गानों के बोल फिर सवालों के घेरे में है.आलोचक कह रहे हैं कि ये गाने अश्लीलता के मामले में शीला और मुन्नी से भी आगे निकल गए.

इन गानों में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल हुआ है जो सुनने में गालियों सरीखे लगते है.

इन गानों का विरोध करने वाले कहते है कि ये सब एक संयोग नहीं बल्कि जानबूझकर इस तरह से लिखे गए है कि गालियों को लोगों तक बिना सेंसर की कैंची चलाया पहुँचाया जा सके .

इस तरह के आरोप खास तौर पर प्यार का पंचनामा और डेल्ही बैली नाम की फिल्मों के गानों पर लगे हैं.

शालीनता खो रहे गानों के बारे में संगीत समीक्षक पवन झा कहते हैं,“इस चलन को अगर हम देखें तो दोहरे मायने वाले गाने तो पहले भी हिन्दी फिल्मों का हिस्सा रहे हैं. लेकिन आजकल जिस तरह से सीधे तौर पर गालियों का गानों में इस्तेमाल का चलन बढ़ रहा है वो ज़रूर खतरनाक है.”

गानों में कथित अश्लील शब्दों के बारे जब शाहरुख खान से पूछा गया तो उन्होने कहा “जैसे-जैसे वक्त बदल रहा है, बोलचाल की भाषा बदल रही है और गानों के बोल भी बदल रहे हैं. मुझे इस तरह के गानों से कोई आपत्ति नहीं है. गाने सुनना आपकी पसंद पर है, आपको नहीं पसंद तो ना सुने बंद कर दें."

जिस गाने पर खासी बहस हो रही है वो प्यार का पंचनामा फिल्म से है जिसका निर्देशन लव रंजन ने किया है और इस फिल्म के गाने भी उन्होंने ही लिखे है.

जब हमने लव रंजन ने से इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा “लोगों को ग़लतफ़हमी है कि इस गाने में गाली है, असल बात ये है कि इस गाने में तो एक भी गाली नहीं है. ये गाना फिल्म का ज़रूरी हिस्सा है और इसका इस्तेमाल फिल्म में भी किया गया है. ये व्यंग्य है, और व्यंग्य तीखा ना हो तो व्यंग्य किस बात का.”

लव दलील देते हैं, “जो लोग हल्ला मचा रहे हैं मैं उनसे जानना चाहूंगा कि वो कौने से 20-22 साल के नौजवान हैं जो अपने दोस्तों से मिलते हैं तो शुद्ध हिन्दी में बात करते है.”

लेकिन पवन झा का इस पर कहना है कि समाज में ये सब हो रहा है, ये कहने भर से उनकी ये दलील पूरी नहीं हो जाती. पवन कहते हैं “समाज में बहुत सी गतिविधियाँ होती हैं जो मौज़ूद होती हैं लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि उन सबको जनता के मंच पर ले आएं और खुले तौर पर उनको प्रचारित-प्रसारित करें.”

पवन झा रचनात्मकता की दलील को भी नकारते हैं. "मेरा तो मानना है कि रचनात्मकता छुपाने में है ना कि सब कुछ दिखाने में. रचनात्मकता ये है कि आप छुपाते हुए ही सब कह पाएँ.”

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