बरसे-बरसे: आनंद रस की बूंदाबांदी

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Image caption 'बरसे-बरसे' के गाने सुरेश वाडेकर ने गाए हैं और संगीत दिया है विशाल भारद्वाज ने.

'बरसे बरसे' संगीतकार विशाल भारद्वाज और गायक सुरेश वाडेकर की जुगलबंदी का एक ग़ैर फ़िल्मी एलबम है.

पिछले कुछ सालों से ग़ैर फ़िल्मी संगीत में रॉक और पॉप बैंड्स का बोलबाला रहा है और कभी कभार कोई सॉफ़्ट सूफ़ी एलबम भी सुनाई दिया जाता रहा है मगर सुगम संगीत ग़ैर फ़िल्मी संगीत के परिदृश्य से लगभग ग़ायब सा रहा है. उस लिहाज़ से 'बरसे बरसे' का आगमन एक अच्छी खबर है.

बरसों पहले दूरदर्शन के दिनों में एक धारावाहिक आया था 'दाने अनार के'. धारावाहिक का शीर्षक गीत लिखा था गुलज़ार ने, संगीत दिया था विशाल भारद्वाज ने और उसे गाया था सुरेश वाडेकर ने.

उसके बाद माचिस, सत्या, जहाँ तुम ले चलो से लेकर ओंकारा और हालिया सात खून माफ़ तक, इन तीन कलाकारों के संगम ने बहुत से मधुर गीतों को जन्म दिया है.

90 के दशक के अंत में इन तीन कलाकारों ने एक और बेहतरीन ग़ैर फ़िल्मी एलबम प्रस्तुत किया था 'बूढ़े पहाड़ों पर'. 'बरसे बरसे' कुछ हद तक 'बूढ़े पहाड़ों पर' का ही विस्तार लगता है.

एलबम में सुरेश वाडेकर के गाए और विशाल के संगीतबद्ध अलग-अलग रंग के कुल पाँच गीत हैं. दो गीत गुलज़ार ने लिखे हैं और दो गीत उत्तर प्रदेश के कवि सूर्यभानु गुप्त के नाम हैं जबकि एक गीत की रचना मुन्ना धीमान ने की है.

शीर्षक गीत 'बरसे बरसे' एलबम को एक बेहतरीन शुरुआत देता है.

विशाल ने राजस्थान की लोक शास्त्रीय शैली, मांड गायकी को आधार में रख कर आधुनिक वाद्य संयोजन के साथ एक नया वातावरण रचने की कोशिश की है.

सुरेश वाडेकर एक पारंपरिक सी बंदिश को नए रंग में ख़ूबसूरती से पेश करते हैं. हालांकि कहीं कहीं उनका उच्च्चारण अखरता है.

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Image caption एलबम के दो गाने गुलज़ार ने लिखे हैं.

सूर्यभानु गुप्त के बोल, लोक भाषा के शब्दों के उपयोग से खूबसूरत बन पड़े हैं. जैसे 'प्रीत का खेल नियारा, हारूं तो हो जाऊं पिया की, जीतूं तो पी म्हारा'. क्लिंटन सेरेजो ने पार्श्व में सुरेश वाडेकर का बखूबी साथ दिया है.

'ऐसा तो होता ही नहीं है' एलबम की एक और बेहतरीन रचना है. विशाल के संयोजन में पं. विश्व मोहन भट्ट की मोहन वीणा गीत का एक आकर्षण है. गुलज़ार के बोलों को सुरेश वाडेकर एक रोमांटिक माहौल देने में सफल हुए हैं.

'तेरे तेरे नैन' एक 'हॉंटिंग' सी रचना है जो एक बार सुनने के बाद जे़हन में अटक सी जाती है और पीछा नहीं छोड़ती. मुन्ना धीमान ने ये गीत लिखा है और उनका पंजाबी शब्दों का इस्तेमाल गीत को थोड़ा अलग रंग देता है.

'पीच्छे पै गये तेरे नैन, कड़ के लय गये तेरे नैन' जैसे बोल सुरेश वाडेकर की आवाज़ में मासूमियत से उभर के आते हैं.

जो गीत थोड़ा निराश करता है वो है 'तन्हाई में'. शुरुआत में मोरचंग सी ध्वनि से एक अनूठे माहौल की संभावना जगती है.

विशाल की धुन अच्छी है और अपने संयोजन से एक उदास तन्हा माहौल रचते हैं मगर उनके वाद्य कहीं जाकर गायकी और कविता पर हावी हो जाते हैं. अन्तरों में सुरेश फिर से उभर कर आते हैं मगर ये गीत फिर भी बहुत असरदार गीत नहीं बन पड़ा है.

एलबम में एक गीत और है गुलज़ार का लिखा 'ज़िंदगी सह ले'.. ये गीत विशाल ने एक फ़िल्म के लिये संगीतबद्ध किया था जो बंद हो गई. विशाल इस दौर के उन गिने चुने संगीतकारों में हैं जो सुरेश वाडेकर की आवाज़ की ख़ूबियों से वाकिफ़ हैं और इस गीत में भी उसका बखूबी इस्तमाल किया है.

कुल मिला कर 'बरसे बरसे' आनंद रस की बौछार का अनुभव तो नहीं कराता लेकिन ग़ैर फ़िल्मी संगीत के क्षेत्र में पड़े हुए अकाल में इसकी हल्की सी बूंदाबांदी भी एक सुखद अनुभूति कराने में सफल रही है.

रेटिंग : 3/5 (पाँच मे से तीन)

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