'आरक्षण के कारण हुआ शिक्षा का व्यावसायीकरण'

  • 3 अगस्त 2011
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शिक्षण संस्थानों में कुछ वर्गों के लिए आरक्षण का मुद्दा भारत में काफ़ी संवेदनशील रहा है. इसी मुद्दे के ईर्द-गिर्द निर्देशक प्रकाश झा ने फ़िल्म बनाई है आरक्षण. प्रकाश झा ने बीबीसी से आरक्षण और शिक्षा के व्यावसायीकरण जैसे मुद्दों पर बात की: पेश हैं मुख्य अंश

फ़िल्म आरक्षण का विषय शिक्षा में आरक्षण व्यवस्था और शिक्षा का व्यावसायीकरण है. आरक्षण बड़ा जटिल मुद्दा रहा है, काफ़ी विवादित भी है..इस मसले पर फ़िल्म बनाने का विचार क्यों और कैसे आया..

भारत का समाज जातिगत समाज है. हमारे यहाँ आरक्षण की व्यवस्था है. ये बातें सच हैं और इन्हें मानना पड़ेगा. अब सवाल ये है कि अगर आरक्षण एक सच्चाई है तो आगे क्या करें? हमें सबका दर्द समझना होगा और इस पर भी ग़ौर करना होगा कि इस वजह से कैसे हमारी शिक्षा प्रणाली का व्यावसायीकरण हो गया है.

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रिज़र्वेशन हुआ तो कॉलेजों में सीटें कम हो गईं, प्रतियोगिता बढ़ी, कोंचिंग संस्थान खुले. पैसे वालों को नज़र आया कि ये तो अच्छा अवसर है. अब तो ये करोड़ों रुपए का उद्योग बन चुका है. सरकार भी केवल जीडीपी का दो या तीन फ़ीसदी हिस्सा शिक्षा पर खर्च करती है. हमने सभी पहलुओं को दिखाने की कोशिश की है.

कई सामाजिक-राजनीतिक गुट बिने देखे ही फ़िल्म आरक्षण का विरोध कर रहे हैं. एक अलग सा चलन देखा गया है पिछले कुछ सालों में. फ़िल्म पसंद नहीं आई तो सिनेमाघरों में रिलीज़ नहीं होने दी जाती.हाल ही में फ़िल्म खाप आई थी जिसे हरियाणा में कई जगह रिलीज़ तक नहीं होने दिया गया विरोध के इस तरीके पर क्या कहेंगे..

क्या कह सकता हूँ. समाज का एक पहलू है जिसे स्वीकार करके चलना पड़ता है. मैं यही मानकर चलता हूँ कि सामाजिक मुद्दे पर फ़िल्म बनाई है तो लोग कुछ तो बोलेंगे. मैंने लोगों से हमेशा कहा है कि पहले फ़िल्म देख लें. राजनीति को लेकर भी आशंका थी लेकिन रिलीज़ होने के बाद कोई विवाद नहीं हुआ.

आपने शुरु में कहा कि भारत में जाति प्रथा है..आपको लगता है कभी जातिरहित भारतीय समाज बन पाएगा.

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एक दिन ऐसा ज़रूर होगा लेकिन इसमें समय लगेगा. आप अगर बड़े शहरों में जाएँ, कंपनियों में जाएँ तो वहाँ कोई नहीं पूछता कि आपकी जात क्या है. इसमें आज की पीढ़ी ही बदलाव लाएगी...एक दिन जात-पात ख़त्म होगा पर धीरे-धीरे.

बतौर निर्देशक-निर्माता आप कलाकारों का चयन कैसे करते हैं. बहुत बार आप चौंका देते हैं. राजनीति में .लोगों ने कहा रणबीर कपूर ऐसा रोल भी कर सकता है.. अबर्न छवि वाले सैफ़ अली खान को दलित युवक के रूप में देखकर भी कई लोग लोग हैरान रह गए.

मैं इन लोगों को बतौर एक्टर इस तरह इस्तेमाल करने की कोशिश करता हूँ ताकि मैं जो बात फ़िल्म के ज़रिए कहना चाहता हूँ कि कहलवा सकूँ.

आमतौर पर फ़िल्मों में किरदार या तो बिल्कुल पाक-साफ़ होता है या फिर बिल्कुल नेगेटिव..लेकिन आप बहुत बार ग्रे शेड वाले किरदार उकेरते हैं...जो बुराई के पुलिंदे नहीं हैं पर पाक-साफ़ भी नहीं,कई परतों वाले किरदार.

असल जीवन में आदमी हर तरह का होता है, अच्छा, बुरा, कुछ में दोनों पहलू होते हैं. सभी को कहानी में जगह देनी पड़ती है. मैं कहानी में पात्र ही ऐसे गढ़ता हूँ जिसमें लगता है कि ऐसा संभव है.

आप मुख्यत सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर आधारित फ़िल्में बनाते हैं.. दामुल मृत्युदंड, गंगाजल, अपहरण आपकी सारी फ़िल्में सामाजिक बदलावों को दर्शाती हैं. कोई ख़ास वजह कि ऐसे मुद्दे ही आपके दिल के करीब रहते हैं.

मैं समाज में देखता रहता हूँ, समझता रहता हूँ, घूमता रहता हूँ. जब चीज़ें समझ में आने लगती हैं तो कहानी लिखता हूँ. ये एक प्रक्रिया है.मुझे अच्छा लगता है कि जो कुछ असल ज़िंदगी में हो रहा है वो फ़िल्मों में पेश कर पाऊँ.

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