मस्ती, उत्सव और विरह के रंगों का 'मौसम'

  • 16 अगस्त 2011
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Image caption फ़िल्म 'मौसम' से अभिनेता पंकज कपूर निर्देशन में कदम रख रहे हैं.

‘मौसम’ बॉलीवुड में आने वाले मौसम की बहुप्रतिक्षित फ़िल्म है. शाहिद कपूर और सोनम की जोड़ी तो फ़िल्म की खासियत है ही मगर इससे भी ज्यादा फ़िल्म का इंतजार इसलिये है कि पहली बार अभिनेता पंकज कपूर निर्देशन में हाथ आज़मा रहे हैं. पंकज कपूर का नाम बॉलीवुड के इस दौर के सबसे बेहतरीन और संजीदा कलाकारों में शुमार किया जाता है, इसलिये ‘मौसम’ से बहुत अपेक्षाएं हैं.

फ़िल्म में संगीत प्रीतम ने दिया है और गीतकार हैं इरशाद कामिल. फ़िल्म एक संजीदा प्रेमकथा है इसलिये फ़िल्म में संगीत की महत्वपूर्ण भूमिका लाज़मी है. साउंडट्रैक में छह मुख्य गीतों के साथ कुल 13 गाने हैं. गीतों में जहां एक ओर मस्ती और उत्सव का माहौल है वहीं विरह के उदास रंग भी हैं.

पहला गीत ’रब्बा मैं तो मर गया’ एलबम को एक ख़ुशनुमा शुरुआत देता है. प्रीतम की धुन और वाद्य संयोजन में नयापन नहीं है और पिछले दो-तीन सालों में वो इस तरह की कई रचनाएं दे चुके हैं. लेकिन सिद्दार्थ माल्या की आवाज़ में ताज़गी है और गीत के मूड को उभारने में उनके स्वर काफ़ी योगदान करते हैं. गीत का एक और वर्ज़न में राहत फ़तेह अली ख़ान के स्वरों में है और उम्मीद के मुताबिक राहत एक सुनने लायक रचना प्रस्तुत करते हैं, ख़ासकर उनकी आवाज़ की मासूमियत गीत को एक अलग रंग देती है.

’सज-धज के टशन मे रहना’ एलबम की अगली प्रस्तुति है. शादी के उत्सव पर मौज-मस्ती का गीत है. पारम्परिक लोक गीत से शुरु करके प्रीतम एक उम्मीद जगाते हैं लेकिन गीत जल्द ही जानी-पहचानी राह पर खड़ा मिलता है और एक औसत सी प्रस्तुति साबित होता है. प्रीतम शायद ’जब वी मेट’ और ’सिंह इज़ किंग’ की सफलता से अब तक बाहर नहीं आ पाये हैं. मीका के साथ गीत में पंकज कपूर के भी स्वर हैं. गीत की सफलता इसके फ़िल्मांकन पर काफ़ी निर्भर करेगी.

एलबम की सबसे बेहतरीन प्रस्तुति है उस्ताद राशिद ख़ान के स्वरों में ‘पूरे से ज़रा सा कम है’. प्रीतम के साथ राशिद ख़ान का गाया ’जब वी मेट’ के ‘आओगे जब तुम साजना’ आज भी ख़ासा लोकप्रिय है और ‘मौसम’ के थीम सॉन्ग में भी राशिद ख़ान अपनी गायकी से रंग जमाने में का़मयाब हुए हैं. प्रीतम का वाद्य संयोजन राशिद ख़ान को उचित माहौल देता है.

एलबम की अगली प्रस्तुति ’इक तू ही’ तीन वर्जन्स में है. तीनों में ही गायकी दमदार है. पहला वर्जन हंसराज हंस के स्वरों मे हैं, महफ़िल मिक्स वर्जन में वडाली बन्धुओं ने स्वर दिये हैं और रिप्राइज़ वर्जन में सिद्दार्थ माल्या के स्वर हैं. इरशाद कामिल के बोल अच्छे बन पड़े हैं. सुल्तान ख़ान के आलाप के साथ गीत को एक बढ़िया शुरुआत मिलती है लेकिन प्रीतम अपनी पुरानी सफलताओं के मोह को छोड़ नहीं पाए और कोरस गीत को ’अजब प्रेम की गज़ब कहानी’ के ’तू जाने ना’ के ट्रैक पर ले जाता है.

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Image caption सोनम कपूर और शाहिद कपूर पहली बार फ़िल्म मौसम में एक साथ नज़र आएंगे.

करसन संगठिया के स्वरों मे ’रंगीले रंग रसिया मेरे’ एलबम को एक अलग ही रंग देता है. गुजराती और पंजाबी लोक धुनों के मेल से एक तेज़ गति की थिरकाने वाली रचना है. इस नवरात्री और डांडिया के मौसम में धूम मचाने की क्षमता रखता है ये गीत.

एलबम में एक और रचना है ‘मल्लो-मल्ली’, जो बाकी गीतों के मुक़ाबले सामायिक है और एक क्लब मिक्स के हिसाब से संयोजित किया गया है. तोची रैना के स्वरों में ठीक-ठाक सी रचना है लेकिन लेहम्बर हुसैनपुरी और हार्ड कौर का वर्ज़न उनके ख़ास अन्दाज़ की वजह से लोकप्रिय होने की गुंजाइश रखता है.

प्रीतम ‘मौसम’ में उम्मीद के मुताबिक संगीत देने में सफल हुए हैं हालांकि कहीं-न-कहीं अपनी पुरानी सफलताओं को भुनाने में ही लगे हैं. फिर भी एलबम में कई रंग के गीत हैं और लोकप्रिय होने का माद्दा रखते हैं. एलबम के कुछ गीत आने वाले कई दिनों में काफ़ी सुने जायेंगे इसमें कोई शक़ नहीं है.

रेटिंग के पैमाने पर मौसम के संगीत को ३/५ (पाँच में से तीन)

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