आशिक मिज़ाज मैडम नूरजहाँ

  • 21 सितंबर 2011
नूरजहाँ इमेज कॉपीरइट BBC World Service

दुनिया के किसी भी कोने में ‘मैडम’ शब्द का जो भी अर्थ लगाया जाता हो, पाकिस्तान में यह शब्द सिर्फ़ मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

जब नूरजहाँ को दिल का दौरा पड़ा, तो उनके एक मुरीद और नामी पाकिस्तानी पत्रकार ख़ालिद हसन ने लिखा था- दिल का दौरा जो उन्हें पड़ना ही था. पता नहीं कितने दावेदार थे उसके! और पता नहीं कितनी बार वह धड़का था उन लोगों के लिए जिन पर मुस्कराने की इनायत की थी उन्होंने.

नूरजहाँ ने महान बनने के लिए बहुत मेहनत की थी और अपनी शर्तों पर ज़िंदगी को जिया था. उनकी ज़िंदगी में अच्छे मोड़ भी आए और बुरे भी.

उन्होंने शादियाँ कीं, तलाक़ दिए, प्रेम संबंध बनाए, नाम कमाया और अपनी ज़िदगी के अंतिम क्षणों में बेइंतहा तकलीफ़ भी झेली.

एक बार पाकिस्तान की एक नामी शख़्सियत राजा तजम्मुल हुसैन ने उनसे हिम्मत कर पूछा कि आपके कितने आशिक रहे हैं अब तक?

‘सब आधे सच.’’ उन्होंने जवाब दिया. 'तो आधे सच ही बता दीजिए’- तजम्मुल ने ज़ोर दिया.

नूरजहाँ कुछ ज़्यादा ही दरियादिल मूड में थीं. उन्होंने गिनाना शुरू किया. कुछ मिनटों बाद उन्होंने तजम्मुल से पूछा, ’कितने हुए अब तक?’

तजम्मुल ने बिना पलक झपकाए जवाब दिया- अब तक सोलह! नूरजहाँ ने पंजाबी में क्लासिक टिप्पणी की- हाय अल्लाह! ना ना करदियाँ बी सोलह हो गए नें!

एक बार किसी ने उनसे पूछने की जुर्रत की कि आप कब से गा रही हैं? नूरजहाँ का जवाब था, ‘मैं शायद पैदा होते समय भी गा ही रही थी.’

सुर में रोना

सन 2000 में जब उनकी मौत हुई, तो उनकी एक बुज़ुर्ग चाची ने कहा था, जब नूर पैदा हुई थी तो उनके रोने की आवाज़ सुनकर उनकी बुआ ने उनके पिता से कहा था,’ यह लड़की तो रोती भी सुर में है.’

नूरजहाँ के बारे में एक और कहानी भी मशहूर है. तीस के दशक में एक बार लाहौर में एक स्थानीय पीर के भक्तों ने उनके सम्मान में भक्ति संगीत की एक ख़ास शाम का आयोजन किया.

एक लड़की ने वहाँ पर कुछ नात सुनाए. पीर ने उस लड़की से कहा, ‘बेटी कुछ पंजाबी में भी हमको सुनाओ.’ उस लड़की ने तुरंत पंजाबी में तान ली, जिसका आशय कुछ इस तरह का था .....इस पाँच नदियों की धरती की पतंग आसमान तक पहुँचे!

जब वह लड़की यह गीत गा रही थी, तो पीर अवचेतन की अवस्था में चले गए. थोड़ी देर बाद वह उठे और लड़की के सिर पर हाथ रख कर कहा,’लड़की तेरी पतंग भी एक दिन आसमान को छुएगी.’

ज़रा वाजा लाओ

नूरजहाँ को दावतों के बाद या कहें लोगों की फ़रमाइश पर गाना सख़्त नापसंद था.

एक बार दिल्ली के विकास पब्लिशिंग हाउस के प्रमुख नरेंद्र कुमार उनसे मिलने लाहौर गए. उनके साथ उनका किशोर बेटा भी था.

यकायक नरेंद्र ने मैडम से कहा, ‘मैं अपने बेटे के लिए आपसे कुछ माँगना चाह रहा हूँ क्योंकि मैं चाहता हूँ कि वह इस क्षण को ताज़िंदगी याद रखे. सालों बाद वह लोगों से कह सके कि एक सुबह वह एक कमरे में नूरजहाँ के साथ बैठा था और नूरजहाँ ने उसके लिए एक गाना गाया था.’

वहाँ उपस्थित लोगों की सांसे रुक गईं क्योंकि उन्हे पता था कि नूरजहाँ ऐसा कभी कभार ही करती हैं.

नूरजहाँ ने पहले नरेंद्र को देखा, फिर उनके पुत्र को और फिर अपने उस्ताद ग़ुलाम मोहम्मद उर्फ़ ग़म्मे ख़ाँ को.

’ज़रा वाजा तो मँगवाना.’ उन्होंने उस्ताद से कहा. एक लड़का बग़ल के कमरे से ’वाजा’उठा लाया. वाजा यानी हारमोनियम.

उस्ताद ग़म्मे ख़ान ने तान ली..... फिर दूसरी और फिर तीसरी...फिर उनकी तरफ़ देखा. मैडम ने कहा, ‘अपर वाला सा लाओ’ वह चाहती थीं कि वह एक सप्तक और ऊँचा लगाएं.

उन्होंने नरेंद्र से पूछा क्या गाऊँ? नरेंद्र को कुछ नहीं सूझा. किसी ने कहा ‘बदनाम मोहब्बत कौन करे गाइए.’ नूरजहाँ के चेहरे पर जैसे नूर आ गया.

उन्होंने मुखड़ा गाया और फिर बीच में रुक कर नरेंद्र से कहा, ‘नरेंद्र साहब, आपको पता है इस देश में ढ़ंग का हारमोनियम नहीं मिलता. सिर्फ़ कलकत्ता में अच्छा हारमोनियम मिलता है. यह सभी लोग भारत जाते हैं, बाजे लाते हैं और मुझे उनके बारे में बताते हैं लेकिन..... टूटपैने मेरे लिए कोई हारमोनियम नहीं लाता. ’

नरेंद्र ने कहा मैं भेजूँगा आपके लिए. नरेंद्र यह वादा शायद कभी पूरा नहीं कर पाए.

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