चला गया ग़ज़ल गायकी का अंदाज़........

  • 10 अक्तूबर 2011
गायक जगजीत सिंह इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption आम आदमी में ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाने का श्रेय जगजीत सिंह को जाता है.

आम आदमी में ग़ज़ल गायकी को लोकप्रिय बनाने का श्रेय जगजीत सिंह को जाता है. ‘ग़ज़ल किंग’ के नाम से मशहूर, जगजीत सिंह के निधन पर फ़िल्म और संगीत जगत की कई हस्तियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी.

सोमवार 10 अक्टूबर को सुबह मुंबई के एक अस्पताल में उनका 70 वर्ष की आयु में निधन हो गया. उन्हें इस अस्पताल में 23 सितंबर को ब्रेन हैमरेज होने के बाद भर्ती कराया गया था.

बीबीसी ने लता मंगेशकर, संगीतकार ख़य्याम, अभिनेता फ़ारुख़ शेख़ और रज़ा मुराद से बात की.

लता मंगेशकर ने बताया कि जगजीत सिंह एक बहुत अच्छे इंसान थे और बहुत ही मृदुभाषी भी थे.

सुनिए क्या कहती हैं लता मंगेशकर

लता जी ने कहा, “ वे बहुत बड़े कलाकार थे, उन्होंने ग़ज़ल गायकी में अपनी जगह तैयार की थी. उनके निधन से ग़ज़ल गायकी पर बहुत असर पड़ेगा क्योंकि नए गायकों में ग़ज़ल का कोई ठिकाना नहीं है, वो संगीत अब ख़त्म हो चुका है. जगजीत जी के साथ उनका स्टाइल, उनकी आवाज़, उनका गाना, ग़ज़लें पसंद करना, अच्छी शायरी लेना, ये सब उनके साथ चला गया है.”

जगजीत सिंह की ग़ज़लों में से लता मंगेशकर को सबसे ज़्यादा पसंद ‘आहिस्ता आहिस्ता’ थी जिसे वो अक्सर सुनती थीं.

अभिनेता फ़ारूख़ शेख़ मानते हैं कि ग़ज़ल को आम आदमी तक पहुंचाने में जगजीत सिंह का बहुत बड़ा योगदान था. उनकी फ़िल्म साथ-साथ के गाने जगजीत सिंह और उनकी पत्नी चित्रा सिंह ने गाए थे जो बहुत लोकप्रिय हुए थे.

फ़ारुख़ शेख़ ने बताया, “उन्होंने ग़ज़ल गायकी में इंस्ट्रूमेंटेशन का इस्तेमाल किया जो इससे पहले किसी ने नहीं किया था. मसलन गिटार आपको उनकी ग़ज़ल गायकी में सुनाई दिया और ऐसे और कई वाद्य जो पॉपुलर म्यूज़िक में आते हैं वो उन्होंने अपने गानों में शामिल करने शुरु किए.”

उन्होंने आगे बताया, “मैं 40-45 साल से पहले से उन्हें जानता था. वो सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज में अक्सर आया करते थे जहां मैं पढ़ता था. वो एक दिलचस्प शख़्सियत थे. उनके स्टेज शोज़ में भी आप देखेंगे कि वो दर्शकों को इंवॉल्व करते थे, कभी कोई लतीफ़ा सुना देते थे. वो एक बहुत ज़िंदादिल इंसान थे.”

अभिनेता रज़ा मुराद कहते हैं कि जगजीत सिंह ग़ज़ल गायकी में एक इंक़लाब लेकर आए और उनकी वजह से पूरी दुनिया में ग़ज़लों को हुई हैं. उन्होंने कहा, “एक समय में समझा जाता था कि ग़ज़ल सिर्फ़ बड़ी उम्र के लोग ही पसंद करते हैं लेकिन उन्होंने उन ग़ज़लों का चयन किया जो एक आम आदमी को पसंद आएं और यही वजह है कि नौजवान भी ग़ज़ल को पसंद करने लगे.”

संगीतकार ख़य्याम भी कहते हैं कि जगजीत सिंह ने ग़ज़ल को दुनिया भर में पहुंचाया. उन्होंने कहा, “ ये सिर्फ़ जिस्मानी तौर पर जुदाई हुई है लेकिन जगजीत सिंह की आवाज़, उनकी कला और वो हमेशा हमारे साथ रहेंगे.”

मुंबई में पत्रकारों से बात करते हुए लेखक-गीतकार जावेद अख़्तर ने कहा कि जगजीत सिंह के निधन से हिंदुस्तान में ग़ज़ल की आवाज़ गूंगी हो गई है.

1982 की फ़िल्म साथ-साथ में जावेद अख़्तर के लिखे गीतों को जगजीत सिंह ने आवाज़ दी थी. जावेद कहते हैं, “मेरा उनसे संबंध बहुत पुराना है. फ़िल्म साथ-साथ में पहली बार काम किया था. उसके बाद हमने दो ऐल्बम भी साथ किए. हमारे यहां तो ज़्यादातर फ़िल्मी संगीत चलता है. लेकिन लोकप्रिय संगीत में फ़िल्मों के बाहर अपना एक अलग मुकाम बनाना और 25 बरस तक उस पर बने रहना कोई आसान बात नहीं है.”

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