अशोक कुमार के 100 साल

  • 3 नवंबर 2011
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हिंदी फ़िल्में देखने की सबसे पहली यादें दूरदर्शन की देन हैं. 50, 60 और 70 के दशक में सिनेमा रविवार को देखने को मिलता था.

इसे इत्तेफ़ाक कहिए या फिर कुछ और कि शुरुआत में जो भी हिंदी फ़िल्में दूरदर्शन पर देंखी या दिखाई जाती थीं, उनमें हीरो के अलावा फ़िल्म में बुज़ुर्ग या उम्रदराज़ किरदार में एक शख़्स ज़रूर होता था. कुछ धुँधली सी यादें हैं मिली, छोटी सी बात, खट्टा मीठा जैसी फ़िल्मों की.

सुनिए अशोक कुमार पर रिपोर्ट

चश्मा पहने, हाथ में सिगार लिए उस शख़्स के चेहरे पर हमेशा मुस्कुराहट बिखरी रहती थी. पता चला इन्हें अशोक कुमार कहते हैं. बाल मन को लगता था कि अशोक कुमार हमेशा से ही बूढ़े रहे होंगे.

फिर एक दिन दूरदर्शन पर फ़िल्म महल देखने को मिली...युवा से अशोक कुमार मुग्ध कर देने वाली मधुबाला के साथ. अशोक कुमार को हमेशा बूढ़े बुज़ुर्ग की छवि में देखने वाले बाल मन को उस दिन बड़ी हैरत हुई कि वे कभी जवान भी थे...

अगर अशोक कुमार ज़िंदा होते थे अक्तूबर 2011 में 100वां जन्मदिवस मना रहे होते. आज़ादी से पहले के इंडिया से लेकर मिस्टर इंडिया जैसी फ़िल्मों के गवाह रहे हैं अशोक कुमार जिन्हें प्यार से लोग दादामुनी कहते थे. अशोक कुमार हिंदी सिनेमा के पहले बड़े सितारे कहे जाते हैं.

उनकी लोकप्रियता का किस्सा सुनाते हुए स्तंभकार जयप्रकाश चौकसे कहते हैं, "राज कपूर की शादी थी, उस समय वे बड़े सितारे नहीं थी. तभी किसी ने चिल्लाया अशोक कुमार आए हैं. दुल्हन यानी राज कपूर की पत्नी ने सुना तो घूँघट हटा लिया. राज कपूर पत्नी से कई दिनों तक ख़फ़ा रहे थे कि अशोक कुमार का नाम सुना और घूँघट हटा लिया?"

पहले बड़े सितारे

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40 के दशक में भारतीय सिनेमा के किरदारों पर नाट्य मंच का प्रभाव अधिक था. युवा अशोक कुमार ने इस रिवायत को बदला...सहज, स्वभाविक अभिनय के साथ पर्दे पर उतरे अशोक कुमार को लोगों ने सर आँखों पर बिठाया.

दिलीप कुमार, देव आनंद, शम्मी कूपर जैसे नायकों से भी वरिष्ठ थे अशोक कुमार. इन सब लोगों के लिए अशोक कुमार किसी सुपरस्टार से कम नहीं थे. काम की तलाश में लगे युवा देव आनंद बताते हैं कि जब उन्होंने पहली बार अशोक कुमार को देखा था तो देखते ही रह गए थे.

फ़िल्मों में उनके आने का किस्सा भी काफ़ी दिलचस्प है.

वरिष्ठ स्तंभकार जयप्रकाश चौकसे बताते हैं, “वकीलों के परिवार से ताल्लुक़ रखने वाले अशोक कुमार बाम्बे आए और निर्माता-निर्देशक हिमांशु राय के साथ बतौर तकनीशियन काम करने लगे. हिमांशु राय अपनी फ़िल्म के हीरो हुसैन से ख़ासे नाराज़ थे क्योंकि अफ़वाहें थीं कि हीरो का फ़िल्म की हीरोइन देविका रानी के साथ अफ़ेयर है जो हिमांशु राय की पत्नी भी थीं. नाराज़ हिमांशु राय ने तकनीशियन अशोक कुमार से कहा कि अब देविका रानी के हीरो वही बनेंगे. अशोक कुमार ने बहुत कहा कि मुझे ऐक्टिंग-वेक्टिंग नहीं आती. पर उनकी एक न चली. साल था 1936 और फ़िल्म थी जीवन नैया.”

उसके बाद आई अछूत कन्या ने उन्हें स्टार बना दिया. कंगन, बंधन, झूला जैसी फ़िल्मों ने उन्हें और सफलता दिलाई. फिर 1943 में उन्होंने वो किया जो तब तक कम ही अभिनेताओं ने किया था. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान आई फ़िल्म किस्मत में उन्होंने एंटी हीरो का किरदार निभाया.

शोले, जंजीर जैसी फ़िल्मों के सहलेखक सलीम की पहली कहानी अशोक कुमार ने ही ख़रीदी थी और उनके काफ़ी करीब थे.

वे कहते हैं, "लोग कहते हैं हमने पहली बार एंटी हीरो की कहानी गढ़ी, अमिताभ बच्चन पहले एंटी हीरो हैं लेकिन ये काम अशोक कुमार ने सबसे पहले किस्मत में किया था. वो भी उस ज़माने में. वो फ़िल्म पाँच साल तक चली थी."

अशोक कुमार की गिनती पारंपरिक हिंदी सिनेमा के अच्छे दिखने वाले नायकों में शायद नहीं होती थी, लेकिन अपने सहज अभिनय और व्यक्तित्व से अशोक कुमार ने अपना नाम दिग्गजों में शुमार करा लिया.

फ़िल्म महल में उनका किरदार हो, परिणीता में मीना कुमारी के प्रेमी शेखर की रोमांटिक भूमिका हो, बंदिनी में अपने प्यार को क़ुर्बान करता आज़ादी का मतवाला हो, चलती का नाम गाड़ी में गुदगुदाती भूमिका हो या बहु बेग़म का नवाब सिकंदर मिर्ज़ा...50 और 60 के दशक में बतौर हीरो कई यादगार रोल अशोक कुमार ने अदा किए.

बहुमुखी प्रतिभा

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वे देव आनंद, दिलीप कुमार और शम्मी कपूर जैसे अभिनेताओं से वरिष्ठ हैं.

कहते हैं कि पान पराग का टीवी विज्ञापन शम्मी कपूर ने इसलिए किया था कि इसमें अशोक कुमार भी थे जबकि राज कपूर नाराज़ हुए थे कि शम्मी कपूर ने पान मसाले का विज्ञापन क्यों किया. जब युवा देव आनंद संघर्ष कर रहे थे तो अशोक कुमार बड़े लोकप्रिय हीरो थे.

60 के दशक के अंत तक आते-आते वे चरित्र भूमिकाएँ करने लगे थे. लेकिन ये कोई छोटे मोटे रोल नहीं थे. 1968 में ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म आशीर्वाद में अशोक कुमार ने एक बूढ़े सिद्धांतवादी व्यक्ति की भूमिका निभाई थी, जो उसूलों के लिए परिवार तक को छोड़ देता है. उस दमदार अभिनय के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर और राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था.

लेखक सलीम बताते हैं कि अशोक कुमार बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे.

वे बताते हैं, "उनकी ख़ूबियाँ देखकर कभी-कभी जलन होती थी. वे बहुत ही अच्छी पेंटिंग किया करते थे. कई ज़ुबानों के जानकार थे. होम्योपैथी का गहन अध्ययन करते थे और कई अभिनेता-अभिनेत्रियों को दवा भी देते थे. गाड़ियों का बहुत शौक था. उस ज़माने में रोल्स रॉयस वाले किसी किसी को ही गाड़ी बेचा करते थे- रुतबा देखकर. अशोक कुमार शायद पहले स्टार थे जिनके पास रोल्स रॉयस थी."

अगर उनके छोटे भाई किशोर कुमार बेमिसाल गायक थे, तो थोड़ा बहुत हाथ अशोक कुमार भी आज़मा लेते थे. फ़िल्म आशीर्वाद में उनके गाए गाने रेल गाड़ी को हिंदी सिनेमा के शायद पहले रैप गाने के तौर पर याद किया जाता है.

हिंदी सिनेमा में अशोक कुमार के योगदान के बारे में जयप्रकाश चौकसे का कहना है, "अशोक कुमार 40 के दशक से काम कर रहे थे, जब फ़िल्मों को अच्छे नज़रिए से नहीं देखा जाता है. अशोक कुमार का पहला योगदान तो ये है कि उन्होंने इस पेशे को समाज में सम्मानजनक बनाया. वे हिंदी सिनेमा के पहले बड़े सितारे थे. लेकिन उन्होंने ख़ुद को कभी सितारा छवि में क़ैद नहीं किया. मुख्य हीरो से लेकर सिगार पीते अपराधी तक की भूमिकाएँ उन्होंने की. चेन स्मोकर वाली उनकी छवि तो काफ़ी मशहूर थी."

उनकी पत्नी और दोनों छोटे भाई अशोक कुमार से पहले ही दुनिया को अलविदा कह गए. अपने जन्मदिवस पर ही प्रिय भाई किशोर की मौत के बाद उन्होंने अपना जन्मदिन मनाना छोड़ दिया, लेकिन ज़िंदगी जीने का जज़्बा नहीं छोड़ा.

आज फ़िल्मी चकाचौंध और ग्लैमर के बीच नई पीढ़ी अशोक कुमार के काम और रुतबे से शायद अच्छी तरह वाकिफ़ न हो. उनके 100वें जन्मदिन का उतना शोर भी नहीं हुआ..लेकिन भारतीय सिनेमा के लगभग 100 बरस लंबे सफ़र में अशोक कुमार बेमिसाल हमसफ़र रहे हैं.

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