गोवा फ़िल्म महोत्सव से

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Image caption अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव के दूसरे दिन यहां आई माधुरी दीक्षित

हालांकि मुझे गोवा आए अभी बस दो ही दिन हुए हैं लेकिन मुझे यहां की आदत हो रही है. पता नहीं कि ये अच्छी बात है या फिर बुरी. गोवा में चल रहे फ़िल्म महोत्सव के ख़त्म होने के बाद जब मैं मुंबई लौटूंगी तो मेरा दिल वहां कैसे लगेगा? लेकिन अभी से वापस जाने की बात क्यों सोचूं, जिनते दिन मैं यहां हूं क्यों न मैं भी गोवा के रंग में ही रंग जाऊं.

आज 42वें अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव का दूसरा दिन था. चलिए शुरू से बताती हूं आपको कि आज यहां क्या-क्या हुआ.

आज सुबह से ही यहां मौजूद लोगों और पत्रकारों को बस एक ही इंसान का इंतज़ार था. मैं बात कर रही हूं अभिनेत्री माधुरी दीक्षित की. इतने साल हो गए माधुरी को हिंदी सिनेमा से जुड़े़ हुए लेकिन एक चीज़ जो आज भी वैसी की वैसी ही है वो है उनकी मुस्कुराहट. यहां भी उन्होंने अपनी मुस्कुराहट का जादू बिखे़रा.

माधुरी यहां आई थीं शॉर्ट फ़िल्म सेंटर और इंडियन पैनोरामा का उद्घाटन करने के लिए. उनके साथ इस मौके पर मौजूद थे अभिनेता जैकी श्रौफ़ भी. माधुरी ने इस मौके पर इंडियन पैनोरामा से जुड़े़ लोगों को सम्मानित भी किया. इंडियन पैनोरामा की ओपनिंग फ़िल्म थी निर्देशक संतोष सिवन की मलयालम फ़िल्म 'उर्मी'.

अगर पहली बार गोवा आ कर मुझे गोवा से प्यार हो सकता है तो माधुरी तो यहां पहले भी दो बार आ चुकी हैं. माधुरी ने बताया कि उन्हें भी इस जगह से बेहद लगाव है. यहां तक कि गोवा उनका पसंदीदा शहर है. अब क्योंकि माधुरी एक फ़िल्म अभिनेत्री हैं तो फ़िल्में और फ़िल्मी अंदाज़ कहां उनका पीछा छोड़ने वाला है. तो बस अपने फ़िल्मी अंदाज़ में माधुरी ने कुछ ये कह डाला, ''देखा है तीसरी बार गोवा कि आंखों में प्यार''.

अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव की तारीफ़ करते हुए माधुरी ने कहा कि इस महोत्सव के ज़रिये भारत और दुनिया के कोने-कोने से आए लोग आपस में मिलते हैं विचारों का आदान-प्रदान करते हैं. एक दूसरे से काफी कुछ सीखते भी हैं.

ये समारोह दोपहर तक चला और दोपहर होते होते मेरे पेट में चूहे बिल्ली और न जाने कौन-कौन से जानवर उछलने कूदने लगे. तो बस इन सब जानवरों को चुप कराने के लिए मैं पहुंच गई समुंद्र किनारे स्तिथ एक भोजनालय में. आपको तो पता ही है की मुझे मछली खाना कितना पसंद है और यहां मैंने मंगवाए दो तीन तरह के मछली से बने पकवान. यकीन मानिए 'फिश-लवर्स' के लिए स्वर्ग से कम नहीं है गोवा.

वैसे आज मेरे पास कुछ समय था तो मैंने सोचा कि क्यों न गोवा की सैर कर ली जाए. काश मुझे गाड़ी चलाना आता तो मैं भी बाकि सैलानियों की तरह कार या मोटर-साईकिल किराए पर लेकर गोवा घुमती.

खैर, फिर भी मैंने तय किया कि मैं अपना समय गोवा के समुंद्ररी तटों पर बिताउं. रेत पर बैठ कर सामने से लहरों को आता-जाता देख मन हुआ कि बस वक़्त को यहीं रोक लूं, लेकिन क्या करूं वक़्त बड़ा ही जिद्दी है आप कितना भी उसे रोकने की कोशिश करें वो आपकी एक भी नहीं सुनता और आगे बढ जाता है. तो बस धीरे-धीरे दिन ढल गया, गहरे समुंद्र की गोद में सूरज चल पड़ा सोने और मैंने भी रास्ता पकड़ा वापस अपने होटल की ओर.

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