नाम में क्या रखा है?

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Image caption फ़िल्मों के बोल्ड शीर्षकों से कोई ऐतराज़ नहीं है सुधीर को.

अंग्रेज़ी साहित्यकार शेक्सपियर का कहना था कि नाम में क्या रखा है? लेकिन अगर वो आज होते और हिंदी फ़िल्मों के बोल्ड शीर्षकों को सुनते तो क्या तब भी वो ये ही कहते कि नाम में क्या रखा है. शायद नहीं.

एक ज़माना था जब हिंदी फ़िल्मों के नाम हुआ करते थे 'मुग़ल-ए-आज़म', 'मदर इंडिया', 'मेरा गांव मेरा देस' लेकिन धीरे-धीरे समय ने करवट ली और फ़िल्मों के नाम होने लगे 'कमीने', 'बुढ्ढा होगा तेरा बाप' और 'द डर्टी पिक्चर'.

वक़्त के साथ साथ न सिर्फ फ़िल्मों का स्वरुप बदला बल्कि उनके शीर्षक भी बदलने लगे. आज की फ़िल्में जितनी बोल्ड हो गई हैं उनते ही बोल्ड होने लगे हैं उनके शीर्षक भी.

इस बदलाव से फ़िल्मकार सुधीर मिश्रा को कोई परेशानी नहीं है. सुधीर कहते हैं, ''फ़िल्म का शीर्षक उस फ़िल्म की प्रवृति को दर्शाता है. हर फ़िल्मकार को फ़िल्म का शीर्षक चुनने की आज़ादी है. अगर एक फ़िल्म का शीर्षक 'ये वो मंजिल तो नहीं' हो सकता है तो वहीं फ़िल्म का नाम 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' भी हो सकता है और 'ये साली ज़िन्दगी' भी फ़िल्म का शीर्षक हो सकता है. फ़िल्म का शीर्षक तो उसकी फितरत को बयान करता है बस.''

गोवा में चल रहे 42वें अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव में शिरकत करने वाले सुधीर मिश्रा मानते हैं कि इस तरह के फ़िल्म महोत्सव एक बहुत अच्छा मंच हैं. सुधीर कहते हैं, ''यहां आप अलग-अलग तरह की फ़िल्में देख सकते हैं, यहां आपको अपनी सोच को सुधारने का मौका भी मिलता है. यहां दिखाई जा रही फ़िल्मों को देख कर आपको पता चलता है कि फ़िल्में बनाने की प्रक्रिया कहां से कहां पहुंच गई है.''

सुधीर तो नए फ़िल्मकारों को सलाह देने से भी नहीं हिचके. वो कहते हैं, ''युवा फ़िल्मकारों को इस तरह के महोत्सवों में ज़रूर शामिल होना चाहिए. उनकी सोच खुलेगी और वो भारतीय सिनेमा को बहुत आगे ले जा पाएंगे. मैं खुद हर साल इस महोत्सव में आता हूं और हर बार कुछ न कुछ सीख कर ही जाता हूं.''

सुधीर मानते हैं कि इस तरह के आयोजनों से भारत में बनने वाली फ़िल्मों को भी अंतर्राष्ट्रीय मंच प्राप्त होता है. विदेशी दर्शक और फ़िल्मकार भी भारतीय सिनेमा से परिचित हो पाते हैं.

गोवा में चल रहा 42वां अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव 3 दिसंबर तक चलेगा और यहां 67 देशों की 167 से भी ज़्यादा फ़िल्में दिखाई जा रही हैं.

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