अब 'हरे रामा-हरे कृष्णा’ टाइटल मेरा हो गया !

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हिंदी फ़िल्म जगत के मशहूर अभिनेता मनोज कुमार के घर का टेलीफ़ोन बजता है, मनोज कुमार फ़ोन उठाते हैं.

दूसरे छोर से आवाज़ आती है, 'मनोज'.

मनोज कुमार कहते हैं, 'जी भाईसाहब'

दूसरे छोर से आवाज़ आती है, 'अरे भाई ये 'हरे रामा-हरे कृष्णा' तुम्हारा टाइटल है. ये तुम्हारे नाम पर रजिस्टर्ड हुआ है.'

मनोज कुमार कहते हैं, 'जी भाईसाहब'.

दूसरे छोर से आवाज़ आई, 'तो ये आज से मेरा हो गया.'

और फ़ोन करने वाले ने फ़ोन रख दिया. वो फ़ोन करने वाले थे, देव आनंद.

इस वाकये को याद करते हुए मनोज कुमार कहते हैं, "फोन रखने के बाद मैं बहुत हँसा. मैंने अपनी पत्नी से कहा कि उनको अपने आप पर तो विश्वास है,लेकिन ये देव साहब ही हैं, जो दूसरों पर भी विश्वास करते हैं. दूसरों पर विश्वास करने वाला आदमी बड़ा महान होता है."

मनोज कुमार और देव आनंद बहुत क़रीबी दोस्त थे. अपने पुराने दिनों को याद करते हुए मनोज कुमार कहते हैं, "जब मेरे पिताजी का देहांत हुआ तो मैं बड़ा ही दुखी और हताश था. तब डेढ़ महीने लगातार देव साहब सुबह हो, दोपहर हो या शाम, दिन में दो घंटे मेरे साथ ज़रूर बिताते थे. कोई मानेगा नहीं कि वो ऐसा भी करते होंगे."

मनोज कुमार कहते हैं, "वो कर्मयोगी थे. और उनका तो गाना भी था 'मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया.' मग़र अफ़सोस कि ज़िंदगी ने उनका साथ छोड़ दिया."

मनोज कुमार कहते हैं कि देव साहब के चले जाने का लाहौर वालों ने भी दुख मनाया होगा. मनोज कुमार कहते हैं, "गवर्मेंट कॉलेज़ लाहौर में पढ़ने वाले को रावीयन बोलते हैं. रावी जो दरिया है. रावी दरिया के पार भी जिसने ये ख़बर सुनी होगी वो या तो रुक गया होगा या उसने भी दो आँसू बहाए होंगे."

मनोज कुमार कहते हैं कि देव साहब ने अपने दिमाग़ को काबू में कर लिया था, वे दिमाग़ के गुलाम नहीं थे और दिल से काम लेते थे.

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