देव आनंद-'मेरे लबों पे देखो आज भी तराने हैं'

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जिन दो गायकों के स्वर पर्दे पर देव आनंद के साथ सबसे ज्यादा जमे, वे थे मोहम्मद रफ़ी और किशोर कुमार. रफ़ी और किशोर के स्वरों को देव आनंद ने पर्दे पर प्रेम की, मस्ती की, दर्शन की, दर्द की ऐसी अभिव्यक्ति दी कि गायक और नायक के बीच की दूरी ख़त्म सी हो गई.

दोनों गायकों के बारे में देव साब का ख़ुद का कहना था कि 'रफ़ी ने मेरे सबसे सर्वश्रेष्ठ गीत गाए, लेकिन किशोर की आवाज़ मेरे व्यक्तित्व पर ज़्यादा फ़बती है'.

मेरे हिसाब से रफ़ी ने देव आनंद के रूहानी और रोमांटिक अंदाज़ को बखूबी स्वर दिये तो किशोर ने उनकी ऊर्जा और उनके अंदर के मनमौजी, खिलंदड़पने को अपने स्वरों में पेश किया. तलत महमूद ने भी कई ख़ूबसूरत गीतों में देव आनंद को स्वर दिए जैसे 'जाएं तो जाएं कहां', 'हैं सबसे मधुर वो गीत' और 'तुम तो दिल के तार छेड़ कर'. मन्ना डे (काला बाज़ार, किनारे किनारे) और मुकेश (शायर, विद्या) ने देव आनंद के लिए कभी कभी ही पार्श्व गायन किया.

और हां देव आनंद की फ़िल्मों मे सचिन देव बर्मन के स्वरों में कुछ गीत (गाइड, प्रेम पुजारी) बहुत यादगार रहे. देव आनंद के सिनेमाई व्यक्तित्व को पर्दे पर उनके गीतों से शब्दों का आकार देने में जिन गीतकारों ने सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई वो थे साहिर, मजरूह, शैलेन्द्र और नीरज.

हिंदी फ़िल्मों में कभी भी यदि सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म संगीत एलबमों की सूची बनाई जाएगी तो देव आनंद की जयदेव द्वारा स्वरबद्ध 'हम दोनों' और सचिन देव बर्मन की स्वरबद्ध 'गाइड' हमेशा सबसे ऊपर के स्थानों पर रखी जाएंगी.

वैश्विक स्तर पर भी भारतीय फ़िल्म संगीत का सबसे बेहतरीन प्रतिनिधित्व करती हैं ये दो फ़िल्में. 'पिया तोसे नैना लागे रे' में भारतीय लोक और शास्त्रीय संगीत का अनूठा मेल है तो 'अल्लाह तेरो नाम ईश्वर तेरो नाम' साम्प्रदायिक सद्भभाव की बेहतरीन मिसाल. 'मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया ' और 'वहां कौन है तेरा' में जीवन दर्शन है तो 'कभी ख़ुद पे कभी हालात पे' और 'दिन ढल जाये' में दर्द और विरह की ग़ज़ब की अनुभूति.

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'कांटों से खींच के ये आंचल' मे परंपराओं को ठुकराता एक विद्रोही गीत है, सचिन दा ने जिसकी संरचना में परंपरा से हट कर मुखड़े की बजाय, अंतरे से गीत को शुरुआत दी, और इनके सबके साथ रोमांस के रंग बिखेरते 'अभी ना जाओ छोड़ कर' और 'तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं' जैसे अद्भुत गीत हैं. हिंदी फ़िल्म संगीत को हम दोनों और गाइड का संगीत नवकेतन का अमूल्य योगदान है.

देव आनंद के गीतों का एक और महत्तवपूर्ण पहलू था पर्दे पर अपनी अभिनेत्रियों के साथ उनकी केमिस्ट्री, जो गीतों में बहुत ख़ूबसूरती से उभर के सामने आती थी. काला पानी में मधुबाला के साथ छेड़-छाड़ की मस्ती लिए 'अच्छा जी मैं हारी चलो मान जाओ ना' हो या सुचित्रा सेन के साथ बंबई का बाबू में 'दीवाना मस्ता हुआ दिल'.

साधना के साथ हम दोनों में 'अभी ना जाओ छोड़ कर', कल्पना के साथ नौ-दो-ग्यारह में 'आजा पंछी अकेला है', नूतन के साथ 'दिल का भंवर करे पुकार'/'छोड़ दो आंचल' या फिर वहीदा रहमान के साथ 'गाता रहे मेरा दिल' ऐसे कितने ही ज़बरदस्त गीतों की 'इमेजेस' 50 से ज्यादा वर्षों के बाद भी बिल्कुल ताज़ा है.

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