देव आनंद-'मेरे लबों पे देखो आज भी तराने हैं'

देव आनंद का जाना एक जोगी का चले जाना है. अलौकिक आभा लिए एक रमता जोगी, जिसने परदे पर अपनी मौजूदगी से, अपने गीतों से और परदे से परे, व्यक्तिगत जीवन में भी जीवन के कई अनूठे रंगों से हमारा परिचय कराया.

एक असाधारण व्यक्तित्व, असीमित ऊर्जा से दमकता एक प्रेरणा पुंज, जिसकी चमक आने वाली कई पीढ़ियों तक बरक़रार रहेगी. स्कूल के दिनों में मुझे याद है उन्हीं के एक गीत की पैरोडी बहुत प्रचलित थी "सौ साल पहले, देवानंद जवान था, आज भी है और कल भी रहेगा.”

बहुत मज़े लेकर गाते थे ये गीत और सच मानिए आज भी ज़ोर से यही गीत गाकर देव साब के चले जाने की ख़बर को झुठलाने और दिल को बहलाने की कोशिश हो रही है.

देव आनंद ने अपने फ़िल्मी सफ़र की शुरुआत 1946 में 'हम एक हैं' से की थी, 'आगे बढो', 'मोहन', 'हम भी इंसान हैं' जैसी कुछ फ़िल्मों के बाद, उनके सफ़र का पहला मुख्य मील का पत्थर साबित हुई फ़िल्मिस्तान की 'ज़िद्दी'. खास बात ये थी कि लता मंगेशकर और किशोर कुमार के लिए भी 'ज़िद्दी' प्रारंभिक दौर की सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्म रही.

खेमचंद प्रकाश के संगीत निर्देशन में किशोर कुमार ने देव आनंद के लिये पहला एकल गीत गाया 'मरने की दुआएं क्यूं मांगूं, जीने की तमन्ना कौन करे'. 'ज़िद्दी' में किशोर कुमार ने देव आनन्द के माली की एक छोटी से भूमिका भी निभाई और कुछ दृश्यों में देव आनन्द के साथ पर्दे पर अवतरित भी हुए.

आने वाले समय के एक लंबे और मज़बूत रिश्ते की शुरुआत भर थी ये. इसके बाद 'जीत', 'नमूना', 'खेल' जैसी फ़िल्मों के गीत लोकप्रिय तो हुए पर धूम नहीं मचा सके.

देव आनंद के फ़िल्मी सफ़र में अगला महत्वपूर्ण पड़ाव था नव केतन की स्थापना और इस बैनर के तहत पहली फ़िल्म थी 'अफ़सर'. 'अफ़सर' में संगीत की ज़िम्मेदारी सचिन देव बर्मन को सौंपी गई जो देव आनंद के साथ पहले 'विद्या' कर चुके थे.

'अफ़सर' में सुरैया के गाये 'मन मोर हुआ मतवाला' और 'नैन दीवाने' की याद आज भी संगीत प्रेमियों के जेहन में ताज़ा है.

1952 में आयी 'जाल' में देव आनंद हीरो के एक गैर पारंपरिक अवतार में प्रस्तुत हुए.उनकी भूमिका नकारात्मक भाव लिये खलनायक सी थी, लेकिन 'ये रात ये चांदनी फ़िर कहां, सुन जा दिल की दास्तां' में अपने प्रेम की ऐसी जादुई अभिव्यक्ति पर्दे पर उन्होने प्रस्तुत की, कि उनके मोहपाश से छूट पाना लगभग नामुमकिन सा हो गया.

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सचिन देव बर्मन की धुन, साहिर के बोल, हेमंत कुमार की आवाज़ के साथ देव आनंद के व्यक्तित्व ने एक कालजयी रचना के जन्म में बड़ी भूमिका निभाई. हेमंत कुमार के स्वरों और पर्दे पर देव आनंद के व्यक्तित्व ने इसके बाद और बहुत से गीतों में मोहक प्रभाव उत्पन्न किया.

'है अपना दिल तो आवारा', 'याद किया दिल ने कहां हो तुम', 'ना तुम हमें जानो', 'तेरी दुनिया में जी ने से तो बेहतर है', 'आ गुप चुप गुप चुप प्यार करें' जैसी अमर रचनाओं के के अतिरिक्त 'दिल की उमंगें हैं जवां' और 'शिव जी बिहाने चले' जैसे मज़ेदार गीत भी इस जोड़ी ने दिए.

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