'सिर्फ़ बड़ी फ़िल्मों को तवज्जो क्यों'

  • 11 दिसंबर 2011
मनोज बाजपेई

अभिनेता मनोज बाजपेई नाराज़ हैं. उनकी नाराज़गी इस बात को लेकर है कि मीडिया सिर्फ़ बड़ी फ़िल्मों और बड़े सितारों को ही तवज्जो क्यों देता है.

बीबीसी से ख़ास बात करते हुए मनोज बाजपेई ने कहा, "बड़ी फ़िल्मों को मीडिया जिस तरह से अहमियत देता है, उस तरह से छोटी और क्वालिटी फ़िल्मों को महत्तव नहीं दिया जाता. अगर एक बड़ा स्टार मंच पर खड़ा हो जाए तो पूरा मीडिया वहां चला जाता है. लेकिन छोटी और अच्छी फ़िल्मों के प्रचार प्रसार में मीडिया कोई मदद नहीं करता."

मनोज ने कहा कि इस चलन से वो हतोत्साहित नहीं होंगे और छोटे बजट की लेकिन अर्थपूर्ण फ़िल्में करते रहेंगे.

मनोज ने कहा कि उनकी कई फ़िल्में अच्छी थीं लेकिन पर्याप्त मार्केटिंग और प्रमोशन के अभाव में वो नहीं चलीं, जैसे 1971, स्वामी और दस तोला.

मनोज के मुताबिक़ पैसे के दम पर बड़ा बैनर तो अपनी फ़िल्मों का ज़बरदस्त प्रचार कर लेता है जिससे साधारण कथानक होने के बावजूद वो फ़िल्में चल जाती हैं, लेकिन छोटी फ़िल्मों को इसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ता है.

वो कहते हैं, "1971 और स्वामी जैसी फ़िल्मों के निर्माता प्रमोशन अच्छे से नहीं कर पाए. मीडिया ने भी इन फ़िल्मों को कोई मदद नहीं की, इसलिए ये नहीं चलीं. अब इनके निर्माता दोबारा ऐसी अच्छी फ़िल्में नहीं बनाएंगे. ये मेरा तो नुकसान है ही इंडस्ट्री का भी नुकसान है."

मनोज मीडिया के साथ-साथ दर्शकों से भी नाराज़ हैं. वो कहते हैं, "दर्शक भी ज़िम्मेदार हैं. मैं उन्हें क़तई माफ़ नहीं करूंगा. वो भी अच्छी फ़िल्में नहीं देखते. इसलिए निर्माता भी अच्छी फ़िल्में नहीं बनाते."

इस शुक्रवार को मनोज बाजपेई की फ़िल्म 'लंका' रिलीज़ हुई. ये फ़िल्म पौराणिक पात्र रावण-विभीषण के रिश्तों का आधुनिक टेक है. फ़िल्म में मनोज बाजपेई ने जसवंत सिसोदिया नाम के एक दबंग का किरदार अदा किया है जो बिजनौर शहर का रहने वाला है.

फ़िल्म में अर्जन बाजवा मनोज के छोटे भाई बने हैं. फ़िल्म में मनोज का पात्र ग्रे शेड्स लिए हुए है. अपनी ज़्यादातर फ़िल्मों में उन्हें इसी तरह के किरदार निभाना क्यों पसंद है.

ये पूछने पर मनोज ने कहा, "मैं ग्रे शेड्स में यक़ीन रखता हूं, क्योंकि आज का इंसान ना तो पूरी तरह से राम है ना ही रावण. सभी में कुछ अच्छाइयां तो कुछ बुराइयां भी होती हैं."

अपने 18 साल लंबे फ़िल्मी करियर में मनोज ने बहुत चुनिंदा फ़िल्में ही की हैं इसकी वजह बताते हुए वो कहते हैं कि अच्छी फ़िल्में बहुत कम बनती हैं और ज़रूरी नहीं कि हर अच्छी फ़िल्म उनके पास ही आए.

बैंडिट क्वीन, तमन्ना, सत्या, शूल, राजनीति और हालिया रिलीज़ आरक्षण में मनोज के अभिनय को बहुत सराहा गया.

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