संगीत समीक्षा - प्लेयर्स

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Image caption 'प्लेयर्स' 6 जनवरी को रिलीज़ हो रही है.

अब्बास-मस्तान नब्बे के दशक में सस्पैंस-क्राइम थ्रिलर फ़िल्मों के पर्याय माने जाते थे. उनकी फ़िल्मों में रहस्य-रोमांच के वातावरण के साथ संगीत भी बहुत लोकप्रिय रहा है. ‘खिलाड़ी’, ‘बाज़ीगर’, ‘सोल्जर’ जैसी फ़िल्मों का संगीत आज भी सुनाई देता है. लेकिन पिछले दशक में अब्बास-मस्तान के निर्देशन की चमक धुंधली पड़ी है और उनकी फ़िल्मों का संगीत का संगीत भी काफ़ी काम-चलाऊ सा रहा है.

इस दशक की फ़िल्मों में संगीत भी फ़िल्म उतर जाने के बाद याद रहने योग्य नहीं रहा है. ‘प्लेयर्स’ अब्बास-मस्तान के निर्देशन में नई प्रस्तुति है. ‘प्लेयर्स’ हॉलीवुड की सफ़ल फ़िल्म ‘द इटालियन जॉब’ का आधिकारिक रीमेक है और इस फ़िल्म से अब्बास-मस्तान को अपनी खोई ज़मीन को हासिल करने की उम्मीद है.

‘प्लेयर्स’ में संगीत दिया है प्रीतम ने और गीत लिखे हैं आशीष पंडित ने, जो प्रीतम के साथ कई फ़िल्मों मे पहले काम कर चुके हैं.

एल्बम में पांच मुख्य गीत हैं और चार गीतों के रीमिक्स वर्ज़न भी मौजूद हैं. एल्बम की शुरुआत होती है शीर्षक गीत से, बहुत कुछ उसका टैम्प्लेट ‘ग्रुप-हीस्ट’ जॉनर की फ़िल्मों के ‘टीम सॉन्ग’ जैसा ही है. गीत की धुन सीधी और सरल है और लोकप्रिय होने की गुंजाइश रखती है. गीत के बोलों में डायलॉगबाज़ी हावी है और ‘जिस जगह पर खत्म सबकी बात होती है, उस जगह से हमारी शुरुआत होती है’ जैसे संवादों का सहारा लेकर गीत रचा गया है. नीरज श्रीधर, मौली दवे और सिद्दार्थ के स्वरों में गीत, फ़िल्म के प्रोमोज़ में फ़िल्म के लिये आधार बनाने में सफ़ल रहा है.

एल्बम में अगली प्रस्तुति है ‘दिल ये बेकरार क्यों है’, जो तीन विभिन्न वर्ज़नों में एल्बम में मौजूद है. धुन और वाद्य संयोजन पर प्रीतम की छाप साफ़ नज़र आती है. मोहित चौहान के स्वर में मुख्य वर्ज़न अच्छा बन पड़ा है और श्रेया घोषाल के केमियो से गीत को और असर मिलता है. निखिल डी सूज़ा और प्रियानी वानी के स्वरों में रिप्राइस वर्ज़न कुछ खास नहीं है.

एक गीत और है ‘क्यों दूरियां.. झूम झूमता हूं मैं" जो फिर से तीन वर्ज़न में है लेकिन प्रीतम ने संयोजन के स्तर पर तीनों को ही अलग रंग देने की कोशिश की है. रितु पाठक के स्वरों में आर्केस्ट्रेशन पर अरेबियन संगीत की छाप है. ये एक क्लब गीत है जो इस किस्म की फ़िल्मो में ज़रूर पाया जाता है. लेकिन इस गीत का दूसरा वर्ज़न सिद्दार्थ के स्वरों में ज्यादा बेहतर बन पड़ा है. सिद्दार्थ की गायकी असरदार है और बहुत कुछ पाकिस्तानी गायक आतिफ़ असलम की याद दिलाती है.

एल्बम के एक हल्की-फ़ुल्की सी प्रस्तुति है ‘चार्लीज़ एंजल्स - बुद्धी दो भगवान’ श्रुति पाठक और यूआरएल के स्वरों में. प्रीतम की धुन बहुत सरल सी है. यूआरएल अभिषेक बच्चन को मिमिक करने की कोशिश में बहुत हद तक सफ़ल हुए हैं फ़िर भी गीत में ज्यादा दम नहीं है. एक मज़ेदार गीत की गुंजाइश थी लेकिन अन्त में एक साधारण सी रचना साबित होती है.

एल्बम की एक और प्रस्तुति यशिता यशपाल के स्वरों में ‘हो गई टुन’ भी बेदम सी है, हालांकि यशिता अपनी गायकी से गीत को असर देने की कोशिश करती हैं फिर भी गीत कोई खास असर नहीं छोड़ पाता.

कुल मिलाकर ‘प्लेयर्स’ का संगीत बहुत फ़ंक्शनल है. एल्बम में नवीनता नहीं है पर पर्दे पर संगीत फ़िल्म को एक उचित माहौल देने की गुंजाइश रखता है. फ़िल्म से हट कर बहुत ज्यादा रखे जाने योग्य नहीं है ‘प्लेयर्स’ का संगीत.

रेटिंग के लिहाज़ से ‘प्लेयर्स’ के संगीत को पांच में से दो (2/5)

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