संगीत समीक्षा - रंगीले

  • 18 जनवरी 2012
कैलाश खेर इमेज कॉपीरइट pr
Image caption 'रंगीले' में कैलाश के दो साल के बेटे कबीर ने भी गाया है.

कैलाश खेर का ‘कैलासा’ बैंड पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी सूफ़ी-रॉक में अपनी एक ख़ास जगह बनाने में सफ़ल रहा है. साल 2006 में बैंड का पहला एलबम आया था ‘कैलासा’ के नाम से जो अपने अनोखे संगीत की वजह से बहुत लोकप्रिय हुआ था उसके बाद बैंड के ‘झूमो रे’ और ‘चांदन में’ भी काफ़ी पसंद किए गए. ‘रंगीले’ बैंड की नवीनतम प्रस्तुति है. बैंड पहली बार इसे अपने लेबल ‘कैलासा रीकॉर्ड्स’ पर जारी कर रहा है.

‘रंगीले’ लोक, शास्त्रीय, सूफ़ीयाना और सॉफ़्ट रॉक के सुरों से सज़ा ग्यारह गीतों का एक विशेष समागम है जिसमें मुख्य स्वरों के साथ शब्द भी कैलाश खेर के हैं. संगीत और स्वरों में उन्हें परेश-नरेश का अच्छा साथ मिला है. कैलाश खेर की आवाज़ का अनोखा टैक्स्चर एलबम को एक उचित वातावरण देता है और उनकी गायकी में लोक गायकी, शास्त्रीय संगीत और आधुनिक गायकी का ख़ूबसूरत मेल, हिन्दी-रॉक संगीत का एक अनूठा संसार रचता है.

एलबम के ग्यारह गीतों में प्रेम, विरह, मस्ती,शरारत और उम्मीद के अलग-अलग रंगों के गीत शामिल हैं. ‘ओ रंगीले’ एल्बम की पहली प्रस्तुति है. फ़ोक, साफ़्ट-रॉक और साफ़्ट-सूफ़ी के अनेक जॉनर मिल कर एक ख़ास अनुभव देने में सफ़ल हुए हैं जिसके लिए ‘कैलासा’ बैंड को जाना जाता है. कैलाश खेर ने इसे अपने चिर-परिचित अंदाज़ में गाया है. ज़िंदगी की उंचाइयों और गहराइयों को नापते रंगीले मन के दर्शन को कैलाश ने अपने बोलों में उभारने की पूरी कोशिश की है. बैंड का वाद्य संयोजन भी प्रभावी है और गीत एलबम को एक बेहतर शुरुआत देने में सफ़ल रहा है.

‘तू क्या जाने’ एलबम की एक और ख़ूबसूरत प्रस्तुति है. गीत की धुन अच्छी बन पड़ी है और परेश-नरेश नें स्वरों में कैलाश का बख़ूबी साथ दिया है. पूरे गीत में गिटार स्ट्रम्मिंग एक माहौल बनाती है और कैलाश और परेश-नरेश के दो अलग-लग स्तरों पर गायकी भी गीत का प्रभाव बढ़ाती है.

अगली प्रस्तुति ‘अलबेलिया’ कैलासा के पुराने प्रचलित रंगों में रंगी है और बहुत कुछ ‘तेरी दीवानी’ और ‘सैंया’ के इंटेंस प्रेमगीतों के टैम्प्लेट पर आधारित है. कैलासा के इस टैम्प्लेट पर ‘मीरा’ के संगीत का प्रभाव साफ़ दिखता है. पहली कुछ बार सुनने के बाद यहां ‘तेरी दीवानी’ या ‘सैंयां’ जैसी गहराई की कमी है. गीत निश्चित रूप से कुछ और बार सुनने के बाद ‘ग्रो’ करेगा फिर भी ‘तेरी दीवानी’ या ‘सैंयां’ की लोकप्रियता हासिल कर पाएगा इसमें शक है.

‘कथागान’ में कैलाश खेर अपनी गायकी से फिर से अलग रंग जमाते हैं. गीत में बंजारों सी मस्ती है और मज़ेदार सी प्रेम कहानी है. इस तरह के गीतों में आज के दौर में कैलाश की गायकी का कोई सानी नहीं है और बैंड का वाद्य संयोजन भी गीत को मज़ेदार बनाने में भरपूर सहयोग देता है. गीतकार के तौर पर ज़रूर कैलाश यहां निराश करते हैं. इस प्रेम कथा में मज़ेदार बोलों की बहुत गुंजाइश थी लेकिन साधारण से बोलों से बहुत ज्यादा असर नहीं छोड़ता ये गीत. ‘यादां तेरियां’ में भी उनकी पुरानी फ़ोक-रॉक फ़्यूज़न प्रस्तुतियों का हैंग-ओवर दिखाई देता है और नवीनता की कमी से ये एक ठीक-ठाक सी रचना बन के रह गई है. ‘अकाउस्टिक’ वर्ज़न भी कुछ ख़ास पेश नहीं करता.

‘डारो ना रंग’ एलबम को एक और रंग देता है. एक बेहतर गीत है पर कुछ ही बार सुनने के बाद अपना असर खोना शुरु कर देता है.

‘धरती पे जन्नत’ भी एक साधारण सी रचना है. अमिताभ बच्चन के ‘केबीसी’ शो में प्रस्तुत पंक्तियां गीत में ठूंसी हुई सी हैं. एलबम के प्रचार में अमिताभ बच्चन का नाम ज़रूर मदद कर सकता है लेकिन संगीत के तौर पर एलबम में कोई विशेष ‘वैल्यू-एडिशन’ नहीं करता.

‘हुड़कान मान बित्ती’ कैलाश खेर की गायन शैली के आस-पास कस्टमाइज़्ड रचना है. गीत की ख़ास बात कैलाश के साथ उनके दो वर्ष के पुत्र कबीर खेर के स्वर हैं. कबीर के स्वर एक क्षणिक, अनूठा अनुभव ज़रूर देते हों लेकिन इससे ज्यादा कुछ योगदान नहीं देते. गीत में एक मज़ेदार रचना होने की बहुत गुंजाइश थी लेकिन ये गीत भी अन्त मे निराश करता है.

‘बाबाजी’ एक श्रद्धांजलि गीत है, पर बहुत असरदार नहीं बन पड़ा है. शब्दों और संगीत का मेल प्रभावी नहीं है गीत में.

कुछ साधारण सी रचनाओं के बाद ‘उजाले बाँट लो’ एलबम को एक बेहतर अन्त देने में सफ़ल हुआ है. उम्मीदों का रंग लिए ये गीत कैलाश की गायकी और शब्दों की वजह से सुनने लायक बन पड़ा है.

सारंश में ‘रंगीले’ कुछ बेहतरीन, कुछ बेहतर और कुछ साधारण रचनाओं का मेल बन पड़ा है. फिर भी ‘कैलासा’ बैंड अपेक्षाओं पर खरा उतरने में कामयाब रहा है. कुछ गीतों पर ‘कैलासा’ के पुराने टैम्प्लेट का खासा प्रभाव है, जो बैंड से नवीनता की आशा रखने वाले कुछ प्रशंसकों को निराश कर सकता है.

कैलाश खेर की गायकी में एक खास कशिश है और उनकी लोक और शास्त्रीय संगीत की समझ बैंड के गीतों में विशेष असर पैदा करती है फिर भी गीतकार के तौर पर उनके शब्दों मे गहराई की कमी है जिसका असर एलबम के गीतों पर पड़ा है.

कुल मिलाकर कुछ अच्छी प्रस्तुतियों के दम पर ‘रंगीले’ हिन्दी-सूफ़ी-रॉक-फ़्यूज़न संगीत में अपना रंग छोड़ने में कामयाब रहा है फिर भी ‘कैलासा’ के पिछले एलबमों जितना लोकप्रिय हो पाएगा इसमें शक़ है.

रेटिंग के लिहाज़ से कैलासा के ‘रंगीले’ को 3/5 (पांच मे से तीन)

संबंधित समाचार