रीमेक फ़िल्म:नया सोचना गुनाह !

अगर कोई आपसे पूछे कि आपके लिए देवदास कौन है तो आपमें से कुछ का जवाब हो सकता है के एल सहगल, कुछ कहेंगे दिलीप कुमार और कुछ युवाओं का जवाब हो सकता है शाहरुख़ ख़ान. जैसे जैसे वक़्त बदलता है बदलता है कहानी बयां करने का तरीका और बड़े पर्दे के किरदार भी. लेकिन साथ ही बीते कुछ समय में कुछ फ़िल्में और कुछ किरदार नए कलेवर में पेश किए जा रहे हैं और इस चलन को नाम दिया गया है रीमेक का.

रीमेक का साल 2012

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रीमेक के निर्माता अक्सर ही ये दावा करते हैं कि ये रीमेक ज़रूर है लेकिन असल फ़िल्म से बिलकुल अलग है और साथ ही ये भी कहा जाता है कि आप उनकी तुलना ना करें.

लेकिन तुलना करना तो इंसानी फ़ितरत है, तो वो होना तो लाज़मी है.

साल 2012 में आपके दिमाग को तुलना करने की मेहनत और ज़्यादा करनी पड़ सकती है क्योंकि इस साल की शुरुआत हुई हॉलीवुड फ़िल्म ‘इटैलियन जॉब्स’ के हिंदी रीमेक 'प्लेयर्स' से. और अब 26 जनवरी को रिलीज़ हो रही है ऋतिक रोशन, प्रियंका चोपड़ा और संजय दत्त अभिनीत अग्निपथ जो 1990 में आई अमिताभ बच्चन की अग्निपथ का रीमेक है.

साथ ही आने वाले दिनों में आपको ऋषिकेश मुखर्जी की गोलमाल, सई परांजपे की चश्मे बद्दूर, राज एन सिप्पी की अमिताभ बच्चन-हेमा मालिनी अभिनीत सत्ते पे सत्ता, गुलज़ार की क्लासिक संजीव कुमार अभिनीत अंगूर, रमेश सिप्पी की सीता और गीता जैसी फ़िल्मों के रीमेक देखने मिल सकते हैं.

ऐसे में एक सवाल उठता है कि रीमेक बनाना कितना उचित है. क्या हिंदी सिनेमा में नई कहानियों का अकाल पड़ गया है. या फिर पुरानी कहानी को नए तरीके से पेश करने के नाम पर रीमेक के चलन के पक्ष में तर्क दिया जा सकता है. जितने सवाल उनके उतने ही जवाब भी.

नई अग्निपथ के निर्माता करन जौहर अपने बचाव में कहते हैं कि ये पुरानी अग्निपथ का रीमेक नहीं बल्कि उस महान फ़िल्म को उनका सलाम है. साथ ही वो अपने प्रस्तुतिकरण में ढेर सारे बदलाव का दावा भी करते हैं.

अभिनेता ऋतिक रोशन भी कहते हैं कि उन्होंने पुरानी अग्निपथ में अमिताभ बच्चन ने जिस तरीके से मुख्य किरदार विजय दीनानाथ चौहान निभाया था, उसकी नकल करने की कोशिश नहीं की, क्योंकि अमिताभ की नकल करना मूर्खता होती. उन्होंने कहानी की मांग के हिसाब से इसे बिलकुल अलग अंदाज़ में पेश किया है.

रीमेक फ़िल्म: नया सोचना गुनाह!

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रीमेक की बात हो तो ‘शोले’ का ज़िक्र करना ही पड़ेगा. 1975 में रिलीज़ हुई भारतीय सिनेमा इतिहास की इस सबसे मशहूर फ़िल्म का रीमेक बनाया रामगोपाल वर्मा ने 2007 में जिसका नाम था रामगोपाल वर्मा की आग.

पुरानी शोले में जय का किरदार निभाने वाले अमिताभ बच्चन ने इस रीमेक में खलनायक बब्बन सिंह का किरदार निभाया. और इसका जो नतीजा था वो हमेशा के लिए भारतीय सिनेमा के इतिहास का हिस्सा बन गया. जहां शोले की कामयाबी एक इतिहास बन गई वैसे ही रामगोपाल वर्मा की आग की ऐतिहासिक नाकामयाबी भी शायद ही कोई भूलेगा.

ख़ुद अमिताभ बच्चन ने कबूल किया कि शोले का रीमेक बनाना एक बड़ी भूल थी. उसके बाद शायद अमिताभ बच्चन की रीमेक के प्रति राय हमेशा के लिए ही बदल गई. ख़ुद उनकी 1978 में आई सुपरहिट फ़िल्म डॉन का रीमेक 2006 में बना, जिसमें शाहरुख़ ख़ान मुख्य अभिनेता थे.

अमिताभ बच्चन ने कहा कि पुरानी महान क्लासिक फ़िल्मों के साथ छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए और उन्हें उसी रूप में छोड़ देना चाहिए. अमिताभ कहते हैं, “रीमेक सिर्फ निर्माता का ही बल्कि दर्शकों का नज़रिया भी बदलती हैं. एक युग था जब लोगों को देवदास के रूप में के एल सहगल बहुत पसंद आए थे. मेरे लिए देवदास का मतलब हमेशा दिलीप कुमार होंगे. लेकिन आज की पीढ़ी के लिए शायद शाहरुख़ ख़ान ही देवदास हों."

फ़िल्म समीक्षक नम्रता जोशी कहती हैं कि रीमेक में अपना नज़रिया लाना ज़रूरी है. तभी कोई अच्छी और सफल रीमेक बना सकता है.

नई अग्निपथ में विजय का किरदार निभा रहे ऋतिक को जब ये फ़िल्म मिली तो उनकी सोच क्या थी. इस पर ऋतिक ने कहा, “जब पहली बार मेरे पास इस फ़िल्म के लिए ऑफ़र आया तो मैंने कहा कि मैं एक क्लासिक फ़िल्म के रीमेक में भला क्यों काम करूं. लेकिन बाद में मैंने पाया कि इसका प्रस्तुतीकरण तो पुरानी फ़िल्म से बिलकुल अलग है. “

ऋतिक ने ये भी कहा कि अगर वो अमिताभ के किरदार से मुक़ाबला करते तो पहले पाँच मिनट में ही हार जाते. इसलिए उन्होंने बिलकुल अलग अंदाज़ में इसे निभाया है.

लेकिन जानेमाने अभिनेता नसीरुद्दीन शाह रीमेक की ख़िलाफ़त खुले शब्दों में करते हैं. वो कहते हैं, “हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री में जैसे नया सोचना कुछ गुनाह हो. स्क्रिप्ट पर कोई मेहनत करना ही नहीं चाहता. बस यहां-वहां से सीन चुरा लो और उसे अपना कहते फिरो."

नसीर की राय के उलट अभिनेता अनिल कपूर की राय है. उन्हें रीमेक के चलन में कोई ख़ामी नज़र नहीं आती. वो कहते हैं अनिल कपूर कहते हैं, "अगर आप पूरी मेहनत और लगन से कोई रीमेक बना रहे हो तो इस पर भला किसी को क्या आपत्ति हो सकती है."

रीमेक और व्यापार

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रीमेक के सवाल पर अभिनेता और निर्देशक अमोल पालेकर कहते हैं, "मैं सिर्फ़ ये कहना चाहूंगा कि क्या हमारे पास असल विषयों और कहानियों कि इतनी कमी हो गई है कि हमें बार बार पुरानी कहानियों पर जाना पड़ता है. हमारे युवा फ़िल्ममेकर बहुत टेलेंटेड हैं. मुझे नहीं लगता कि रीमेक की इस आंधी की कोई ज़रूरत है."

नम्रता कहती हैं कि फ़िल्म निर्माताओं को रीमेक के बजाय सशक्त भारतीय साहित्य से प्रेरणा लेने के बारे में सोचना चाहिए.

फ़िल्मों के व्यापार पर नज़र रखने वाले फ़िल्म व्यापार विशेषज्ञ तरण आदर्श कहते हैं, "मैं तो रीमेक के इस चलन को अच्छा मानता हूँ. अगर एक अच्छी फ़िल्म का रीमेक किया जाए तो उसमें कोई हर्ज नहीं हैं क्योंकि हर आदमी का अपना नज़रिया होता है."

रीमेक की बहस पर अभिनेता रणधीर कपूर ने बताया कि उनसे कई लोग उनके पिता राज कपूर की फ़िल्म आवारा का रीमेक बनाने का अनुरोध कर चुके हैं. रणधीर के शब्दों में, “मुझे लगता है कि आवारा का रीमेक बनाना बहुत मुश्किल है. वैसा राजकपूर कहां मिलेगा, वैसा पृथ्वीराज कपूर कहां मिलेगा. वैसी नर्गिस जी कहां मिलेंगी. वो शंकर जयकिशन कहां से मिलेंगे, वो शैलेन्द्र, वो हसरत जयपुरी कहां से मिलेगें."

हालांकि शोले के रीमेक ने बॉक्स ऑफ़िस पर मुंह की खाई लेकिन ऐसा भी नहीं है कि रीमेक फ़िल्मों का बॉक्स ऑफ़िस पर बुरा ही हाल हुआ है. फ़िल्म देवदास जितनी भी बार बनी है बॉक्स ऑफ़िस पर विजेता ही रही है. फ़िल्म डॉन की रीमेक भी बॉक्स ऑफ़िस पर सफल रही.

हालांकि नम्रता जोशी कहती हैं कि बॉक्स ऑफ़िस ही रीमेक के लिए एकमात्र पैमाना नहीं हो सकता.

अनिल कपूर कहते हैं, "फ़िल्म बनाने को लेकर हर किसी का एक अलग नज़रिया होता है. कुछ लोगों के लिए फ़िल्म एक मनोरंजन का साधन है. कुछ लोग इसे व्यापार की तरह लेते हैं. तो हर किसी का नज़रिया होता है."

नम्रता कहती हैं,"भले ही रीमेक फ़िल्म सिनेमा तक दर्शकों को खींचने में कामयाब रहे, लेकिन जो एक मूल फ़िल्म का मज़ा है खासकर वो फ़िल्म जो लोगों की ज़ेहन में ऋषिकेश मुखर्जी की गोलमाल की तरह ताज़ा हो तो मन में रीमेक के प्रति सवाल उठना लाज़मी है"

वहीं अपने ज़माने की शीर्ष अभिनेत्रियों में से एक रहीं वहीदा रहमान कहती हैं, "मेरे ख़्याल से जो क्लासिक फ़िल्में होती हैं उनका रीमेक नहीं होना चाहिए. क्योंकि इसके बाद तुलना होने लग जाती है. हो सकता है कि नया संस्करण बेहतर हो, लेकिन हमारे दौर के जो लोग हैं जिनके दिमाग पर उन फ़िल्मों का इतना असर है कि उसको हटाना मुश्किल है. मेरे ख़्याल से कुछ फ़िल्में ब्लैक और व्हाइट में ही अच्छी लगती हैं. मुझे लगता है कि जो ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्मों में ड्रामा है वो शायद रंगीन फ़िल्मों में ना आ पाए."

वहीदा रहमान के मुताबिक़ फ़िल्म 'काग़ज़ के फूल', 'प्यासा' , 'साहिब बीवी और गु़लाम', 'सुजाता' और 'ख़ामोशी' जैसी फ़िल्मों का रीमेक नहीं बनना चाहिए क्योंकि वो शायद ही इन क्लासिक फ़िल्मों के साथ इंसाफ़ कर पाएं.

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