प्रमोशन के लिए कुछ भी करेगा

  • 2 फरवरी 2012

मुंबई के खार स्टेशन पर अभिनेत्री विद्या बालन पहुँचती हैं तो लोग उन्हें देखकर चौंक जाते हैं. क्योंकि विद्या बालन प्रेग्नेंट दिखाई देती हैं. लेकिन थोड़ी देर बाद ही असलियत का पता चल जाता है. दरअसल ये सारा खेल प्रमोशन का है.

विद्या बालन ने अपनी अगली फ़िल्म 'कहानी' में एक गर्भवती महिला का किरदार निभाया है, जो अपने पति की तलाश में है. और यही वजह है कि वो फ़िल्म के प्रमोशन में भी इसी लुक में दिखाई देती हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस तरह का प्रचार ज़रूरी है. अभिनेत्री विद्या बालन अपना बचाव करते हुए कहती हैं, “लोगों के ज़ेहन में ये बात होनी बहुत ज़रूरी है कि हमारी फ़िल्म इस दिन रिलीज़ हो रही है.ये बात आप अगर 100 बार कहेंगे तो शायद 10 लोगों को याद रहे. नौ मार्च को ‘कहानी’ रिलीज़ हो रही है.”

फिर विद्या ने चुटकी लेने के अंदाज़ में कहा कि नौ मार्च को मेरी डिलिवरी है. आइएगा ज़रूर.

फ़िल्म व्यापार विशेषज्ञ कोमल नाहटा कहते हैं, “लोग प्रमोशन के नए नए तरीके ईज़ाद करने के चक्कर में वाकई कुछ ज़्यादा ही कर रहे हैं. उन्हें लगता है कि अगर ये पैंतरा चल गया तो इससे बढ़िया क्या हो सकता है.”

इससे पहले विद्या, अपनी फ़िल्म द डर्टी पिक्चर के प्रमोशन में भी फ़िल्म में निभाए अपने किरदार की ही वेशभूषा में नज़र आईं. और शाहरुख़ ख़ान ने अपनी फ़िल्म रा.वन का जिस धुआंधार तरीके से प्रचार किया वो भला किससे छिपा है.

उन्होंने इस फ़िल्म के लिए 20 ब्रांड के साथ करार किया, साल भर का मैराथन प्रचार किया. क्या इतना प्रचार ज़रूरी था. शाहरुख़ ने कुछ इस अंदाज़ में इसका जवाब दिया था., "ये बहुत बड़ा विवाद है कि प्रचार जितना ज़्यादा हो उतना कम है. फ़िल्म के हिसाब से उसका प्रमोशन होना चाहिए. ऐसी सुपरहीरो वाली फ़िल्म के लिए ऐसा प्रचार ज़रूरी था."

हालांकि रा.वन को ना तो दर्शकों की और ना ही समीक्षकों की वाहवाही मिल पाई. कोमल नाहटा कहते हैं, "आजकल सारा खेल पहले कुछ दिनों का या ये कहे कि दो सप्ताहांत का रह गया है. सबकी कोशिश यही रहती हैं कि पहले तीन दिन में अच्छा खासा कलेक्शन आ जाए. इसी वजह से प्रमोशन पर इतना समय, पैसा और मेहनत खर्च की जाती है."

क्या प्रमोशन की आड़ में फ़िल्मों की गुणवत्ता से समझौता हो रहा है. क्या प्रमोशन किसी बुरी फ़िल्म को हिट बना सकता है. अभिनेता नाना पाटेकर कहते हैं, “पहले दिन भले ही चिल्ला चिल्लाकर लोगों को आप थिएटर बुला लो. उसके बाद तो जो जनता कहेगी वही सही होगा.”

वहीं अभिनेता नसीरुद्दीन शाह कहते हैं, "हमारे पेशे में शामिल हैं अपनी फिल्म की तारीफ़ करना. जैसा कि किसी ने कहा है कि हम अपना ढिंढोरा नहीं पीटेंगे तो कौन पीटेगा. लेकिन प्रमोशन को कुछ ज़्यादा ही तूल दिया जाता है. प्रमोशन एक कमायाब फ़िल्म को और कामयाब बना सकता है. लेकिन एक बुरी फ़िल्म को कामयाब नहीं कर सकता."

कोमल नाहटा कहते हैं, "आजकल अच्छी फ़िल्में बनाने की कोशिश कम की जा रही है और अच्छा प्रमोशन करने की कोशिश ज्यादा की जाती है. क्योंकि अगर आपको तीन दिन का कलेक्शन मिल गया तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता की फ़िल्म कैसी है."

ऐड गुरू प्रहलाद कक्कड़ कहते हैं, "हिदीं फ़िल्म जगत में भेड़चाल होती है. एक ने किया तो हम भी करेंगे. ये नहीं सोचते हैं कि फ़िल्म चलने वाली हैं कि नहीं. भेड़चाल का असर ये होता हैं कि जनता को भी लगने लगता हैं कि ये लोग झूठ बोल रहे हैं और पिक्चर बकवास ही होगी."

वैसे प्रमोशन के इस चलन के लिए अभिनेता मनोज वाजपेई मीडिया को भी दोषी ठहराते हैं.

मनोज कहते हैं, "अत्यधिक प्रचार को मैं ग़लत मानता हूं लेकिन आज के जमाने में इससे निपटने के लिए और अच्छी फ़िल्मों को आगे लाने के लिए हम क्या करें. मीडिया में आजकल कुछ इस तरह का चलन हो गया है कि जिस तरह की तवज्जो बड़ी फ़िल्मों को दी जाती है उतनी तवज्जो छोटी और अच्छी फ़िल्मों को नहीं दी जाती. छोटी फ़िल्म के प्रचार प्रसार के लिए मीडिया भी नहीं आता और इससे मैं बहुत निराश हूं."

जो दिखता है वो बिकता है. पुरानी कहावत है. जिस पर हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री का फ़िलहाल विश्वास डिगता नज़र नहीं आ रहा है.

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