'पुष्पक' के 25 साल

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इस साल बनी फ़्रेंच मूक फ़िल्म 'द आर्टिस्ट' को ऑस्कर पुरस्कारों में 10 श्रेणियों में नामांकित किया गया है. इस फ़िल्म में बैकग्राउंड संगीत के अलावा कोई डायलॉग नहीं हैं.

जहाँ इस साल इस मूक फ़िल्म का जलवा है वहीं भारत में बनी मूक फ़िल्म 'पुष्पक' भी इस साल रिलीज़ के 25 साल पूरे कर रही है.

1987 में आई फ़िल्म पुष्पक में कमल हासन ने काम किया था और इस फ़िल्म को सिंगितम श्रीनिवासा राव ने निर्देशित किया था.

फ़िल्म पुष्पक में भले ही डायलॉग ना रहे हों लेकिन फ़िल्म की शुरुआत में दिए जाने वाले टाइटल को भाषा के हिसाब से बदलकर कुल छह भाषाओं में रिलीज़ किया गया.

आपको ये जानकर हैरानी होगी कि श्रीनिवासा राव को ऐसी फ़िल्म बनाने का विचार नहाते वक्त आया था. फ़िल्म के 25 साल पूरे होने के अवसर पर निर्देशक श्रीनिवासा राव ने इस फ़िल्म से जुडे अनुभव बीबीसी से बांटे.

अलग सोच

ऐसे समय में जब फ़िल्मों में गानों और संवाद का बोलबाला था तो इस तरह की मूक फ़िल्म के बारे में सोचना एकदम अलग सोच थी. और इस सोच को 1987 में राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों में संपूर्ण मनोरंजक फ़िल्म का पुरस्कार भी मिला.

भले ही फ़िल्म पुष्पक संवादरहित थी लेकिन इस फ़िल्म में स्थिति के हिसाब से बैकग्राउंड साउंड का इस्तेमाल बड़ी ही खूबी से किया गया और फ़िल्म का स्क्रीनप्ले ही इस फ़िल्म की सबसे बड़ी विशेषता थी.

निर्देशक सिंगितम श्रीनिवासन राव कहते हैं, " फ़िल्म में मैंने किरदारों को दूर ही रखा था ताकि लोगों को आपस में बात करने की ज़रूरत ही ना पड़े"

चूंकि ये फ़िल्म कई भाषाओं में रिलीज़ होनी थी इसलिए इस फ़िल्म में एक ऐसे अभिनेता की ज़रूरत थी जो सभी दर्शकों का ध्यान खींच सके. लेकिन इस फ़िल्म में कमल हासन को लेने के पीछे यही इकलौती वजह नहीं थी.

निर्देशक श्रीनिवासा और कमल कई और फ़िल्मों में भी साथ काम कर चुके थे और उनकी आपस में ख़ूब जमती थी.

श्रीनावासा राव कहते हैं, " कमल हासन बहुत ही क्रिएटिव हैं लेकिन वो कभी भी मेरे आइडियाज़ में दखलअंदाज़ी नहीं करते थे."

खास बात ये है कि इस फ़िल्म में पहली बार कमल हासन को बिना मूंछों के पेश किया गया था.

इस फ़िल्म की यादें अब भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा हैं, ना सिर्फ प्रयोगात्मक फ़िल्म के लिए बल्कि इस फ़िल्म में दिए गए संदेश की वजह से भी कि कैसे ज़िंदगी में शार्टकट से कमाए गए पैसे से आप खुशी नहीं हासिल कर सकते.

25 साल बाद ये फ़िल्म और ज़्यादा सार्थक हो जाती है जब देश में घोटालों की ख़बरें हो और लोग भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे हों.

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