‘ब्लड मनी’ एक खास वर्ग के लिए

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करीब 12 वर्ष पहले भारतीय फ़िल्म संगीत के पटल पर संगीतकारों की एक नई जोड़ी जीत-प्रीतम ने दस्तक दी थी और अपनी शुरुआती फ़िल्मों ‘तेरे लिए’ और ‘मेरे यार की शादी है’ के सफ़ल और लोकप्रिय संगीत से आने वाले दिनों की कई सम्भावनाओं को जन्म दिया था.

दुर्भाग्यवश कुछ गिनी चुनी फ़िल्मों के बाद जीत और प्रीतम की जोड़ी टूट गई. प्रीतम हिन्दी फ़िल्मों में स्वतन्त्र संगीतकार के रूप में स्थापित हो गए वहीं जीत ने हिंदी फ़िल्मों से दूर बंगाली फ़िल्मों में अपनी जगह बनाई.

‘ब्लड मनी’ संगीतकार के रूप में जीत गांगुली की हिंदी फ़िल्मों में वापसी है. भट्ट कैम्प की ये नई पेशकश एक क्राईम-थ्रिलर के साथ इक प्रेम कहानी है. फ़िल्म का संगीत उसी प्रेम कहानी के इर्द गिर्द रचा गया है.

एलबम में कुल पांच मुख्य ट्रैक्स हैं जिसमें जीत गांगुली के साथ दो अन्य संगीतकारों संगीत-सिद्दार्थ हल्दीपुर और प्रणय रिज़िया की संगीत रचनाएं भी शामिल हैं. भट्ट कैम्प के नियमित, सईद क़ादरी फ़िल्म के गीतकार हैं, एक गीत के बोल कुमार ने लिखे हैं.

भट्ट कैम्प की पिछली कई फ़िल्मों में क्राईम-थ्रिलर ज़ॉनर के बावजूद संगीत की अपनी जगह रहती है और उनकी अधिकतर फ़िल्मों (मर्डर, आवारापन, जन्नत, राज़, मर्डर-2) का संगीत जन-मानस में जगह बनाने में सफ़ल रहा है.

‘ब्लड मनी’ का संगीत भी भट्ट कैम्प के उसी संगीत टैम्प्लेट की एक अलगी कड़ी है. यहां खास बात ये है कि ‘ब्लड मनी’ में जीत गांगुली के तीनों गीत उनके पिछले वर्ष के हिट बंगाली गीतों का ही संवर्धित रूप हैं लेकिन हिंदी संस्करण में उन पर भट्ट कैम्प का रंग खासा चढ़ा हुआ नज़र आता है.

राहत फ़तेह अली के स्वरों में एलबम को एक अच्छी शुरुआत मिली है ‘चाहत.. हक़ है मेरा’ से. राहत इन दिनों हिंदी फ़िल्मों में कम सुनाई दे रहे हैं और यहां अपनी गायकी से निराश नहीं करते. सईद क़ादरी के बोल एक जूनूनी प्रेमी की चाहत को बयां करते हैं. जीत की मूल संगीत रचना बंगाली फ़िल्म 100% लव में काफ़ी लोकप्रिय हुई थी और ‘ब्लड मनी’ में भी राहत की गायकी की वजह से अपने रंग में है.

पाकिस्तान के रॉक सितारे मुस्तफ़ा ज़ाहिद जिन्हें ‘आवारापन’ से हिंदी फ़िल्मों में पहला अवसर भट्ट कैम्प ने ही दिया था, इस एलबम में तीन प्रस्तुतियों के साथ मुख्य स्वर के रूप में मौजूद हैं. वो ‘गुनाह’ में अपनी गायकी से तो प्रभावित करते हैं पर उनका उच्चारण जगह जगह पर अखरता है.

‘गुनाह’ फिर से जीत की एक पुरानी बंगाली धुन का ही हिन्दी रूप है जिसकी शुरुआत बहुत कुछ दीवाना फ़िल्म के ‘कोई ना कोई चाहिए’ और ‘कांटे’ फ़िल्म के ‘जाने क्या होगा रामा रे’ की याद दिलाती है लेकिन सईद क़ादरी के बोल और मुस्तफ़ा के स्वर उसे ‘भट्ट फ़िल्मों’ के संगीत वातावरण में ढालने में सफ़ल हुए हैं. राना मजूमदार के स्वरों में धीमा अनप्लग्ग्ड वर्ज़न भी कुछ दिनों सुना जा सकता है.

‘जो तेरे संग काटी रातें’ मुस्तफ़ा के स्वर में फिर से ‘भट्ट ज़ॉनर’ के ही पुराने गीतों की याद दिलाता है. धुन और वाद्य संयोजन में नवीनता का अभाव है फिर भी गीत में लोकप्रिय होने के तत्व मौजूद हैं और खासकर मुस्तफ़ा की गायकी की वजह से युवाओं को पसंद आ सकता है.

‘तेरी यादों से’ नए संगीतकार प्रणय रिज़िया की प्रस्तुति है. नए नाम के बावजूद एक बासी सी संगीत रचना है और कोई खास असर नहीं छोड़ती. यही हाल संगीत-सिद्दार्थ हल्दीपुर द्वारा रचित ‘आरज़ू’ का है, क्लिंटन सेरेजो के स्वरों में ये रचना भी साधारण सी बन पड़ी है.

कुल मिला कर ‘ब्लड मनी’ का संगीत जीत गांगुली की दो रचनाओं के लिए कुछ दिनों तक सुना जा सकता है. एलबम के सभी गीत पुरुष स्वरों में हैं इसलिए कुछ बार सुनने के बाद बहुत मोनोटोनस से लगते है. एक कन्ज्यूमेबल (य़ूज़ एंड थ्रो) एलबम है जिसे फ़िल्म के रीलीज़ के बाद याद रखे जाने की सम्भावना नहीं है. भट्ट कैम्प की फ़िल्मों और उनके संगीत का एक खास प्रशंसक वर्ग है, उसको ज़रूर पसंद आ सकता है ‘ब्लड मनी’ का संगीत.

रेटिंग के लिहाज़ से ‘ब्लड मनी’ के संगीत को पांच मे से दो (2/5)

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