झुर्रियों में छिपी रेखा नहीं बन सकती 'मेरिल स्ट्रीप'....

  • 4 मार्च 2012
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“जब ऑस्कर विजेता के रूप में मेरा नाम पुकारा गया तो मेरे मन में यही ख़्याल कौंधा कि आज आधे से ज़्यादा अमरीकी यही सोच रहे होंगे....ऐसा नहीं हो सकता, फिर से इसका नाम”...

अगर किसी फ़िल्म कलाकार को लोग 17 बार ऑस्कर के लिए नामांकित होते देख चुके हों तो ऑस्कर पुरस्कार लेते समय उसके मन ऐसा विचार आना स्वभाविक है.

यहाँ बात हो रही है 62 बरस की हॉलीवुड अभिनेत्री मेरिल स्ट्रीप की जिन्हें कुछ दिनों पहले ‘द आयरन लेडी’ के लिए ऑस्कर पुरस्कार मिला है. कुल 17 ऑस्कर नामांकनों में से कई नामांकन तो उन्हें 40 और 50 की उम्र पार करने के बाद मिले हैं.

मन में सवाल ये घिर रहा है कि क्या भारत के पास अपनी मेरिल स्ट्रीप है? यहाँ इस सवाल के मायने ये नहीं है कि भारतीय सिनेमा में दमदार अभिनेत्रियाँ नहीं है. अच्छी अभिनेत्रियों भी हैं और लोग उन्हें सर माथे पर बिठाकर भी रखते हैं.

लेकिन उम्र के एक पड़ाव के बाद भारत में अभिनेत्रियों को टाटा-गुडबाय करने का रिवाज रहा है. पश्चिमी देशों की मेरिल स्ट्रीप, जूडी डेंच, हेलेन मिरन जैसी हीरोइनें 40-50 की उम्र के बाद भी फिल्मों में जमी हुई हैं, मुख्य किरदार निभाती हैं, ऑस्कर जीतती हैं.लेकिन भारतीय सिनेमा अपनी अभिनेत्रियों की ऐसी कद्र नहीं करता.

40 पार तो तड़ीपार?

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वहीदा रहमान, रेखा, शबाना आजमी, शर्मिला टैगोर, हेमा मालिनी, डिंपल कपाड़िया दीप्ती नवल और उनके बाद की पीढ़ी की श्रीदेवी, माधुरी दीक्षित, जूही चावला, तब्बू...ये सब की सब बेहतरीन कलाकार हैं.

लेकिन कितनी फ़िल्में या रोल हैं जिनमें 40 और 50 पार की इन अभिनेत्रियों को अपनी प्रतिभा के अनुरूप रोल मिले हों.

दोष शायद उस मानसिकता का है जो 40 पार के आज के सभी खान सुपरस्टारों को अपने से आधी उम्र की हीरोइनों के साथ रोमांस करते तो देख सकता है पर अधेड़ उम्र की हीरोइन की परिकल्पना उसे स्वीकार नहीं.

तथाकथित ‘मेनस्ट्रीम फिल्मों’ में मुख्य भूमिका तो छोड़िए ‘ऑफ़ बीट’ कही जाने वाली फिल्मों में भी उम्रदराज और सशक्त महिला किरदार गिने चुने ही होते हैं.

कुछ एक मिसालें जरूर मिल जाती हैं.. शबाना आजमी को गॉडमदर, हनीमून ट्रैवल्स जैसी फ़िल्मों में दमदार रोल मिले. बागबान में हेमा मालिनी को उतनी ही अहमियत वाला रोल दिया गया जैसा अमिताभ बच्चन का था.

दक्षिणी फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री शोभना ने 'मित्र माई फ्रेंड' में अपनी पहचान तलाशती माँ और पत्नी का रोल बखूबी निभाया. बंगाली फिल्म बाड़ीवाली मे किरण खेर और शुभो मुहूरत में राखी, जुबैदा में रेखा....पर ये सब किरदार अपवाद हैं.

पश्चिमी देशों में ये भारतीय फिल्मों से तो बेहतर ही है. ब्रिटेन की जूडी डेंच को 64 साल की उम्र में 'शेक्सपीयर इन लव' जैसी फ़िल्म में महारानी एलिज़ाबेथ-1 का अहम रोल मिला जिसके लिए उन्होंने ऑस्कर जीता. नोट्स ऑन ए स्कैंडल, आइरिस जैसी फ़िल्मों में वे पिछले सालों में काम कर चुकी हैं. 77 की उम्र में वे बॉन्ड की अगली फिल्म का भी हिस्सा हैं.

61 की उम्र में 'द क्वीन' में सशक्त किरदार निभाने वाली अभिनेत्री हेलेन मिरन भी ऐसी मिसाल हैं. अगर आपने उनकी फिल्म कलैंडर गर्ल्स देखी है तो आप समझ जाएँगे कि भारत और बाहर की फिल्मों में महिला चित्रण को लेकर कितना फर्क है.

भारत में करीना, प्रियंका जैसी हीरोइनें को जब वी मेट और फैशन में अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिला है. लेकिन ये जब अभी जवान हैं. आज डर्टी पिक्चर की विद्या बालन लोकप्रियता के शिखर पर हैं, लोग उन्हें ‘विद्या बालन खान’ कह रहे हैं.

लेकिन क्या आज से 15-20 साल बाद जब वे शायद ‘खान सुपरस्टारों’ की उम्र की होंगी..क्या तब भी उन्हें ऐसी ही मजबूत भूमिकाएँ मिलेंगी?

जहाँ रानी मुखर्जी और प्रीति जिंटा को लोग अब युवा अभिनेत्री नहीं मानते...जहाँ 60 साल के रजनीकांत 25 साल की दीपिका के साथ फिल्म कर सकते हों..वहाँ चाहकर भी इस पर ज्यादा यकीन नहीं होता कि कभी उम्रदराज अभिनेत्रियों को सम्मानजनक स्थान मिल पाएगा.

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