'लेखकों को बढ़ावा देने वालों की कमी'

  • 19 मार्च 2012
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Image caption पायरेसी से भी परेशान हैं ज़ोया.

'लक बाय चांस' और 'ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा' जैसी फिल्मों की निर्देशक और पटकथा लेखक ज़ोया अख्तर का कहना है कि बॉलीवुड में लेखकों का बढ़ावा देने वालों की कमी है.

ज़ोया कहती हैं, ''मैं किस्मत वाली हूं कि मेरे पास रितेश सिधवानी और फरहान अख्तर जैसे निर्माता हैं. ये अच्छे निर्माता हैं और कहानी पर ध्यान देते हैं. इन्होंने हमेशा मुझे कहा है तुम हमसे पैसे लो और अच्छि कहानी लिखो. इन्होने मुझे मौके दिए हैं. इंडस्ट्री में ज्यादा लोग ऐसा नहीं करते.''

ज़ोया कहती हैं कि वो खुद ऐसे कई लोगों को जानती हैं जिन्हें मौके नहीं मिलते. वो कहती हैं, ''मैं बहुत ऐसे लेखकों से मिलती हूं जो इंडस्ट्री में संघर्ष कर रहे हैं, जिनके निर्माता अच्छी और बुरी कहानी में फर्क नहीं जानते. मुझे लगता है आज बॉलीवुड में ऐसे लोगों की ज़रुरत है जो अच्छे काम को, अच्छे लेखकों को, अच्छी कहानियों को बढ़ावा दे सकें न कि सिर्फ बड़े सितारों के पीछे भागें.''

अच्छे लेखकों को बढ़ावा न मिलना तो ज़ोया को खटकता है ही, साथ ही ज़ोया पायरेसी से भी परेशान हैं.

ज़ोया कहती हैं, ''इंडस्ट्री में पायरेसी एक बहुत बड़ा मुद्दा है. मुझे लगता है पायरेसी से लड़ने के लिए हम सब को एक जुट होने की ज़रुरत है. सरकार को पायरेसी को एक 'नॉन-बेलएबल ऑफैंस' करार कर देना चाहिए. जो लोग पायरेसी करते हैं उन्हें ये पता होना चाहिए कि अगर वो ऐसा करते हैं तो वो बड़ी मुसीबत में पड़ सकते हैं. पायरेसी इंडस्ट्री का 60 प्रतिशत मुनाफा खा जाती है.''

भारतीय सिनेमा को अंतर्राष्ट्रीय पटल पर पहचान दिलाने की बात अक्सर फिल्मकारों से की जाती है. ज़ोया क्या सोचती हैं इस बारे में?

वो कहती हैं, ''अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अगर हम अपनी फिल्मों को ले आते हैं तो ये एक बहुत बड़ी बात होगी और ये हमारी फिल्मों को एक बहुत बड़ी मार्केट भी देगी. फिलहाल तो हम हिंदी भाषी दर्शकों और एनआरआई दर्शकों के लिए ही फिल्में बनाते हैं. या ज्यादा से ज्यादा जर्मनी या गल्फ के कुछ दर्शकों को लुभा पाती हैं हिंदी फिल्में. लेकिन दुनिया का इतना छोटा हिस्सा ही क्यों हिंदी फिल्में देखे. हमारी फिल्में दुनिया भर में जानी चाहिए.''

जोया ये भी कहती हैं कि 'स्लमडॉग मिलिनेयर' जैसी फिल्में भारत में बननी चाहिए. वो कहती हैं, ''स्लमडॉग जैसी फिल्में को कोई भारतीय निर्देशक क्यों नहीं बना सकता. समस्या ये है कि हमें अपनी फिल्मों को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में मार्केट करना नहीं आता.''

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