सिनेमा नहीं झोल है सब- के के मेनन

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हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी, सरकार, गुलाल, लाइफ इन ए मेट्रो और ब्लैक फ्राइडे जैसी फिल्मों में अपने अभिनय का लोहा मनवा चुके अभिनेता के के मेनन आजकल बहुत खफा हैं. वो नाराज़ हैं मौजूदा हिंदी सिनेमा में मार्केटिंग के चलन से.

के के मेनन के मुताबिक तथाकथित बड़े सितारे सिर्फ मार्केटिंग के बल पर अपने औसत दर्जे के सिनेमा को बेच लेते हैं. और ये बड़े दुर्भाग्य की बात है.

मीडिया से बात करते हुए के के मेनन कहते हैं, "बड़े दुख की बात है कि आजकल कहीं सिनेमा नहीं है. लोग सिर्फ पहले 3 दिन के लिए फिल्में बनाते हैं. उसके लिए मार्केटिंग करते हैं. ये भला कहां का सिनेमा है."

के के मेनन ने कहा कि असल सिनेमा वो होता है जिसे सालों बाद लोग याद रखें. हालिया रिलीज़ फिल्मों जैसे 'पान सिंह तोमर' और 'कहानी' जैसे इक्का दुक्का उदाहरणों को छोड़ दिया जाय तो बाकी सब कुछ बेकार है.

के के मेनन कहते हैं, "तथाकथित बड़े सितारे सिनेमा कहां बना रहे हैं. वो तो अपने असल ज़िंदगी के अहंकार को पर्दे पर उतारते हैं. आजकल स्क्रिप्ट राइटर भी कहानी लिखता है तो बेचारे को मार्केटिंग ज़ेहन में रखनी पड़ती है."

के के मेनन कहते हैं कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में सिर्फ पांच फीसदी ही अच्छे कलाकार हैं. मेनन के मुताबिक़, "नसीरुद्दीन शाह, इरफान खान और मनोज वाजपेई जैसे बेहतरीन कलाकारों को छोड़ दें तो बाकी के 95 फीसदी कलाकार झोल हैं."

मेनन ने कहा कि जहां उन्हें सिनेमा नहीं सिर्फ व्यापार नज़र आता है, वैसी फिल्में वो बिलकुल नहीं करते.

उन्होंने हॉलीवुड का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां सिर्फ अच्छे काम को ही तवज्जो दी जाती है और रॉबर्ट डी नीरो, रसेल क्रो जैसे शानदार कलाकार मशहूर भी हो जाते हैं. लेकिन भारत में नसीरुद्दीन शाह जैसे शानदार अभिनेता को वो लोकप्रियता हासिल नहीं है जो कुछेक मार्केटिंग के दम पर बने कलाकारों को हासिल है. ये काफी दुर्भाग्यपूर्ण बात है.

के के मेनन ने अपनी आने वाली फिल्म लाइफ की तो लग गई के बारे में पत्रकारों से रूबरू होते वक्त अपने ये विचार रखे.

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