'रंग - कलर्स ऑफ़ सूफ़िज़्म' - खुसरो, कव्वाली और सरोद के अनूठे रंग

  • 28 मार्च 2012
रंग इमेज कॉपीरइट official website
Image caption अमान अली और अयान अली का एलबम है रंग.

उस्ताद अमजद अली खान ग्वालियर के बंगश संगीत-परिवार की छठी पीढ़ी में परिवार की संगीत विरासत के वाहक रहे हैं.

बाबा अलाउद्दीन खान और अली अकबर खान के बाद, पिछले 50 सालों में सरोद के साज को शायद ही उनसे बेहतर कोई साथ मिला हो.

उस्ताद के दो पुत्र और शिष्य, अमान अली खान और अयान अली खान, सातवीं पीढ़ी में उनकी विराट संगीत विरासत को आगे ले जाने के लिये तैयार हो रहे हैं.

हालांकि संगीत सभाओं में अमान और अयान अपने पिता के साथ कई वर्षों से सहायक के रूप में सरोद बजाते आये हैं और पिछले 10 वर्षों मे उनके कई एलबम आए हैं लेकिन फिर भी अभी तक उनकी पहचान उस्ताद अमजद अली खान से अलग स्थापित नहीं हो पाई है.

'रंग - कलर्स ऑफ़ सूफ़िज़्म', अमान और अयान की नई प्रस्तुति है, एक कॉन्सेप्ट एलबम है. एलबम का आधार अमीर खुसरो की छह कालजयी रचनाएं हैं, जिनको बरसों से कई महान गायक अभी तक अपनी आवाज़ दे चुके हैं.

अमान और अयान ने इस एलबम में उस्ताद अमीर खुसरो के सूफ़ी कलाम को एक नया रंग देने की कोशिश की है.

इमेज कॉपीरइट official website
Image caption रंग - कलर्स ऑफ़ सूफ़िज़्म' अमान और अयान की नई प्रस्तुति है जो एक कॉन्सेप्ट एलबम है.

रॉक, इलेक्ट्रॉनिक, और छ्द्म सूफ़ी के इस दौर में संगीत रसिको के लिये खुसरो की रचनाओं की उचित प्रस्तुति एक चुनौती लगती है और अमान और अयान इस बात के लिए तो बधाई के पात्र हैं कि उन्होने इस जोखिम को लिया है.

'रंग - कलर्स ओफ़ सूफ़िज़्म' एलबम में छह ट्रैक्स हैं जिन्हें मुख्य रूप से स्वर दिया है लोक कव्वाल सुलतान नियाज़ी और उनके समूह ने और सहायक स्वरों में अमान और अयान के स्वर भी कहीं कहीं पर शामिल हैं.

एलबम की सबसे मुख्य विशेषता है स्वरों के साथ सरोद की जुगलबंदी जो इस एलबम को इस जॉनर के अन्य पुराने एलबमों से बिल्कुल अलग रंग देती है.

हज़रत अमीर खुसरो का सुप्रसिद्ध कलाम 'आज रंग है' एलबम को एक खूबसूरत शुरुआत देता है. सुल्तान नियाज़ी के स्वरों को अमान और अयान के सरोद का बहुत अच्छा साथ मिला है. गायकी और सरोद में बेहतरीन तालमेल है और दोनों में से कोई भी एक दूसरे पर हावी नहीं होता.

अगर प्रस्तुति कहीं अखरती है तो वो सिर्फ़ उस हिस्से में जहां अमान और अयान अपने अपने स्वरों से योगदान देते हैं, खास कर अयान के स्वरों के साथ इलेक्ट्रॉनिक सहारा थोड़ा मज़ा खराब करता है. फिर भी एक अच्छी पेशकश है आज रंग है.

अमीर खुसरो की एक और कालजयी रचना है 'ज़ीहाल-ए-मिस्कीं, मकुन तगाफ़ुल', जिसे आज तक कई गायक अपने अपने स्वरों में ग़ज़ल के रूप में प्रस्तुत कर चुके हैं.

रचना की बनावट की सबसे खास बात है कि अमीर खुसरो ने इसे अपने दौर में एक द्विभाषी गज़ल के रूप में ग़ढ़ा था, जिसमें हर शेर का पहला मिसरा (पंक्ति), फ़ारसी (पर्शियन) में था तो दूसरा ठेठ हिन्दोस्तानी में.

अमान और अयान ने यहां इसे एक पारम्परिक कव्वाली के रूप में प्रस्तुत किया है और सरोद को फिर से स्वरों के साथ खूबसूरती से पिरोया है.

मन कुन्तो मौला एक और खूबसूरत प्रस्तुति है. अमान और अयान का सरोद यहां संगीत के कई रंग बिखेरता नज़र आता है, और नियाज़ी के समूह की गायकी के साथ ऐसे समाहित हो जाता है जैसे उसी समूह ही हिस्सा हो.

यहां जो खास बात है कि बरसों से अमूमन कव्वाली में हारमोनियम, तबला, ढोलक, सारंगी जैसे वाद्य ही मुख्यतया नज़र आते हैं, यहां सरोद का प्रयोग निश्चित रूप से सभी प्रस्तुतियों को एक अलग आयम देने में सफल हुआ है.

'मैं निज़ाम से नैना लागा आई रे' हज़रत अमीर खुसरो की एक और मशहूर रचना है.

एक और खूबसूरत रंग है एलबम का, कव्वाली के ठेठ लोक रंग, जो शास्त्रीय से ज्यादा देहाती हैं और जनमानस के ज्यादा नज़दीक हैं, और सुल्तान नियाज़ी का समूह अपना असर छोड़ने में कामयाब रहे हैं.

अमीर खुसरो की ही दो और प्रसिद्ध रचनाएं, एलबम की गुणवत्ता को कायम रखती हैं, 'काहे को ब्याहे बिदेस' और 'बहुत दिन बीते पिया को देखे'. रचनाओं का बेहतरीन चयन भी एलबम की एक विशेषता है.

कुल मिला कर 'रंग - कलर्स ऑफ़ सूफ़िज़्म' हज़रत अमीर खुसरो के कलाम, लोक कव्वाली और सरोद के सुरों के मेल की एक बेहतरीन प्रस्तुति है.

सुल्तान नियाज़ी के कव्वाली समूह के गायन और अमान-अयान के सरोद की अनूठी जुगलबंदी सुनने वाले के मानस पर कई खूबसूरत रंग बिखरते हैं.

अमीर खुसरो की रचनाएं तो 'क्लासिक' हैं ही, पहले से लोकप्रिय हैं और शब्दों की मोहताज़ नहीं हैं, लेकिन उनका चयन एलबम की विशेषता है.

अमान और अयान ने एलबम का रंग शास्त्रीय की बजाय लोक कव्वाली के पास रखा है, जो एलबम को सुनने वालों के ज्यादा बड़े समूह तक पहुंचाने में सहायक रहेगा.

अमान और अयान अली खान का ये 'रंग' निश्चित रूप से इस दौर में अच्छा संगीत सुनने वालों को पसंद आयेगा इसमें संदेह नहीं है और ये भी सम्भावनाएं जगाता है कि बंगश परिवार की विरासत, भविष्य और सरोद, इस दौर में सही हाथों में है.

रेटिंग के लिहाज़ से 'रंग - कलर्स ऑफ़ सूफ़िज़्म' को 3.5/5 (पॉंच मे से साढ़े तीन)

संबंधित समाचार