बॉलीवुड ने मोरक्को के अब्दुल को भारत-भक्त बनाया

Image caption मोरक्को के अब्दुल बॉलीवुड फिल्मों की जानकारी का चलता-फिरता इनसाक्लोपीडिया है

जमा एल फना मराकश का ख़ास आकर्षण है. यहाँ दिन में खामोशी छायी रहती है. लेकिन सूरज ढलते ही यहाँ मेले जैसा समा बन जाता है. शाम होते ही यहाँ ठेले वाले ठेलों पर हर तरह का सामान बेचते हैं. नाचने वाले, मदारी, फेरी वाले और ढ़ाबे वाले- सभी यहाँ इस मेले का हिस्सा बन जाते हैं.

ढ़ाबों में गरमा-गरम कबाब के अलावा मोरक्को की मशहूर डिश ताजीन और खुसखुस मिलती हैं. इन ढाबों के वेटर भी उतने ही मजेदार हैं जितने कि यहाँ के कबाब. लगभग सभी वेटर हिंदी गानों और फिल्मों के फैन हैं और टूटी-फूटी हिंदी बोल लेते हैं.

बॉलीवुड का इनसाक्लोपीडिया

लेकिन एक वेटर इन सबसे निराला है - अब्दुल्लाह जिसे उसके साथी अब्दुल के नाम से बुलाते हैं. ये कोई मामूली वेटर नहीं है. वो बॉलीवुड फिल्मों की जानकारी का चलता-फिरता इनसाक्लोपीडिया है. पिछले 25 सालों में बनने वाली फिल्मों और उनके गानों के अलावा वो मोहम्मद रफ़ी और किशोर कुमार के बारे में सब कुछ जानते हैं.

हर तर्क और हर सिचुएशन के लिए उनके पास एक हिंदी गाना मौजूद है. हिंदी फिल्मों के कारण वो भारत के भक्त भी बन गए हैं. वो कहते हैं, "मेरे भाई, मैं इंडिया कभी नहीं गया, लेकिन इंडिया से बहुत प्यार है. इंडिया वालों से प्यार है. इंडियन सभ्यता मुझे बहुत पसंद है."

Image caption अब्दुल ने अपनी बेटी जैनब को भी बॉलीवुड का दीवाना बना दिया है

वो हिन्दू धर्म से बहुत प्रभावित हैं. और ये जताने के लिए वो एक- दो श्लोक भी बोल जाते हैं. "हिंदी फिल्मों ने मुझे हिन्दू रिलीजन के बारे में काफी बताया. ये भजन सुनिए." वो भजन भी बड़े लगन के साथ गाते हैं.

अब्दुल की बॉलीवुड की दीवानगी काम पर ही ख़त्म नहीं होती. वो घर जाकर भी बॉलीवुड के बारे में सोचते हैं. मैं उनके निमंत्रण पर उनके घर गया. घर बड़ा और काफी साफ़ सुथरा था. अब्दुल ने अपनी बीवी और पांच साल की बेटी जैनब को भी बॉलीवुड का दीवाना बना दिया है. घर में प्रवेश करने पर दीवार पर एक ताजमहल की फोटो लगी है जिसे आप नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते.

घर में आराम से बैठ कर, सर पर एक राजस्थानी पगड़ी लगा कर, वो अपने सेल फ़ोन पर सेव किए हिंदी गाने सुनना शुरू कर देते हैं. और खुद भी साथ-साथ गाते हैं. उनकी आवाज़ में एक अजीब सा दर्द है: वो सेल फोन पर बज रहे गाने " दिल दिया है जान भी देंगे..." गाते हैं और थोड़ी देर में उनकी बेटी और पत्नी भी गाने में शामिल हो जाती हैं. छोटा परिवार सुखी परिवार. बॉलीवुड के लोगों के लिए ये नज़ारा गर्व की बात होगी.

मैंने अब्दुल की बीवी से पूछा -आप बॉलीवुड के इस फैन की दीवानगी से बोर नहीं हो जातीं? वो कहने लगीं: "जब वो काफी गहराई से बॉलीवुड में पिल जाते हैं तो मैं तंग हो जाती हूँ." लेकिन वो अब्दुल से शिकायत नहीं करतीं.

शिकायत कर भी कैसे सकती हैं. अब्दुल ने मुझे बताया कि जब उन्होंने शादी की तो अपनी होने वाली पत्नी से एक वादा लिया कि वो भी बॉलीवुड की दीवानी बन जायेंगी.

उनकी युवा साली नज़दीक में बैठी हैं और मुझे अब्दुल की शादी से पहले के किस्से सुनाती हैं, "शादी से पहले मेरे घर में यह बात फैल चुकी थी कि अब्दुल्लाह हिंदी फिल्मों का दीवाना है. मैं छोटी थी तब. मैं सोचती थी अब्दुल ज़रूर भारतीय होगा." इस बयान पर सभी हंस पड़ते हैं.

'भारत जाने के पैसे नहीं'

Image caption वहां के सभी वेटर हिन्दी फिल्मों के गीत गुनगुनाते हैं

अब्दुल भारत और हिंदी फिल्मों से बेहद प्यार करते हैं लेकिन इसके बावजूद वो भारत कभी नहीं आया. मैंने पूछा आपको भारत जाने का शौक़ नहीं है? क्या आप अपने हीरो से मिलने मुंबई नहीं जाना चाहेंगे? वो कहने लगे- भारत जाना आसान नहीं. वीजा लेने के लिए ज़रूरी है कि बैंक में काफी पैसे हों. लेकिन उसके पास उतने पैसे नहीं हैं.

अब्दुल का भाई, जो राजधानी रबात में रहता है, हिंदी फिल्मों की सीडी और डीवीडी की दूकान चलाता है. अब्दुल ने कहा कि वैसे उसके भाई ने मदद करने की खाहिश का इज़हार किया था, लेकिन उसकी खुद्दारी आड़े आ गयी.

पैंतीस वर्षीय अब्दुल अब एक सेकुलर इंसान हैं. और उन्हें ये बात बहुत पसंद है की भारत में हर मज़हब के लोग मिल-जुल कर रहते हैं. अब्दुल ने मुझसे कहा, "मेरे भाई, बॉलीवुड की फ़िल्में देख कर मुझे ये बहुत अच्छा लगता है कि सिख, मुस्लिम, हिन्दू और सभी मज़हब के लोग एक-दुसरे के साथ मिल-जुल कर रहते हैं"

बॉलीवुड ने अब्दुल की सोच बदल दी है. वो कहते हैं, “पहले वो ज्याद सेक्युलर नहीं थे. हिंदी फिलमों में आपसी भाईचारगी और हर मज़हब की इज्ज़त को देख कर वो सेकुलर हुए हैं.” यह है बॉलीवुड का असर.

लेकिन मराकश के अब्दुल बॉलीवुड के कोई अकेले ऐसे फैन नहीं. हैनोवर, जर्मनी में एक महिला हैं, जो उनको बॉलीवुड की दीवानगी में सख्त मुकाबला दे सकती हैं.

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