संगीत समीक्षा - डिपार्टमेंट

  • 2 मई 2012
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Image caption डिपार्टमेंट 18 मई को रिलीज़ हो रही है.

रामगोपाल वर्मा, पिछले दो दशकों के बॉलीवुड के सबसे अनसुलझे रहस्यों में से एक हैं. नब्बे के उत्तरार्ध में बॉलीवुड के चमकते सितारे निर्माता-निर्देशकों में मुख्य, वर्मा की लौ हर फ़िल्म मे साथ धीमी पड़ती जा रही है.

लेकिन एक चिंगारी कायम है उनके नाम के साथ जो उनकी हर आने वाली फ़िल्म के साथ उम्मीद ले आती है, कि शायद राम गोपाल वर्मा फिर से उस मकाम को हासिल कर पाए.

रामगोपाल वर्मा के सर्वश्रेष्ठ दौर में उनकी फ़िल्मों के स्तर में उसके संगीत का भी हमेशा योगदान रहा है. द्रोही, रंगीला, सत्या, दौड़ और मस्त जैसी फ़िल्मों का संगीत काफ़ी लोकप्रिय रहा और आज भी सुनाई देता है. पिछले दशक के प्रारम्भ में जहां उनकी फ़िल्मों का स्तर गिरने लगा, उनकी फ़िल्मों का संगीत भी अपने स्तर को कायम नहीं रख पाया और एक-आध गीत को छोड़ दें तो पिछले साथ-आठ सालों में वर्मा की किसी भी फ़िल्म का संगीत याद रखने लायक नहीं रहा है.

रामगोपाल वर्मा की अगली फ़िल्म ‘डिपार्टमेंट’ तैयार है और वर्मा फ़िल्म की कास्ट और ‘प्रोमोज़’ से फिर से फ़िल्म के बारे में उत्सुकता जगाने में कुछ हद तक कामयाब रहे हैं.

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Image caption अमिताभ बच्चन रामगोपाल वर्मा के साथ आग, सरकार, सरकार राज और निशब्ध जैसी फिल्में की हैं.

‘डिपार्टमेंट’ के संगीत एलबम में कुल दस ट्रैक्स हैं जिसमें पाँच मुख्य ट्रैक्स हैं और हर गीत अपने जुड़वां रीमिक्स वर्ज़न के साथ मौजूद है. संगीत तीन संगीत निर्देशकों के ज़िम्मे है बप्पा लाहिरी, धरम-संदीप और विक्रम नेगी.

राम गोपाल वर्मा की फ़िल्मों में संगीत में गिरावट के कारण को ‘डिपार्टमेंट’ के संगीत एलबम से समझा जा सकता है. जहां उनके सर्वश्रेष्ठ दौर में उनकी फ़िल्मों के संगीत में सुर और ताल का अच्छा मेल मिलता था, हाल के समय में उनकी फ़िल्मों में संगीत के बजाय ध्वनियां हावी हो गई हैं और संगीत कहीं नहीं मिलता. शब्दों और ध्वनियों के कोलाहल को रामगोपाल वर्मा अगर संगीत समझते हैं तो ये ही सही.

‘डिपार्टमेंट’ के एलबम में भी संगीत गायब है और कोलाहल हावी है और यकीन मानिए, हर गीत को एक बार सुनने के बाद दुबारा सुनने की मैं तो हिम्मत नहीं कर पाया.

‘डन डन धाय़ं धाय़ं’ बहुत से पुराने गीतों की याद दिलाता है और गीत का मूड बहुत कुछ सत्या के ‘कल्लू मामा’ जैसा ही है. परोमा, रवि और संदीप पटिल की गायकी साधारण है. यकीन मानिए ‘साधारण’ भी इस एलबम के लिए बेहतर सम्बोधन ही है.

‘कम्मो’ मिका और सुदेश भोसले के स्वरों में एक और साधारण रचना है. गीत के बोल बचकाने हैं, शायद बोल कुछ बेहतर होते तो ये गीत ठीक-ठाक साबित हो सकता था. गीत में लोकप्रिय लोक-गीतों और फ़िल्मी गीतों का सहारा लिया गया है लेकिन गीत में मस्ती और मज़ेदारी नहीं है.

‘एक दो तीन चार’ फ़िल्म का शीर्षक गीत है, एक और बचकाना सा गीत है, रामगोपाल वर्मा के ध्वनि-प्रेम की मिसाल के अलावा और कुछ खास पेश नहीं करता.

फ़िल्म की थीम पुलिस डिपार्टमेंट पर आधारित है तो पुलिस सम्बंधित ध्वनियों का एलबम में बहुत इस्तमाल किया गया है. ‘बैड बॉयज़’ की शुरुआत पुलिस सायरन से होती है लेकिन गीत शीघ्र ही रितु पाठक के स्वरों मे एक प्रचलित आइटम गीत की शक्ल ले लेता है. एक फ़ीका सा आइटम गीत है ‘बैड बॉयज़’

‘मुम्बई पुलिस’ फ़िल्म का थीम गीत है, संजय दत्त गीत में ‘महाराष्ट्र पुलिस’ डिपार्टमेंट की गाथा का बखान करते हैं. गीत में एक दिलचस्प गीत होने की बहुत गुंजाइश थी. अन्त में जब संजय दत्त ‘जय हिन्दुस्तान, जय महाराष्ट्र’ के कह कर विदा लेते हैं तो बहुत राहत देते हैं. एलबम से यातना मुक्ति की राहत!

अगर आप में हिम्मत है कि ‘डिपार्टमेंट’ के संगीत एलबम को एक से ज्यादा बार सुन सकें तो निश्चित रूप से आपका नाम वीरता पुरस्कारों के लिए नामांकित होना चाहिए!

रेटिंग - 0.5/5 (पांच में से आधा)

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