महिला किरदारों को मजबूत दिखाया जाए: शबाना

शबाना आजमी

60 के दशक में मैं चुप रहूंगी जैसी फिल्में बनती थीं. जिनमें फिल्म की जो मुख्य किरदार थी वो अपने पर हुए हर जुल्म और अत्याचार के बाद भी चुप रहती है.

उस समय की फिल्मों में औरतों का चुप रहना उनकी विशेषता समझी जाती थी. जो गलत बात थी. ये मानना है अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता शबाना आजमी का.

मुंबई में लेखिका भावना सोमैया की एक किताब के विमोचन के मौके पर शबाना ने कहा, "हालांकि बदलते वक्त के साथ महिला पात्र भारतीय फिल्मों में मजबूत हुए हैं, लेकिन अभी इस दिशा में और प्रयास किए जाने की जरूरत है."

शबाना ने कहा, "आज कहानी और द डर्टी पिक्चर जैसी फिल्में बन रही हैं जिनमें मुख्य पात्र महिला है और खासा मजबूत किरदार दिखाया गया है."

शबाना के मुताबिक भारतीय फिल्मों के बिलकुल शुरुआती दौर में नाडिया सरीखी अभिनेत्री ने हंटरवाली जैसी फिल्में कीं जिनमें उनके किरदार काफी मजबूत हुआ करते थे. उसके बाद मदर इंडिया जैसी फिल्में आईं. नूतन और मीना कुमारी की फिल्मों में उनके किरदार के इर्दगिर्द ही फिल्में घूमती थीं, लेकिन कहीं ना कहीं महिला किरदार सशक्त नहीं होते थे. उन पर जुल्म और अत्याचार होते दिखाया जाता था.

शबाना ये भी कहती हैं कि 60 और 70 के दशक में व्यवयासिक सिनेमा ने नहीं बल्कि समानांतर सिनेमा ने अभिनेत्रियों को मजबूत रोल ऑफर किए, और ये रोल इतने बढ़िया हुआ करते थे कि उनके जैसी कई अभिनेत्रियां काफी कम पैसों में भी ये फिल्में करने के लिए तैयार हो जाती थीं.

शबाना मौजूदा दौर से खुश तो हैं लेकिन कहती हैं कि अभिनेत्री केंद्रित फिल्में और ज्यादा बननी चाहिए.

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