राऊडी राठौर: नब्बे के दशक की छाप

  • 23 मई 2012
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प्रसिद्ध नृत्य निर्देशक प्रभु देवा की ’वान्टेड’ ने सलमान खान के साथ दक्षिण भारतीय एक्शन पैक्ड मसाला फ़िल्मों के हिन्दी रीमेक के एक नये युग की शुरुआत की थी, और वान्टेड की सफ़लता के बाद एक्शन-मसाला फ़िल्मों की झड़ी लग गई.

वही प्रभु देवा इसी कड़ी में अपनी नई फ़िल्म के साथ हाज़िर हैं ‘राऊडी राठौर’ . परिवर्तन के तौर पर पर्दे पर धूम-धड़ाके के लिये इस बार नायक के रूप में मौजूद हैं अक्षय कुमार. संगीत साजिद-वाज़िद का है जो इस श्रेणी में वान्टेड और दबंग जैसी सुपरहिट्स के बाद स्थापित हो चुके हैं.

एलबम की पहली प्रस्तुति ’धडंद धंग’ एक सड़क छाप टपोरी नुमा गीत है, जो इस जॉनर की फ़िल्मों के संगीत टैम्प्लेट का ज़रूरी हिस्सा बन चुका है. साजिद-वाजिद ने ज्यादा मेहनत नहीं किए इसे स्थापित फॉर्मूले पर ही आधारित किया है. वाजिद और श्रेया के स्वर भी कुछ खास असर देने में नाकाम रहे हैं. कुल मिला कर एक साधारण सी रचना है ’धंग धड़ंग’.

मीका का गाना

‘चिन्ता ता ता’ मीका के स्वरों में एलबम की अगली प्रस्तुति है. फ़िल्म के मूड और राऊडी राठौर के किरदार के आस पास रचा गीत है जो निश्चित तौर पर एलबम का सबसे लोकप्रिय गीत होने के तत्व रखता है. 70-80 के दशक में अनिल कपूर के टपोरी टैम्प्लेट के गीतों की बहुत याद दिलाता है.

’तेरा इश्क बड़ा तीखा’ एल्बम में एक रोमांटिक गीत है, जावेद अली और श्रेया घोषाल के स्वरों में. साजिद वाजिद की धुन और संयोजन, नब्बे के दशक में आनन्द-मिलिन्द की जोड़ी के किसी गीत की याद दिलाता है. जावेद अली और श्रेया के स्वर ज़रूर गीत को थोड़ा सुनने लायक बनाने में सहयोग देते हैं.

’प्रीतम प्यारे’ एक टपोरी आईटम है ममता शर्मा के स्वरों में. बहुत कुछ ’मुन्नी बदनाम’ की सफलता को दोहराने की कोशिश है लेकिन इस गीत में मुन्नी जैसा दम नहीं है. ममता शर्मा भी अपने आप को दोहराते हुए बोर करती हैं. समीर के शब्द भी निराश करते हैं. मुन्नी के सामने एक फीकी सी रचना है ’प्रीतम प्यारे’

'छम्मक छल्लो'

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श्रेया घोषाल के स्वरों में ’छम्मक छल्लो’ फिर से नब्बे के दशक में आनन्द-मिलिन्द के दौर में ले जाता है. समीर इस जॉनर में इससे बेहतर गीत दे चुके हैं और यहां निराश करते हैं.

श्रेया के स्वर लोरी, ’चांदनिया’, को मधुरता प्रदान करते हैं लेकिन साजिद-वाजिद लोरी के भाव गीत में जगाने में असफ़ल रहे हैं और बहुत कृत्रिम सी रचना लगती है लोरी.

’राऊडी मिक्स’ एक थीम गीत के रूप में फिर से एक फीका सा प्रयास है. अक्षय कुमार के संवाद और वन-लाइनर्स मज़ेदार नहीं हैं और बासी से लगते हैं.

कुल मिला कर ’राऊडी राठौर’ के संगीत पर नब्बे के दशक का संगीत हावी है और साजिद-वाजिद ने आनन्द-मिलिन्द के उस दौर के संगीत को आधार रख कर संगीत रचने की कोशिश की है. नवीनता के अभाव में साजिद-वाजिद बुरी तरह से निराश करते हैं. समीर भी गीतकार के तौर पर निराश करते हैं. फ़िल्म के कुछ गीत लोकप्रिय हो सकते हैं, पर फ़िल्म में बहुत योगदान नहीं करते. फ़िल्म अगर सफ़ल होती है तो भी बहुत ज्यादा दिनो तक ’राऊडी राठौर’ का संगीत खींच नहीं पायेगा.

रेटिंग के लिहाज़ से ’राऊडी राठौर’ के संगीत को 2/5 (पाँच मे से दो)

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