उदास है मेहदी हसन का भारतीय गाँव

मेहदी हसन के दोस्त
Image caption मेहदी के दोस्त नारायण सिंह भरे गले से पुरानी यादों में खो जाते हैं.

ख्वाहिश तो बहुत थी, मगर वो फिर से छोड़ के जाने लिए भी नहीं आए. वो रस्म-ओ-रह ऐ दुनिया निभाने के लिए भी नहीं आए.

शहंशाह-ए-ग़ज़ल मेहदी हसन के निधन की खबर राजस्थान के झुंझुनू जिले में उनके पुश्तैनी गांव लुना में बहुत दुख के साथ सुनी गई.

मरू बालू के टीलों में बचपन में साथ साथ खेले उम्रदराज नारायण सिंह ने अपने दोस्त मेहदी हसन की मौत के बारे में सुना तो उनका गला भर आया. वो कहते हैं, “मेहदी मुझे कहते कहते चला गया कि मैं मिलने आ रहा हूं. अब मेरी आँखों में आंसू हैं.”

शेखावाटी इलाके का लुना गांव अपने इस लाड़ले के आगमन का अरसे तक इंतजार करता रहा. अब उनके जाने की खबर आई तो गांव में शोक छा गया.

मेहदी हसन के दोस्त नारायण सिंह ने कुछ शायराना अंदाज़ में याद किया, “वो आता मिल के जाता, चला गया मिलने वाला. कयामत तक उसकी ग़ज़ल रहेगी, चला गया गाने वाला.”

लुना के पूर्व सरपंच कुरड़ाराम कहते हैं कि हसन उनके गांव की शान थी. “हम सब की दुआ थी वो दुरुस्त हो और एक बार अपने गांव आए. लेकिन क्या करे, खुदा को कुछ और ही मंजूर था.”

भारत और यादें

पिछले माह ही राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भारत के विदेश मंत्री एसएम कृष्णा से फोन पर बात की और हसन के रिश्तेदारों के कुछ और वीजा मंजूर करने का आग्रह किया था, क्योंकि उनके बेटे मोहम्मद आरिफ ने गहलोत से ये आग्रह किया था.

दरसल राजस्थान सरकार ने उनके परिवार से सम्पर्क कर हसन को इलाज के लिए भारत लाने और पूरा खर्चा उठाने का प्रस्ताव दिया था.

Image caption लुना में ही मेहदी हसन के पिता की कब्र है.

भारत ने पिछले महीने ही हसन, उनके बेटे, बहू और एक चिकित्सा सहायक के लिए हाथों हाथ वीजा मंजूर कर दिया था. मगर उनकी सांसों ने इतना साथ भी नहीं दिया कि वो भारत आ पाते.

नारायण सिंह को ये याद नहीं कि वो आखिरी बार मेहदी हसन से कब मिले थे.

1980 में मेहदी हसन लुना आए और लोगों से मिले थे. उन्होंने सुख-दुख बांटा और बचपन की यादों में खोए रहे. वो तब अपने पुरखों की कब्र तक गए, दुआ की और उस पर कुछ निर्माण कार्य भी करवाया.

उस वक्त लुना में मेहदी हसन के साथ तीन दिन बिताने वाले इजाजुल नबी हसन बताते हैं कि वो कभी सामने वाले को अहसास ही नहीं होने देते थे कि इतने बड़े कलाकार हैं. वो सब लोगों से प्यार से गले मिले और अपनापन दिखाते थे.

मेहदी हसन का पूरा परिवार संगीत और गायकी से जुड़ा रहा है. वो इसी रेगिस्तान में लुना गांव में 1927 में पैदा हुए और विभाजन के समय पाकिस्तान चले गए. मगर अपनी जड़ों को कभी नहीं भूले.

ना केवल उनकी हसरत थी कि वो अपने पुश्तैनी गांव में दुनिया-जहान से बेखबर एक बच्चे 'मेहदी' की तरह गली गली घूमे, बल्कि पूरे गांव की भी ये ही मुराद थी. अब कौन बताएगा जुदाई का सबब, मेहदी हसन तो नहीं रहे.

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