मैं ऑल इज़ वेल को नहीं मानता: दिबाकर बनर्जी

  • 13 जून 2012
दिबाकर बनर्जी
Image caption दिबाकर बनर्जी ने बीबीसी हिंदी के पाठकों से फेसबुक पर लाइव चैट की.

पिछले हफ्ते रिलीज हुई बहुचर्चित फिल्म शंघाई के निर्देशक दिबाकर बनर्जी बीबीसी हिंदी के पाठकों के साथ सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक के जरिए रूबरू हुए और उनके प्रश्नों के उत्तर दिए.

बीबीसी हिंदी के फेसबुक पेज पर पाठकों ने दिबाकर से लाइव चैट के जरिए ढेर सारे सवाल किए. कुछ सवालों में बधाई संदेश थे तो कुछ तल्ख सवाल भी थे. लेकिन दिबाकर ने सभी सवालों के दिल खोल कर जवाब दिए.

एक पाठक ने जानना चाहा कि फिल्म शंघाई का अंत इतना नकारात्मक क्यों है. कहानी को क्या एक बेहतर मोड़ पर खत्म नहीं किया जा सकता था. इस पर दिबाकर ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि फिल्म नकारात्मक है. अच्छाई और बुराई साथ-साथ चलते हैं. मैं तो ऑल इज वेल को नहीं मानता. ये आंखों पर पट्टी बांधने जैसा होगा. आपको वास्तविकता फिल्मों में दिखानी ही चाहिए."

एक पाठक ने पूछा कि फिल्म में समस्याएं क्या है ये तो दिखाया गया है, लेकिन करना क्या चाहिए ये नहीं बताया गया. इस पर दिबाकर ने कहा, "जो फिल्मकार दर्शकों को बताने की कोशिश करे कि उन्हें क्या करना चाहिए क्या नहीं, समझ लीजिए कि वो दर्शकों को बेवकूफ समझता है."

एक पाठक ने जानना चाहा कि फिल्म की प्रेरणा उन्हें कहां से मिली. इस पर दिबाकर ने कहा, "मैं मुंबई में रहता हूं. एक दिन मुझे पता चला कि जहां मेरा सिक्योरिटी गार्ड रहता था, वहां स्कूल का प्लेग्राऊंड बन गया. उसका घर उजाड़ दिया गया. तो यही कहानी थी. यहीं से प्रेरणा आई."

एक पाठक ने सवाल किया कि फिल्म में इंपोर्टेड कमरिया जैसे आइटम सॉन्ग की क्या जरूरत थी, क्योंकि वो फिल्म में ठूंसा गया सा लगता है. इस पर दिबाकर का जवाब था, "इंपोर्टेड कमरिया वाला गाना चलता है उसी समय पुलिस चौक पर डॉक्टर अहमदी एक भीड़ का सामना कर रहा है. तो दोनों सीन साथ चल सकता है. अगर ऐसा नहीं होता तो डॉक्टर अहमदी के साथ ख़तरे का अंदाज़ा आपको नहीं होता. ये कॉन्ट्रास्ट आपको नहीं मिलता कि एक ओर गाना चल रहा है दूसरी ओर ये हो रहा है. इसलिए ये ठूँसा हुआ गाना नहीं है."

एक पाठक ने प्रश्न किया कि शंघाई को समीक्षकों की तो वाहवाही मिली है, लेकिन फिल्म व्यापार विशेषज्ञों के मुताबिक फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा कमाल नहीं कर पा रही है. इस पर दिबाकर ने कहा, "ऐसा नहीं है. फिल्म ने शुरुआत जरूर धीमी की लेकिन उसके बाद इसने जोर पकड़ा और मंगलवार तक ये अपनी पूरी लागत वसूल कर चुकी है. इसलिए जिन लोगों ने ये फिल्म देख ली है वो इस बात का कतई अफसोस ना करें कि उन्होंने एक फ्लॉप फिल्म देखी है. फिल्म अच्छी चल रही है और इसने सोमवार को शुक्रवार के मुकाबले ज्यादा व्यापार किया."

एक पाठक ने सवाल किया कि एक बंगाली होते हुए भी दिबाकर अपनी फिल्मों में इतनी अच्छी तरह से उत्तर भारतीय कल्चर कैसे दिखा पाते हैं. इस पर दिबाकर ने कहा, "ये काफ़ी आसान है क्योंकि मैं एक फ़र्जी बंगाली हूँ. मैं दिल्ली के करोल बाग इलाक़े का पला बढ़ा हूँ. मेरे दादा दिल्ली आए थे 1950 में तब से मैं यहीं रहा हूँ. मैं हिंदी मीडियम स्कूल में पढ़ा हूँ लेकिन अंग्रेज़ी सीख पाया. आजकल ऐसा कम होता है. जहाँ मै रहता था वहाँ पंजाबी कल्चर था. इसके अलावा मैं थोडी़ बहुत जाट भाषा भी बोल लेता हूँ."

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