किस बात से डरते हैं गुलज़ार?

गुलज़ार इमेज कॉपीरइट bbc
Image caption 'मेरा कुछ सामान' 20 से 23 जून तक दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है.

यूं तो गुलज़ार को किसी से भी डरने की या किसी भी बात की फ़िक्र करने की ज़रुरत नहीं हैं लेकिन एक लेखक और कवी होने के नाते उन्हें इस बात का हमेशा डर रहता है कि वो जो लिख रहे हैं वो पढ़ने वालों को समझ आएगा या नहीं.

'मोरा गोरा अंग...' से लेकर 'बीड़ी जलाई ले...' तक लिखने वाले गुलज़ार ऐसी बात क्यों कह रहे हैं भला?

गुलज़ार कहते हैं, ''मैं जो लिखता मुझे तो उस पर शंका रहती है. हां, सच हमेशा रहती है और रचनात्मक कार्यों में ये शंका तो हमेशा ही होती है कि आप जो कहना चाहते हैं वो वाकई उभर के आएगा, वो लोगों तक पहुंचेगा या नहीं पहुंचेगा. ये फ़िक्र तो हमेशा के लिए है.''

गुलज़ार इन दिनों दिल्ली में हैं क्योंकि उनकी लिखी कहानियों पर आधारित नाटक यहां दिखाई जा रहे हैं. ''मेरा कुछ सामान'' नाम के इस उत्सव में 'ख़राशें', 'सुनते हो' और 'अरे ओ हेनरी' दिखाए जाएंगे.

'अरे ओ हेनरी' अमरिकी लेखक ओ हेनरी की चार कहानियों पर आधारित नाटक है जिसको गुलज़ार ने भारतीय परिवेश के अनुसार रूपांतरित किया है.

दिल्ली में गुलज़ार प्रेस से मुख़ातिब हुए और बीबीसी ने उनसे पूछा कि जब उनकी कहानियों को एक नाटक में बदला जाता है तो कितना फर्क आ जाता है?

इस सवाल का जवाब देते हुए गुलज़ार कहते हैं, ''कहानी को बयां करना और उसी कहानी को मंच पर पेश होने वाले एक नाटक के लिए बदलना, इसमें ज़ाहिर है कुछ पंक्तियां बदल जाती हैं, कुछ संवाद बदल जाते हैं और कुछ भाव भी बदल जाते हैं. और वो बदलने भी पड़ते हैं क्योंकि नाटक एक अलग माध्यम है. एक कहानी में जो बाते जुमलों में बयान हो जाती हैं, नाटक में वो सब चीज़ें दिखानी पड़ती हैं.''

अपनी बात को आगे कहते हुए गुलज़ार ने कहा, ''मैं अगर लिख भी दूं कि हां उसे बड़ा सख्त ज़ुकाम था तो मंच पर आकर उसे छिकना तो पड़ेगा, बगैर छीके तो ज़ुकाम पता नहीं चलेगा. और छीकते वक्त वो है भगवन भी कह सकता है, ओ गोड़ भी कह सकता है, तो नाटक में जुमले भी बदलते रहते हैं. हां ये ज़रूर है कि कहानी के किरदार नहीं बदलते. और ये जो मीडियम की तबदीली है मैं सलीम आरिफ से सीख रहा हूं. मैं तो सलीम जी का शिष्य हो गया हूं.''

सलीम आरिफ वही हैं जो गुलज़ार की कहानियों को नाटक में बदलते हैं और जो . ''मेरा कुछ सामान'' का आयोजन करवा रहे हैं.

गुलज़ार कहते जब वो अपनी किसी भी कहानी को नाटक के लिए बदलते हैं तो वो सलीम के साथ बैठ कर उनकी सलाह लेते हैं क्योंकि रंगमंच उनका माध्यम नहीं है.

गुलज़ार कहते हैं, ''जिसका जो मीडियम हो उसकी शागिर्दी में जाना और उसे उस्ताद कह लेना सही बात है. मैं तो अफसाना लिखता हूं, शायरी करता हूं, मुझे तो ये भी यकीन नहीं था नज़्में और कहानी एक साथ जा सकती है. मुझे लगता था ये कैसे हो सकता है कि ड्रामा किया जाए और उसके बीच में नज़्में सुनाई जाएं. लेकिन मुझे सलीम साहब की मुस्कराहट याद है. उन्होंने मुझसे कहा था कि एक बार ज़रा देख तो लीजिए कि मैं क्या करता हूं. और जब मैंने देखा तो मुझे देख कर हैरत हुई थी.''

सलीम आरिफ की तारीफ करते हुए गुलज़ार कहते हैं, ''मेरा मानना है कि सलीम ने नाटक को एक नई शक्ल दी है. अफसानों और पारम्परिक तरीके से जो नाटक किए जाते थे, जहां कई तरह के प्रोप्स और साउंड इस्तेमाल होते थे इन सब के बीच में सलीम ने एक शक्ल बनाई है जो बहुत साहित्यिक है. नाटक लिखना तो साहित्य का हिस्सा है लेकिन ये एक नया तरीका है नाटक लिखने का जो सलीम साहब से आया है.''

गुलज़ार कहते हैं, ''मुझे ये अंदाज़ अच्छा लग रहा है. और मैं सीख यही रहा हूँ कि मैं इस तरह से अपनी कहानियां लिख सकूं कि सलीम साहब को उन्हें नाटक में बदलने में ज़्यादा तकलीफ न हो.''

गुलज़ार और सलीम आरिफ का साथ बड़ा पुराना है, टीवी धारावाहिक 'ग़ालिब' से इस साथ की शुरूआत हुई थी.

सलीम के बारे में बात करते हुए गुलज़ार कहते हैं, ''सलीम मेरे काम से वाक़िफ़ थे. 'ग़ालिब' से हमने साथ चलना शुरू किया और फिर हमने 'इजाज़त' की, 'हु तु तू' और फिर 'माचिस' की. और तब से अब तक हम साथ हैं.''

संबंधित समाचार