गैंग्स ऑफ़ वासेपुरः समीक्षा

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Image caption गैंग्स ऑफ़ वासिपुर भारत की आज़ादी के समय से 80 के दशक तक के माफ़िया की कहानी है

अनुराग कश्यप शायद इस युग के गिने-चुने सबसे होनहार निर्देशकों में से माने जाएँगे.

बतौर निर्देशक कश्यप एक अर्से के बाद फ़िल्म लेकर आए हैं और यकीनन ना सिर्फ़ उनके प्रशंसक बल्कि वो भी जो उनके पिछले काम से (गुलाल, देव डी, ब्लैक फ़्राइडे) से वाकिफ़ नहीं हैं, इस फ़िल्म के कथानक, निर्देशन, पटकथा और अभिनय से मुग्ध होकर ही जाएँगे.

यदि रामगोपाल वर्मा मुंबई के डॉन और उनकी पुलिस तथा राजनेताओं की साँठ-गाँठ से भली-भांति परिचित हैं और उसे बखूबी दर्शाते भी हैं अपनी फ़िल्मों में तो कश्यप की कहानी आज़ादी से माफ़िया डॉन के ऐतिहासिक संघर्ष से लेकर 80 के दशक को दर्शाती है.

फ़िल्म एक किस्म से अनैतिकता और लूट-चोर बाज़ारी - जो आगे जाकर एक संगठित माफ़िया का रूप बन जाती है - की छवि है.

कश्यप कहीं पर भी फ़िल्म को बिखरने नहीं देते हैं और 160 मिनट की फ़िल्म में – जहाँ अनगिनत पत्र अपनी छाप छोड़कर जाते हैं – कहीं भी दर्शकों को लुभाने के लिए किसी फ़ॉर्मूले की ओर नहीं भागते हैं.

कहानी

फ़िल्म बिहार में धनबाद के पास के छोटे से कस्बे वासेपुर पर दर्शाई गई है लेकिन ये कहानी कहीं की भी हो सकती है.

हालाँकि कश्यप आरंभ में ही हमें बता देते हैं कि इस फ़िल्म की शूटिंग बिहार में तो हुई है पर वासेपुर में नहीं.

कहानी दो परिवारों के बीच की है जहाँ दुश्मनी एक नहीं बल्कि तीन पुश्तों तक चलती रहती है.

फ़िल्म की कहानी शुरू होती है शाहिद ख़ान से जो ब्रिटिश ट्रेन लूटता है एक डाकू के रूप में.

शाहिद रामाधीर सिंह की खदान में एक मज़दूर बन जाता है जिससे पीढ़ियों से चली आ रही दुश्मनी को रोक सके.

कुछ वर्ष के बाद अगली पीढ़ी का बेटा सरदार ख़ान अपने पिता के सम्मान को वापस लाने की कोशिश में वासेपुर का सबसे ख़तरनाक आदमी बन जाता है.

अंदाज़

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Image caption मनोज वाजपेयी के करियर की बेमिसाल फ़िल्म

फ़िल्म उन दर्शकों के लिए है जो आलोचनात्मक और कटु सत्य की तलाश में फ़िल्म देखने जाते हैं. ऐसे दर्शक भी जो गालियों या ख़ून-ख़राबे से परहेज़ करते हैं और कमज़ोर दिल भी रहते हैं, इस फ़िल्म के परेशान हो सकते हैं. उन्हें कुछ दृश्यों में आपत्ति भी हो सकती है.

पर जहाँ एक कस्बे या देहात में कृत्रिमता तथा परिष्करण का अभाव होता है, केवल इसी तरह की भाषा का प्रयोग ही तो करते हैं आपसी बातचीत में.

तो ऐसे दर्शक जो टेलीविज़न सीरियल की बनावटी भाषा से अभी भी नहीं ऊबे हैं, उन्हें शायद ये फ़िल्म बहुत निंदात्मक नज़र आएगी.

फ़िल्म पूरी तरह से अनुराग की छाप लिए हुए है – जहाँ एक ओर बेछूट कहानी है, अनुचित और आपराधिक गतिविधियों के चलन का आईना दिखाया गया है, वहाँ दूसरी ओर एक से एक सशक्त अभिनय से तकरीबन सारे पात्र आपका दिल जीत लेंगे.

कलाकार

Image caption कान फिल्म समारोह में गैंग्स ऑफ़ वासेपुर की टीम के साथ अनुराग कश्यप

मनोज बाजपेयी की ये अपने करियर की बेमिसाल फ़िल्म साबित होगी.

वहीं ऋचा चड्ढा, पंकज त्रिपाठी, पीयूष मिश्रा, नवाज़ुद्दीन और तिग्मांशू धूलिया एक-दूसरे पर हावी होते हुए नज़र आएँगे.

फ़िल्म की स्क्रिप्ट अख़िलेश जायसवाल, सचिन लाडिया, सैयद ज़ीशान क़ादरी और अनुराग कश्यप ने लिखी है और एक तरह से देखा जाये तो असली हीरो कहलाने के हक़दार ये सभी हैं.

पर इन सबके साथ इस फ़िल्म की संगीत निर्देशिका स्नेहा खानवलकर अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल हो जाएँगी.

14 गानों में एक भी ऐसा नहीं है जो आपको गुनगुनाने पर मजबूर नहीं कर दे.

ख़ास बात संगीत की ये भी है कि सारे गीत – और सारे वाद्य यंत्र भी – बिहार से जुड़े हुए हैं.

संगीत एक छाप छोड़ेगा क्योंकि लोक संगीत पर आधारित ये गाने सचमुच ‘हट के’ हैं.

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