प्यासे ही रह गए गुरु दत्त !

Image caption गुरुदत्त, अपनी छोटी बहन ललिता लाजमी के साथ

भारतीय सिनेमा को प्यासा और काग़ज़ के फूल जैसी क्लासिक देने वाले महान फिल्मकार गुरुदत्त के बेटे अरुण दत्त के मुताबिक उनके पिताजी के साथ वही हुआ जो फिल्म प्यासा के किरदार विजय के साथ हुआ था. नौ जुलाई को गुरुदत्त की 87 वीं जयंती है.

विश्वप्रसिद्ध टाइम मैगज़ीन की सर्वकालीन 100 सर्वश्रेष्ठ फिल्मों की सूची में गुरुदत्त की प्यासा और काग़ज़ के फूल भी शामिल हैं पर गुरुदत्त के बेटे अरुण दत्त के मुताबिक "लोग उनकी फिल्मों को पसंद करते थे, उनकी फिल्में पैसा भी कमाती थीं पर फिल्म समीक्षकों को वो कभी पसंद नहीं आए. वो तो 80 के दशक में जब यूरोप में उनकी फिल्मों को दिखाया गया और वहां उनको लोकप्रियता मिली, तब जाकर लोगों का नज़रिया बदला."

गुरुदत्त की छोटी बहन ललिता लाजमी ने बीबीसी से खास बात करते हुए बताया कि वो बचपन में अपने भैया की लाडली थीं. ललिता ने गुरुदत्त और उनकी पत्नी गीता दत्त की पहली मुलाकात के बारे में भी बताया जो देव आनंद के घर पर हुई थी जहां गीता दत्त ने एक गाना गाया था और उसी गाने को सुनकर गुरु दत्त ने अपनी फिल्म बाज़ी के लिए गीता को गाना गाने का ऑफर दिया था.

ललिता बताती हैं "उस ज़माने में भाभी अपने पिताजी को लेकर हमारे घर आई थी. उसके बाद गीता कई बार हमारे घर आईं पर उनके माता पिता को गीता का गुरु दत्त साब से मिलना पसंद नहीं था इसलिए वो भैया से चुपके-चुपके मिलती थीं और घर पर कहकर आती थीं कि वो लल्ली यानि मुझसे मिलने आ रही हैं."

गुरु दत्त को जानने वाले कहते आए हैं कि किस तरह वो जिस काम में हाथ डालते थे उसमें डूब जाते थे. उदाहरण के तौर पर उनके बेटे अरुण ने बताया कि किस तरह एक वक्त गुरु दत्त को स्कूटर चलाने का शौक चढ़ा. अरुण कहते हैं "पापा ने कहा मैं स्कूटर चलाकर ऑफिस जाऊंगा. वो स्कूटर में बैठे, पीछे उनकी गाड़ी आ रही थी. बीच रास्ते में एक सिग्नल आया जहां लोगों ने उन्हें पहचान लिया और जिस तरह से भीड़ ने उन्हें घेरा उसके बाद से उन्होंने कभी स्कूटर को हाथ नहीं लगाया".

शायद इसी जुनून का नतीजा था कि गुरु दत्त ने अपने पीछे प्यासा और काग़ज़ के फूल जैसी फिल्में छोड़ीं.

इन दोनों ही फिल्मों की अभिनेत्री वहीदा रहमान, जिन्हें गुरु दत्त ने ही हिंदी सिनेमा में ब्रेक दिया था, बीबीसी से बात करते हुए कहती हैं "मुझे समझ नहीं थी कि ये कितने अच्छे निर्देशक हैं. मैं तो कहूंगी कि शायद उन्हें खुद इस बात का इल्म नहीं था कि वो कितनी बढ़िया फिल्में बना रहे हैं. शायद इंडस्ट्री को भी नहीं पता था कि उनकी फिल्में आगे जाकर क्लासिक बन जाएंगी."

कहते हैं आदमी की कद्र अक्सर उसके जाने के बाद की जाती है और गुरुदत्त के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. और शायद इसलिए साहिर ने लिखा भी है कि ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है.

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