आखिर क्यों हुआ राजेश खन्ना का पतन?

  • 19 जुलाई 2012
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Image caption 18 जुलाई को राजेश खन्ना का निधन हो गया

राजेश खन्ना के चोटी पर पहुंचने का सफर जितना चमत्कारिक था, उतना ही आश्चर्यजनक उनका पतन था.

60 के दशक के उत्तरार्ध और 70 के दशक के पूर्वार्ध का सुपरस्टार अचानक अपनी चमक खोने लगा.

जिस सितारे ने लगातार 15 हिट फिल्में दीं, जिसकी एक झलक पाने के लिए हज़ारों लोग लाइन लगाकर खड़े रहते थे, जिसकी कार पर युवा लड़कियों के लिपस्टिक के निशान हुआ करते थे और जो उसे खून से लिखी चिट्ठियां भेजा करती थी वो इंसान अचानक कामयाबी के शिखर से क्यों लुढ़कने लगा. इस पर बीबीसी ने उनके कई साथी कलाकारों और फिल्म विशेषज्ञों की राय जाननी चाही.

नहीं संभाल पाए स्टारडम

राजेश खन्ना की शुरुआती फिल्मों से एक 'खामोशी' में उनके साथ काम कर चुकी चर्चित अभिनेत्री वहीदा रहमान कहती हैं, "देखिए जब कोई पहाड़ की चोटी पर पहुंचता है तो उसे एक ना एक दिन नीचे तो आना ही पड़ता है. ये बहुत स्वाभाविक सी बात है."

जब बीबीसी ने उनसे पूछा कि लेकिन राजेश खन्ना का इतनी तेजी से पतन स्वाभाविक तो नहीं था, उसकी भला क्या वजह थी, तो वहीदा बोलीं, "दरअसल वो अपनी स्टारडम संभाल नहीं पाए. जैसे जैसे इंसान की उम्र बढ़ती है उसे अपने आपको बदलते रहना चाहिए. स्वीकार कर लेना चाहिए कि अब आपमें वो बात नहीं रही. और फिर उसी हिसाब से अगर वो फिल्मों का चुनाव करते तो शायद उनकी कामयाबी की पारी और लंबी चलती. लेकिन वो ऐसा कर नहीं पाए. वो बहुत ज्यादा अपनी कामयाबी के दिनों में ही खोए रहे."

काका राजेश खन्ना...अब सिर्फ यादों में

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ऋषिकेश मुखर्जी की सुपरहिट फिल्म 'नमक हराम' सहित राजेश खन्ना के साथ नौ फिल्में कर चुके अभिनेता रजा मुराद भी कुछ ऐसी ही राय रखते हैं.

रजा के मुताबिक, "राजेश खन्ना बेहद दिलदार आदमी थे. उनके घर पर देर रात तक महफिलें जमा करती थीं और इस वजह से वो अपनी फिल्मों के सेट पर देर से पहुंचने लगे. इस वजह से उनके निर्माता उनसे परेशान रहने लगे. फिर रात को देर देर तक जागने और अपनी अनुशासनहीन जीवन शैली की वजह से उनके खूबसूरत चेहरे पर भी फर्क पड़ने लगा. कभी टमाटर की तरह सुर्ख लाल रहने वाला उनका चेहरा निस्तेज सा लगने लगा. और इसके बाद उनकी नाकामयाबी का दौर शुरू हो गया."

रजा मुराद कहते हैं कि जब हाल ही में उन्होंने राजेश खन्ना को एक टीवी के विज्ञापन में देखा तो उन्हें बेहद दुख हुआ कि उनका ये बेहद खूबसूरत साथी अब कैसा कमजोर दिखने लगा है.

पुरानी कामयाबी में ही खोए रहे

फिल्म समीक्षक नम्रता जोशी राजेश खन्ना के पतन की वजह ये मानती हैं कि वो बदलते वक्त के साथ अपने आपको ढाल नहीं पाए.

नम्रता कहती हैं, "किसी भी स्टार की कामयाबी का एक दौर होता है. फिर वक्त बदलता है. राजेश खन्ना अपने पुराने दिनों में ही खोए रहते. 70 के दशक में अमिताभ बच्चन का आगाज हुआ. तो कामयाबी राजेश खन्ना के हाथ से सरकने लगी. वक्त बदल रहा था. लोग रोमांटिक फिल्मों से बोर होने लगे थे. अमिताभ बच्चन का एंग्री यंग मैन अवतार लोगों को भाने लगा था. ऐसे में लोग राजेश खन्ना के वही पुराने चिर परिचित हाव भाव देखकर उकताने लगे थे."

रोमांस का राजा

नम्रता के मुताबिक राजेश खन्ना एक कलाकार नहीं बल्कि एक स्टार थे. शायद ये भी एक वजह थी उनके कामयाबी के शिखर से नीचे गिरने की.

नम्रता ने कहा कि जिस तरह से अमिताभ बच्चन ने टीवी शो 'कौन बनेगा करोड़पति' में काम किया और फिर बाद में 'बागबान' जैसी फिल्मों में चरित्र रोल करने लगे वैसा 'काका' नहीं कर पाए.

काका को श्रद्धांजलि

वरिष्ठ फिल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे की राय भी कुछ कुछ ऐसी ही है.

जयप्रकाश चौकसे कहते हैं, "राजेश खन्ना एक मैनरिज्म वाले कलाकार थे. सिर्फ मैनरिज्म के सहारे कोई कलाकार लंबे वक्त तक नहीं खिंच सकता. अमिताभ बच्चन की कामयाबी का सफर इसलिए बेहद लंबा रहा क्योंकि वो एक बेहतरीन अभिनेता भी हैं. इस वजह से उम्र के इस पड़ाव में भी उन्हें तमाम रोल मिल रहे हैं. राजेश खन्ना के साथ ये बात नहीं थी. वो सिर्फ अपनी अदाओं और लटके झटकों पर ही निर्भर रहे. लेकिन हां, ऋषिकेश मुखर्जी की 'आनंद' और' सफर', ये दो ऐसी फिल्में थीं, जिसमें राजेश खन्ना ने कमाल का अभिनय किया."

लेकिन ये तमाम लोग एक बात पर सहमत हैं. वो ये कि राजेश खन्ना का सुपरस्टारडम भले ही ज्यादा लंबा नहीं चला लेकिन जिस कदर उस छोटे से दौर में लोगों ने उन्हें चाहा, उन्हें लेकर जो दीवानगी थी, वैसी शायद हिंदी फिल्मों के किसी अभिनेता को नसीब नहीं हुई.

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