दिल को छू जाती है 'गट्टू'

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Image caption फिल्म गट्टू को चिल्ड्रन फिल्म्स सोसायटी ऑफ इंडिया ने बनाया है.

भारत में में पतंग उड़ाना ना केवल एक खेल है बल्कि हर जगह में किसी ना किसी रूप में पतंगबाजी एक त्यौहार के रूप में भी मनाई जाती है. ऐसे में पतंग से जुड़ी ये फिल्म जरूर दिल तक पहुंच सकती है.

ये फिल्म एक छोटे शहर की गलियों के इर्द गिर्द घूमती हो. खुशी की बात ये है कि अब बॉलीवुड सचमुच बच्चों के लिए कुछ अच्छे प्रयास कर रहा है जैसे चिल्लर पार्टी और स्टेनली का डब्बा.

ऐसी ही एक छोटी सी कहानी है गट्टू की. ये फिल्म राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित निर्देशक राजन खोसा ने बनाई है.

राजन ने 1997 में डांस ऑफ द विंड बनाई थी पर वो दर्शकों तक नहीं पहुंच पाई थी. इस फिल्म का निर्माण चिल्ड्रन फिल्म सोसायटी ऑफ इंडिया ने किया है.

गट्टू कहानी है एक छोटे बच्चे की शैतानी और शरारतों की. उसके गांव में पतंग उड़ाना बेहद आम बात है. वहां पर एक पतंग है काली नाम की, जिसे कोई नहीं हरा सकता. काली सब पतंगों को काट देती है. उस पर किसी की विजय नहीं हो पाती.

काली किसकी पतंग है ये कोई नहीं जान पाता. गट्टू भी उन बच्चों में से है जो काली को हराना चाहता है. और आखिरकार एक दिन वो काली को हराने का रास्ता ढूंढ ही निकाल लेता है.

वो एक ऐसे स्कूल को खोजता है जहां की छत ऊंची है. वो छत पर चढ़कर काली को हरा सकता है. वो उस स्कूल में दाखिला ले लेता है. लेकिन दिखावे के लिए ही सही उसे कुछ दिनों तक तो ईमानदारी से पढ़ना जरूरी था. लेकिन वो अनपढ़ है. उसे अक्षर ज्ञान भी नहीं है. मगर गट्टू तो काली को किसी भी कीमत पर हराना चाहता है इसलिए वो इस चुनौती को भी स्वीकार कर लेता है.

दृढ़ निश्चय हो तो कुछ भी किया जा सकता है. और गट्टू भी अपने इरादे में कामयाब हो जाता है. लेकिन कैसे और कितना. ये तो फिल्म की अनोखी कहानी ही बताती है.

फिल्म गट्टू में एक खास बात है यहां कोई भी कलाकार नाटकीय नहीं है. गट्टू जो भी शैतानियां करता है उसे कोई शर्म या पछतावा नहीं होता.उसके मां-बाप नहीं है. उसने किसी से कुछ भी नहीं सीखा, सिवाय अपने चाचा के जो उसे बेहद प्यार करते हैं. लेकिन उसके चाचा (नरेंद्र कुमार) प्यार के साथ साथ उसकी शरारतों की वजह से कभी कभी उससे सख्ती से भी पेश आते हैं.

हालांकि गट्टू को अक्षर ज्ञान भी नहीं होता लेकिन उसका दिमाग बहुत तेज है.

गट्टू बने बाल कलाकार मोहम्मद समद दर्शकों का दिल ज़रूर जीत लेंगे. इस बच्चे ने बेहद सहज अभिनय किया है. लगता ही नहीं कि आप फिल्म देख रहे हैं. यहां राजन खोसा बाल्य अवस्था की शैतानियों को बखूबी दर्शाते हैं.

कुल मिलाकर गट्टू बालपन की शैतानियों और बच्चों की आकांक्षाओं को दिखाती है.

संदेश शांडिल्य का संगीत लुभाता तो जरूर है लेकिन ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाएगा.

राजन खोसा की पहली फिल्म डांस ऑफ द विंड ने वेनिस, लंदन, शिकागो समेत कई फिल्म फेस्टिवल में इनाम जीते हैं. ये फिल्म भी कई फेस्टीवल्स में अपनी छाप छोड़ चुकी है.

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