कितना पैसा लगाओगे 'पानी' में

  • 31 जुलाई 2012
शेखर कपूर
Image caption ओसियान में पत्रकारों से मुखातिब शेखर कपूर

दिल्ली में चल रहे ओसियान फिल्म समारोह में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त निर्देशक शेखर कपूर चहलकदमी करते नजर आए. फौरन उन्हें पत्रकारों ने घेर लिया. और एक बड़ी अनौपचारिक सी चर्चा शुरू हो गई.

लगभग सभी पत्रकार उनसे उनके महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट 'पानी' के बारे में जानना चाहते थे. लंबे समय से शेखर कपूर इस पर काम कर रहे हैं, लेकिन लोगों को पता नहीं कि ये फिल्म कब बनकर तैयार होगी. तो सवालों का सिलसिला कुछ ऐसे शुरू हो गया.

'शेखर, आपकी फिल्म पानी कब तैयार होगी.' तो पलटकर शेखर ने उत्साही पत्रकारों के उस दल पर सवाल दाग दिया. 'आप कितना पैसा डालेंगे मेरी फिल्म में.' इस पर वहां उपस्थित मीडिया ने चुप्पी साध ली. तब थोड़ा हिचकते हुए मैंने कहा, "मैं 10 हजार रुपए डालूंगी." तब मेरी बात सुनकर शायद वहां मौजूद एक दूसरी पत्रकार का उत्साह थोड़ा बढ़ा. उन्होंने कहा, "मैं अपने वेतन का 50 प्रतिशत डालूंगी."

शेखर कपूर ने वहां मौजूद अपने असिस्टेंट से कहा कि उनके नाम नोट कर लीजिए. फिर उन्होंने कहा, "मैं पानी को इसी तरह से बनाना चाहता हूं. आप सब लोगों के सहयोग से. अगर हिंदुस्तान का हर एक आदमी 10-10 रुपए भी मेरी फिल्म में डाले, तो फिल्म बनकर तैयार हो जाएगी."

उन्होंने आगे कहा, "मैं किसी स्टूडियो या प्रोडक्शन हाउस से अपनी फिल्म में पैसा नहीं लगवाना चाहता. वरना फिर उनके तमाम तरह के सवाल होंगे. फिल्म की कहानी क्या होगी. इसमें लव स्टोरी का एंगल कैसे डालोगे. फिल्म की मार्केटिंग की क्या योजना है. वगैरह-वगैरह. फिर मैं अपने मन-माफिक फिल्म थोड़े ना बना पाऊंगा."

उन्होंने बताया कि स्लमडॉग मिलेनियर के निर्देशक डैनी बॉयल से उनकी बात चल रही है और वो उसमें पैसा लगाएंगे. लेकिन फिल्म का बजट बड़ा होगा और उसमें दूसरों के सहयोग की भी जरूरत पड़ेगी.

सिनेमा बदल रहा है, इसलिए दर्शक भी बदल रहे हैं.

क्या अब दर्शक बदल रहे हैं. क्या वो अब बेहतर फिल्में देखने के लिए तैयार हो रहे हैं. इसके जवाब में शेखर ने कहा, "दरअसल सिनेमा बदल रहा है. इसलिए दर्शक भी बदल रहे हैं. अब हम उन्हें बेहतर फिल्में दे रहे हैं, तो वो देख भी रहे हैं. आप उन्हें लगातार बुरी फिल्में दोगे, तो बेचारे उन्हीं में से फिल्में चुनेंगे ना. अब जब गैंग्स ऑफ वासेपुर और पान सिंह तोमर जैसी अच्छी फिल्में आप उन्हें दे रहे हो, तो वो उन्हें खुले दिल से स्वीकार कर रहे हैं. इसी वजह से दर्शक, बॉक्स ऑफिस के जरिए अपनी पसंद साफ-साफ बयां कर रहे हैं. अब हमें उनकी पसंद पर आधारित फिल्में बनानी होंगी."

कास्टिंग कितनी जरूरी

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Image caption शेखर कपूर निर्देशित फिल्म बैंडिट क्वीन ने भी खासी वाहवाही बटोरी

शेखर कपूर की फिल्म बैंडिट क्वीन राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय, दोनों ही स्तरों पर बहुत सराही गई और इसे कई पुरस्कार भी मिले.

फिल्म की एक और वजह से काफी तारीफ हुई और वो थी, इसकी बेहतरीन कास्टिंग. फिल्म में जिन कलाकारों ने किरदार निभाए थे, वो लोगों को बिलकुल असली लगे. उनमें किसी को विशुद्ध मसाला फिल्मों वाली नाटकीयता नजर नहीं आई.

हाल ही में रिलीज हुई कुछ फिल्मों जैसे शंघाई, गैंग्स ऑफ वासेपुर और पान सिंह तोमर ने भी अपनी 'कास्टिंग' के लिए वाहवाही बटोरी. तो क्या अब हिंदी सिनेमा में विशुद्ध, साधारण और असल जिंदगी से जुड़े चेहरों को तरजीह दी जाने लगी है.

इस पर शेखर की राय थी, "देखिए फिल्म की कास्टिंग सही ना हो तो आपका काम काफी मुश्किल हो जाता है. लेकिन इसके भी दो पहलू हैं. आप असल जिंदगी की कहानी पर आधारित कोई वास्तविक फिल्म देखने जाओ तो उसमें आप इसी तरह के कलाकारों को खोजोगे.सलमान खान को किसी फिल्म में इसलिए लिया जाता है क्योंकि लोग सलमान खान को देखने परदे पर आते हैं. ना कि इसलिए कि लोग किसी किरदार विशेष को देखने आएंगे सलमान की फिल्म में. उसी तरह से इरफान खान को इसलिए फिल्म में लिया जाता है, क्योंकि लोग ये देखने आते हैं कि इरफान ने फलां किरदार को परदे पर कैसे पेश किया है."

कलाकार शेखर कपूर

लंबे समय बाद शेखर कपूर परदे पर अभिनय करते नजर आएंगे. वो कमल हासन अभिनीत और निर्देशित फिल्म विश्वरूप में अभिनय करते दिखेंगे.

उन्होंने बताया, "मैं कमल को कोई एक कहानी सुनाता, तो वो बदले में मुझे 10 कहानी सुना देते. तो मैंने कहा कि तुम्ही क्यों नहीं कोई फिल्म बना लेते और मुझे उसमें एक्टिंग का मौका दे देते. उन्होंने मेरी बात को गंभीरता से ले लिया और मुझे अपनी फिल्म विश्वरूप में मौका दे दिया."

लेकिन जाते-जाते शेखर पत्रकारों से अपील करना नहीं भूले कि उनके अभिनय को ज्यादा गंभीरतापूर्वक ना ले, क्योंकि वो अच्छे अभिनेता नहीं है. पत्रकारों ने अविश्वास में सर हिलाया. और फिर शेखर वहां से उठकर चल दिए.

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