अन्हे घोरे दा दान

अन्हे घोरे दा दान इमेज कॉपीरइट pr
Image caption ये पहली पंजाबी फिल्म है जिसे राष्ट्रीय पुरुस्कार समेत कई अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार भी मिले हैं.

बहुत कम फिल्में ऐसी होती हैं जो आप पर एक अमिट छाप छोड़ जाती हैं. प्रादेशिक भाषाओं में ऐसी बहुत फिल्में बनी हैं जो न सिर्फ भारत में बल्कि विदेशों में भी समीक्षकों की जयकार और सम्मान पा चुकी हैं.

लेकिन गुरविंदर सिंह के निर्देशन तले बनी फिल्म ‘अन्हे घोरे दा दान’ पहली पंजाबी फिल्म है जिसे राष्ट्रीय पुरुस्कार समेत कई अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार भी मिले हैं.

ज्ञानपीठ पुरुस्कार से सम्मानित गुरदयाल सिंह की कहानी पर आधारित इस फिल्म को अबू-धाबी फिल्म महोत्सव में ब्लैक पर्ल पुरुस्कार मिला है. साथ ही लन्दन फिल्म महोत्सव, बुसान अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव और वेनिस फिल्म महोत्सव में भी इस फिल्म को सभी ने सराहा.

ये फिल्म ठिठुरती हुई सर्दी में गरीबी और बेबसी का एक ऐसा चित्र खींचती है जहाँ एक बूढ़ा आदमी, उसकी चिड़चिड़ी बीवी और उनकी एक बेटी के जीवन काल का एक दिन हम देख पाते हैं.

फिल्म एक नई भाषा प्रदान करती है जिसमें दृश्यों की निशब्दता एक काव्यात्मक और अलंकृत छवि बन जाती है. फिल्म की कहानी पंजाब में भटिंडा के पास के एक गाँव की है जहाँ गरीब दलित किसान रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से जूझते हुए एक हताश ज़िन्दगी की ही कल्पना कर सकते हैं.

जहाँ इस फिल्म में एक ओर किसान की दास्तान है वहीँ ये फिल्म अमीर ज़मीन के मालिकों की क्रूरता भी प्रस्तुत करती है.

इस गाँव में लोग किसी तरह समझौता कर चुके हैं. रोज़ की ज़िन्दगी के उतार चढ़ाव उनके अन्दर के सुलगते हुए ज़ख्मों और लाचारी को दबा कर रखते हैं. यहीं इस गाँव में फिल्म का मुख्य किरदार मल सिंह अपने छोटे से परिवार के साथ ज़िन्दगी से सुलह कर किसी तरह जी रहा है.

गाँव से दूर एक छोटे शहर में मल सिंह का बेटा एक रिक्शा चलाता है पर रिक्शा वाले हड़ताल पर चले गए हैं. गाँव में ही एक मालिक ने अपनी उस ज़मीन का सौदा बड़े उद्योगपतियों से कर दिया है जहाँ ज़्यादातर गाँववालों के घर हैं.

मल सिंह और उसके बेटे को नहीं पता की उसके भविष्य में क्या होने वाला है. दोनों के चेहरे गांववालों की उदासी का प्रतीक हैं उर उनकी विवशता को दर्शाते हैं. क्योंकि कहानी एक काल की नहीं है बल्कि कई वर्षों के संघर्ष, दमन और शोषण की है. उनके चेहरे हताशा और अचेतना को दर्शाते हैं.

इस गाँव में लोगों को उनके अभाव ने मुर्दा बना दिया है. लोगों के चेहरे बहुत सी दास्तान कहते हैं खास तौर पर पीड़ा और कष्ट की. फिल्म में हर किरदार, कई सालों की नाउम्मीदी को अपने दिल में लेकर जीने की कोशिश में जुटा हुआ है.

दरअसल फिल्म उन दलित किसानों की है जो मजदूरी तो अधिक से अधिक करते हैं पर न तो उन्हें उसका पैसा मिलता है और न कोई इज्ज़त मिलती है. फिल्म समाज में फैली असमानता को पेश करती है.

संबंधित समाचार