क्रिएटिव ईगो अहंकार नहीं: दिबाकर बनर्जी

 सोमवार, 13 अगस्त, 2012 को 12:45 IST तक के समाचार
दिबाकर बनर्जी

दिबाकर की पहली फिल्म 'खोसला का घोसला' थी.

निर्देशक दिबाकर बनर्जी का नाम लेते ही दिमाग में आती हैं 'खोसला का घोंसला', 'ओए लकी, लकी ओए', 'लव सेक्स और धोखा' और 'शांघाई' जैसी फिल्में.

पिछले दिनों दिबाकर दिल्ली में आयोजित एक फिल्म महोत्सव में भाग लेने पहुचें और यहीं बीबीसी ने उनसे मुलाक़ात की.

इस बातचीत में दिबाकर ने जब 'क्रिएटिव ईगो' का ज़िक्र किया तो बीबीसी ने उनसे पुछ ही डाला कि आखिर ये 'क्रिएटिव ईगो' है क्या?

दिबाकर कहते हैं, ''क्रिएटिव ईगो अहंकार नहीं है. क्रिएटिव ईगो होता है एक विश्वास, या यूं कहूं आत्मविश्वास कि मैं जो कहने की कोशिश कर रहा हूं वो कहने के लायक है और मैं वो कह के रहूंगा फिर चाहे उसमे कितने भी साल लग जाएं.''

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए दिबाकर कहते हैं, ''दूसरी बात ये भी है कि आप कुछ कहने की कोशिश कर रहे हैं और बाकि लोग आकर आपसे कहते हैं कि आप जो कहना चाह रहे हैं वो उसका समर्थन करते हैं, ऐसे में उन लोगों ने तो अपनी बाज़ी आपके साथ लगा दी अब आप उनके विश्वास के साथ खेल नहीं सकते. इसलिए 'क्रिएटिव' आत्मविश्वास होना बहुत ज़रूरी है और ये विश्वास सोच विचार के बाद आता है न कि बेकार के अहंकार से.''

दिबाकर कहते हैं जब वो अपनी पहली फिल्म 'खोसला का घोंसला' बना रहे थे उस वक़्त वो अपने इस 'क्रिएटिव ईगो' से वाकिफ नहीं थे लेकिन उसके बावजूद वो इस बात पर अडिग थे कि उन्हें ये ही फिल्म बनानी है और इसी तरह से बनानी है.

"आप जब हटकर फिल्में बनाते हैं तो आपको अपना बजट छोटा ही रखना पड़ता है क्योंकि सच को सुनने की शक्ति कम ही लोगों में होती है."

दिबाकर बनर्जी

वो कहते हैं कि अपनी पहली फिल्म बनाते वक़्त उनसे कुछ गलतियां ज़रूर हुई लेकिन फिर भी उनके दिमाग में साफ़ था कि वो किस तरह की फिल्म बनाना चाहते हैं.

दिबाकर की फिल्में छोटे बजट की होती हैं, इसके पीछे कोई खास वजह? इस सवाल का जवाब देते हुए हैं वो कहते हैं, ''जब आप कोई ऐसी फिल्म बनाते हैं जिसमे कोई कड़वा सच है और जिसे बहुत से लोग पसंद नहीं करने वाले ऐसे में आप रिस्क लेते हैं. और जब आप रिस्क लेते हैं तब तो ज़ाहिर है कि आप सस्ती से सस्ती फिल्म ही बनाना चाहेंगे. लेकिन सस्ती फिल्म का मतलब ये नहीं है कि आप अपने विषय से भटक जाए. यही तो हुनर है कि सस्ती और इंडिपेन्डेंट फिल्में कैसे बनाई जाएं.''

अपनी बात को पूरा करते हुए दिबाकर कहते हैं, ''आप जब हटकर फिल्में बनाते हैं तो आपको अपना बजट छोटा ही रखना पड़ता है क्योंकि सच को सुनने की शक्ति कम ही लोगों में होती है. और इसका सीधा मतलब ये ही है कि इस फिल्म को कम दर्शक मिलेंगे और फिल्म का बजट खुद ब खुद ही कम हो जाएगा. तो आपमें इतनी समझ होनी चाहिए कि अपने विषय को देखर अपना बजट तय करें जिसकी मैं कोशिश करता हूं.''

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